
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के वर्गीकरण में धर्म-निरपेक्षता के मुद्दे पर एक नई और गंभीर बहस छेड़ दी है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई हिंदू ओबीसी व्यक्ति किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो वह आरक्षण के अपने अधिकार से वंचित हो जाएगा।
देश में अनुसूचित जाति (SC) की पहचान हमेशा से धार्मिक मापदंडों के आधार पर होती रही है। वहीं, अनुसूचित जनजाति (ST) के मामले में धर्म को कभी आधार नहीं बनाया गया। अगर बात ओबीसी की करें, तो साल 1992 के ऐतिहासिक 'इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ' फैसले के लागू होने के बाद से ही इसका वर्गीकरण पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष रहा है।
वर्तमान व्यवस्था के तहत किसी भी समुदाय (चाहे वह वर्ग हो या जाति) का मूल्यांकन सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के 11 संकेतकों पर किया जाता है। एक तय न्यूनतम स्कोर के आधार पर ही उन्हें ओबीसी वर्ग में शामिल किया जाता है। यही कारण है कि राज्यों में ओबीसी प्रमाण पत्र बनवाने वाले फॉर्म में आवेदक का धर्म नहीं पूछा जाता और न ही जारी किए गए सर्टिफिकेट में व्यक्ति के धर्म का कोई जिक्र होता है।
हिंदू ओबीसी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के हकदार होने या न होने के सवाल पर 15 अक्टूबर को एक अहम फैसला सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने इस फैसले में यह स्थापित किया कि ऐसे मामलों की जांच करते समय 'सामाजिक पिछड़ेपन के स्रोत' पर विचार करना बेहद अनिवार्य है।
अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर खास तौर से जोर दिया कि एक हिंदू ओबीसी व्यक्ति के लिए आरक्षण के अधिकार का कानूनी आधार मुख्य रूप से उस हिंदू सामाजिक व्यवस्था की सदस्यता पर टिका हुआ है।
सामाजिक पिछड़ेपन के स्रोत पर चर्चा करते हुए पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने माना कि भले ही 'इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ' मामले में जाति को ओबीसी वर्गीकरण का एकमात्र आधार मानने पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इस ऐतिहासिक सच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि हिंदू समाज में जाति की 'मूल संस्था' ने ही सामाजिक और अन्य प्रकार के पिछड़ेपन को तय किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि हिंदू धर्म छोड़ने वाले किसी ओबीसी व्यक्ति का शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ापन धर्मांतरण के बाद भी जारी रह सकता है। हालांकि, किसी दूसरे धर्म को अपनाने का उनका यह कदम उन्हें एक अलग सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बना देता है, जिससे उनके सामाजिक पिछड़ेपन का स्रोत भी पूरी तरह बदल जाता है।
जस्टिस मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ का यह निष्कर्ष भारत में विभिन्न धर्मों के बीच मौजूद सामाजिक स्तरीकरण की गहरी समझ से निकलकर सामने आया है। पीठ का मानना है कि किसी भी व्यवस्था में पिछड़ेपन का स्रोत उस विशेष समाज की संरचना और उसकी प्रकृति के आधार पर अलग-अलग होता है।
सामाजिक स्तरीकरण की यह नई व्याख्या इंद्रा साहनी मामले के फैसले से थोड़ी अलग दिशा में जाती है। उस पुराने फैसले ने अब तक ओबीसी की पहचान करने की मजबूत नींव रखी थी। उसमें हिंदू या मुस्लिम समुदायों के वर्ग या जाति होने की परवाह किए बिना, सामाजिक पिछड़ेपन के स्रोत के सवाल पर गहराई से प्रवेश नहीं किया गया था।
'इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ' मामले के बाद से ओबीसी का दर्जा मांगने वाले समुदायों का पिछड़ापन तय करने के लिए मुख्य रूप से चार मापदंडों का इस्तेमाल होता रहा है। इनमें से किसी में भी पिछड़ेपन के स्रोत की जांच जरूरी नहीं थी। इन पैमानों में बाल विवाह का स्तर, शारीरिक श्रम पर निर्भरता और कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी शामिल है। इसके अलावा, एक अहम शर्त यह भी है कि आवेदक समुदाय को अन्य लोगों द्वारा सामाजिक रूप से पिछड़ा माना जाता हो।
इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण यह था कि भारत में जाति व्यवस्था ने सभी धर्मों में प्रवेश कर लिया है और इसका अंतर केवल इसके प्रभाव के स्तर में है। इसके विपरीत, अदालत का 2026 का यह ताज़ा फैसला हिंदू समाज में जाति के आधार पर होने वाले स्तरीकरण और इस्लाम सहित अन्य गैर-हिंदू धर्मों में मौजूद 'जाति जैसी' व्यवस्थाओं के बीच एक स्पष्ट अंतर खींचता है।
जहां इंद्रा साहनी फैसले में इस्लाम और ईसाई धर्म में सामाजिक स्तरीकरण को हिंदू समाज की जाति व्यवस्था के समान माना गया था, वहीं 2026 का यह फैसला इन व्यवस्थाओं के बीच मौजूद बुनियादी अंतरों पर गहराई से केंद्रित है।
हालांकि, अपने 15 अक्टूबर के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह पूरी तरह साफ किया है कि गैर-हिंदू समुदाय भी ओबीसी की श्रेणी में आ सकते हैं। अदालत ने केवल धर्मांतरण करने वालों के लगातार पिछड़ेपन के सवाल पर, हिंदू ओबीसी और गैर-हिंदू ओबीसी के पिछड़ेपन के स्रोतों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची है।
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