नई दिल्ली: बुधवार, 21 अक्टूबर को कुकी-जो संगठनों ने मणिपुर में बिगड़ते हालात का हवाला देते हुए एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन लागू करने की पुरजोर मांग उठाई है। समुदाय का दावा है कि मार्च 2026 से लेकर अब तक उनके 32 लोगों की निर्मम हत्या की जा चुकी है, जिसके कारण पूरे इलाके में भय और असुरक्षा का माहौल व्याप्त है।
गौरतलब है कि मणिपुर में पिछले साल 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। हालात की समीक्षा के बाद इसी साल 4 फरवरी को राज्य से केंद्रीय शासन को हटा लिया गया था। लेकिन समुदाय का कहना है कि केंद्रीय नियंत्रण हटने के बाद से ही वहां फिर से हिंसा का क्रूर दौर शुरू हो गया है।
दिल्ली स्थित कुकी-जो विमेंस फोरम ने इस हिंसा के चौंकाने वाले और दुखद आंकड़े पेश किए हैं। फोरम के अनुसार, मार्च 2026 के बाद से अब तक मारे गए 32 कुकी-जो लोगों में दो गर्भवती महिलाओं समेत 10 अन्य महिलाएं भी शामिल हैं। संगठन ने इस भीषण रक्तपात के लिए स्पष्ट तौर पर एनएससीएन-आईएम (NSCN-IM) के इसाक-मुइवा गुट और जेलियांग्रोंग यूनाइटेड फ्रंट (ZUF-Kamson) को जिम्मेदार ठहराया है। इसके साथ ही यह भी दावा किया गया है कि इस अवधि के दौरान 14 कुकी-जो गांवों के लगभग 55 घरों को भी आग के हवाले कर दिया गया।
नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कुकी-जो काउंसिल के प्रवक्ता गिन्ज़ा वुअलज़ोंग ने स्पष्ट किया कि जब राज्य में केंद्रीय शासन लागू था, तब उनके समुदाय के किसी भी नागरिक की जान नहीं गई थी। उन्होंने कुकी-जो लोगों की सुरक्षा और उनके सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए राज्य में अविलंब राष्ट्रपति शासन की वापसी की गुहार लगाई है।
मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था से पूरी तरह निराश हो चुके कुकी-जो काउंसिल ने अपनी एक पुरानी मांग को भी मंच से दोहराया। संगठन ने अपने समुदाय के लिए एक अलग प्रशासन की वकालत की है, जिसे विधायिका के साथ एक केंद्र शासित प्रदेश (यूनियन टेरिटरी) का दर्जा प्राप्त हो। उनका तर्क है कि इस लंबे जातीय संघर्ष ने मौजूदा राज्य सरकार से उनका भरोसा पूरी तरह खत्म कर दिया है।
गिन्ज़ा वुअलज़ोंग ने प्रभावित इलाकों में पनपे गंभीर आर्थिक संकट पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि कांगपोकपी, उखरूल और कामजोंग जिलों के साथ-साथ नोनी/तामेंगलोंग के लोंगपी क्षेत्र जैसे कुकी-जो बहुल इलाकों में जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे आम इंसान का जीना मुहाल हो गया है।
उन्होंने दावा किया कि कामजोंग के चासाड और आइशी गांवों के निवासियों को एक तरह की अघोषित आर्थिक नाकेबंदी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कांगपोकपी के कोटलें और लीलोन क्षेत्रों के गांवों में भी जरूरी आपूर्ति को जानबूझकर बाधित किया गया है। प्रवक्ता ने यूनाइटेड नागा काउंसिल (UNC) पर नामडिलोंग और सेनापति में कांगपोकपी जाने वाले माल को रोकने का भी गंभीर आरोप लगाया।
इस जबरदस्त नाकेबंदी और आपूर्ति की कमी का सीधा और खौफनाक असर महंगाई पर पड़ा है। प्रभावित क्षेत्रों में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि पेट्रोल की कीमत 250 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है, जबकि रसोई गैस (LPG) का एक सिलेंडर 5,000 रुपये में बिक रहा है।
अपने बयान के अंत में प्रवक्ता ने जोर देकर कहा कि मणिपुर का मौजूदा संकट केवल सुरक्षा व्यवस्था की नाकामी नहीं है, बल्कि यह एक गहरी राजनीतिक समस्या है। इसका समाधान भी राजनीतिक तरीके से ही निकाला जाना चाहिए। मैतेई और कुकी-जो के बीच चल रहे पुराने विवाद के साथ-साथ हाल ही में नागा और कुकी-जो गुटों के बीच शुरू हुई ताजा झड़पें यह साबित करती हैं कि यहां एक स्थायी राजनीतिक समझौते की सख्त जरूरत है।
आपको बता दें कि कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच 3 मई 2023 को शुरू हुई जातीय हिंसा में अब तक 350 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। वहीं, इसी साल 7 फरवरी से राज्य में कुकी और नागा गुटों के बीच जातीय हिंसा की एक और खतरनाक लहर भड़क उठी है, जिसने वहां के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को पूरी तरह से तोड़-मरोड़ कर रख दिया है।
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