
नई दिल्ली: किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (9 जनवरी) को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को खारिज करते हुए, शीर्ष अदालत ने केंद्रीय कानून सचिव से अपील की है कि वे यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विशेष रूप से सिफारिश की है कि सरकार "रोमियो-जूलियट क्लॉज" (Romeo-Juliet Clause) को लागू करने पर विचार करे। यह प्रावधान किशोरों के उन "जेनुइन" (वास्तविक) प्रेम संबंधों को सुरक्षा प्रदान करेगा, जो बाल यौन शोषण के दायरे में नहीं आते।
शेक्सपियर के मशहूर नाटक के पात्रों के नाम पर आधारित, यह क्लॉज पश्चिमी देशों (जैसे अमेरिका) में प्रचलित है। यह प्रावधान उन किशोर-किशोरियों को वैधानिक बलात्कार (Statutory Rape) के अभियोग से बचाता है जो हमउम्र हैं या जिनकी उम्र में बहुत कम अंतर है और जिनके बीच संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने हैं।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब 'सहमति की उम्र' (Age of Consent) को लेकर एक जनहित याचिका (PIL) कोर्ट में पहले से लंबित है। अदालत का यह रुख दर्शाता है कि न्यायपालिका अब नाबालिगों के बीच सहमति से होने वाले यौन कृत्यों को अपराधी घोषित करने को लेकर असहज महसूस कर रही है।
मौजूदा POCSO कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को 'बच्चा' माना जाता है। इस कानून की सख्ती यह है कि यह नाबालिग की 'सहमति' को मान्यता नहीं देता। इसका मतलब है कि 18 साल से कम उम्र में बनाया गया कोई भी यौन संबंध, चाहे वह सहमति से ही क्यों न हो, स्वतः ही अपराध माना जाता है।
शुक्रवार को अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि POCSO न्याय की एक "पवित्र अभिव्यक्ति" है, लेकिन इसके दुरुपयोग ने समाज में एक "गंभीर खाई" पैदा कर दी है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि अक्सर परिवार वाले इस कानून का इस्तेमाल युवाओं के रिश्तों का विरोध करने के लिए कर रहे हैं।
कानून में संशोधन की मांग को सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस याचिका से बल मिला है, जिसमें यौन अपराधों के मामलों में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। इस मामले में कोर्ट की सहायता कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सहमति की उम्र कम करने या विशेष अपवाद लाने की वकालत की है।
पिछले साल अपनी लिखित दलीलों में, जयसिंह ने तर्क दिया था कि मौजूदा कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत किशोरों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है। उनका कहना है कि 16 से 18 वर्ष के बीच के किशोरों में अपनी यौन स्वायत्तता को लेकर फैसले लेने की "विकसित होती क्षमता" (Evolving Capacity) होती है।
उन्होंने "कॉमन लॉ" के 'मैच्योर माइनर' (परिपक्व नाबालिग) सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि 18 से कम उम्र के सभी बच्चों को एक ही श्रेणी में रखना वैज्ञानिक वास्तविकता और यौवन (Puberty) के जैविक सत्य की अनदेखी है।
जयसिंह ने "क्लोज-इन-एज" (उम्र में कम अंतर) अपवाद का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत, यदि दोनों पक्ष किशोर हैं (उदाहरण के लिए, एक 16 साल का और दूसरा 17 साल का) और संबंध सहमति से है, तो इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए। इससे उन किशोर लड़कों को जेल जाने से बचाया जा सकेगा जो किसी जबरदस्ती के बिना रिश्ते में थे।
केंद्र सरकार ने सहमति की उम्र घटाने या कानून में किसी भी तरह की छूट देने का कड़ा विरोध किया है। कोर्ट में सरकार ने तर्क दिया कि 18 वर्ष की आयु सीमा एक "सोचा-समझा विधायी निर्णय" है, जो बच्चों के लिए एक गैर-समझौतावादी "सुरक्षा कवच" का काम करता है।
सरकार का कहना है कि नाबालिगों में कानूनी और विकासात्मक रूप से सार्थक सहमति देने की क्षमता नहीं होती। सरकार ने आशंका जताई कि अगर कानून में ढील दी गई या सहमति की उम्र कम की गई, तो बाल शोषण और तस्करी करने वाले अपराधी 'सहमति' की आड़ में इसका गलत फायदा उठा सकते हैं। चूंकि यह कानून बाल शोषण की समस्या को खत्म करने के लिए बनाया गया था, इसलिए इसमें ढील देना उस उद्देश्य को ही कमजोर कर देगा।
2023 में विधि आयोग (Law Commission) ने भी सहमति की उम्र 16 करने के खिलाफ सलाह दी थी। हालांकि, आयोग ने यह सुझाव जरूर दिया था कि 16 से 18 वर्ष के बच्चों की मूक सहमति वाले मामलों में जजों को सजा तय करते समय कुछ विवेकपूर्ण अधिकार दिए जाने चाहिए, बजाय इसके कि कानून में पूरी तरह बदलाव किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता को अनुभवजन्य आंकड़े भी सही साबित करते हैं। एनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट (Enfold Proactive Health Trust) और यूनिसेफ (UNICEF) के एक अध्ययन के अनुसार, 2016 से 2020 के बीच महाराष्ट्र, असम और पश्चिम बंगाल में दर्ज POCSO मामलों में से लगभग 25% मामले "रोमैंटिक" प्रकृति के थे। यानी इनमें पीड़ित और आरोपी एक-दूसरे के साथ सहमति से रिश्ते में थे।
आंकड़े बताते हैं कि परिवार वाले अक्सर अपनी बेटियों की स्वायत्तता को नियंत्रित करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग करते हैं। जब कोई लड़की किसी लड़के के साथ भाग जाती है (अक्सर अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक मामलों में), तो माता-पिता अपहरण और बलात्कार का केस दर्ज करा देते हैं। ऐसे मामलों में सजा की दर बहुत कम होती है क्योंकि बाद में 'पीड़ित' लड़कियां अक्सर कोर्ट में आरोपी के पक्ष में गवाही दे देती हैं।
इसके अलावा, किशोर कामुकता के अपराधीकरण के स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणाम भी हैं। जैसा कि इंदिरा जयसिंह ने बताया, POCSO में अनिवार्य रिपोर्टिंग (Mandatory Reporting) का प्रावधान है। इसके डर से डॉक्टर पुलिस को सूचना देने के लिए बाध्य हैं, जिससे किशोर आवश्यक यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं लेने से कतराते हैं।
वर्तमान में, देश भर के हाई कोर्ट्स अपने विवेक का इस्तेमाल कर ऐसे 'रोमैंटिक' मामलों में आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर रहे हैं। कोर्ट अक्सर यह टिप्पणी करते हैं कि POCSO का उद्देश्य "किशोरावस्था के प्यार" (Teenage Love) को सजा देना नहीं है। लेकिन विडंबना यह है कि जब तक फैसला आता है, तब तक आरोपी लड़का महीनों या सालों तक हिरासत में रह चुका होता है।
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने संकेत दिया कि किशोर कामुकता के अपराधीकरण के मुद्दे को केवल जजों के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसके लिए एक ढांचागत (Structural) समाधान की जरूरत है। जैसा कि फैसले में कहा गया, "जब बच्चों की सुरक्षा के लिए बना कानून 'बदला लेने का औजार' बन जाता है, तो न्याय की अवधारणा ही उलटने की कगार पर आ जाती है।"
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