
जयपुर- राजस्थान हाईकोर्ट,जयपुर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में नाबालिग लड़की के साथ सहमति से बने रिश्ते को लेकर POCSO एक्ट के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी की है। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने क्रिमिनल मिस्सेलिनियस पिटीशन नंबर 88/2026 में FIR नंबर 169/2025 (कलादेड़ा थाना, जयपुर ग्रामीण) और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया। इस मामले में 19 वर्षीय युवक आर्यन पर 17 वर्षीय लड़की के अपहरण और POCSO एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगाए गए थे, लेकिन कोर्ट ने इसे किशोरावस्था के सहमति वाले रिश्ते का मामला बताते हुए कार्यवाही को न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया।
कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि पीड़िता ने जांच और ट्रायल के हर चरण में आरोपी के खिलाफ किसी भी प्रकार की यौन शोषण की कोई शिकायत नहीं की। पीड़िता ने सेक्शन 180 BNSS के बयान में कहा- “आर्यन ने मेरे साथ कोई गलत काम नहीं किया... मैं अपनी मर्जी से आर्यन के साथ गई थी... आर्यन ने जबरदस्ती बहला-फुसलाकर नहीं ले जाया था।” सेक्शन 183 BNSS के बयान में भी पीड़िता ने दोहराया- “आर्यन ने मुझे भगाकर नहीं ले जाया... मेरे साथ कोई गलत काम नहीं किया गया... मैं अब राजी-खुशी अपने घरवालों के साथ रह रही हूं।” ट्रायल के दौरान कोर्ट में भी पीड़िता ने यही बात दोहराई कि वह खुद घर से निकली थी और आरोपी से मिली थी।
कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का भी हवाला दिया कि रैप एग्जामिनेशन रिपोर्ट में यौन हमले का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बावजूद पुलिस ने BNS की धारा 137(2) (अपहरण), धारा 96 (बच्चे को गैरकानूनी उद्देश्य के लिए प्रेरित करना), धारा 64(2)(m) और POCSO एक्ट की धारा 5(l)/6 (उग्र पैठकारी यौन हमला) के तहत चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने भी इन धाराओं पर आरोप तय किए, जिसकी कोर्ट ने कड़ी आलोचना की।
जस्टिस उपमन ने कहा- “यह अदालत गहरे रूप से इस मामले की प्रक्रियात्मक दिशा से व्यथित है। सबसे प्रमुख विसंगति POCSO एक्ट की धारा 5(l)/6 को शामिल करना है, जो न्यूनतम 20 वर्ष की सजा वाला अत्यंत गंभीर अपराध है।” कोर्ट ने आगे कहा- “पीड़िता के बयानों में यौन अत्याचार से इनकार है... फिर भी जांच एजेंसी ने बिना किसी सबूत के POCSO की धारा 3/4 के तहत चार्जशीट दाखिल की। यह समझ से परे है कि पुलिस ने प्राथमिक सबूतों को नजरअंदाज कर ऐसे जघन्य अपराधों के लिए चार्जशीट कैसे दाखिल की, जिनमें कठोर सजा का प्रावधान है।”
हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा- “POCSO एक्ट कमजोर बच्चों की रक्षा के लिए शक्तिशाली कानून है, लेकिन जब पुलिस इसे यांत्रिक रूप से युवाओं के खिलाफ लागू करती है, तो यह सुरक्षा की ढाल से अभियोजन का हथियार बन जाता है। 19 वर्षीय युवक को 'उग्र यौन अपराधी' का ठप्पा लगाना, जबकि पीड़िता ने इनकार किया है, अपहरण या सामाजिक रूप से अस्वीकार्य रिश्ते के लिए सजा देने जैसा है।”
अपहरण के आरोप पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एस. वरदराजन बनाम मद्रास राज्य (AIR 1965 SC 942) के फैसले का हवाला दिया और कहा- “यदि नाबालिग अपनी समझ के साथ संरक्षक की सुरक्षा छोड़कर आरोपी के साथ जाती है, तो इसे 'ले जाना' नहीं कहा जा सकता। आरोपी द्वारा सक्रिय प्रलोभन या भागीदारी साबित होनी चाहिए।” कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पीड़िता ने अपनी इच्छा से घर छोड़ा, आरोपी ने केवल साथ दिया।
कोर्ट ने हाल के सुप्रीम कोर्ट फैसले स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम अनुरुध (09 जनवरी 2026) का जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि POCSO एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है और रोमियो-जूलियट क्लॉज की जरूरत है। हाईकोर्ट ने उद्धृत किया- “POCSO एक्ट का कठोर अनुप्रयोग 17 वर्षीय लड़की और 19 वर्षीय लड़के के स्वैच्छिक रिश्ते में किशोर स्वायत्तता की वास्तविकता को नजरअंदाज करता है और सुरक्षा कानून को दंडात्मक उपकरण बना देता है।”
कोर्ट ने कई हाईकोर्ट फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं जहां परिवार रोमांटिक रिश्तों का विरोध करने के लिए POCSO का इस्तेमाल करते हैं, जिससे युवा जेल में सड़ते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया- “केंद्र सरकार को POCSO एक्ट में संशोधन कर क्लोज-एज एक्सेम्प्शन क्लॉज लाना चाहिए, ताकि 16-19 वर्ष के बीच के सहमति वाले रिश्तों को अपराध न माना जाए। इससे न्यायपालिका को शिकारी यौन शोषण और किशोर अंतरंगता के बीच अंतर करने की शक्ति मिलेगी।”
अंत में कोर्ट ने BNSS की धारा 528 (CrPC की धारा 482 के समकक्ष) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए FIR और सेशन केस को पूरी तरह रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा- “आगे की कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगी।”
यह फैसला POCSO एक्ट के यांत्रिक उपयोग और किशोर रिश्तों में सहमति के मुद्दे पर एक बड़ा संदेश है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे समान मामलों में राहत मिल सकती है और विधायिका पर रोमियो-जूलियट क्लॉज लाने का दबाव बढ़ेगा।
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