
तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई से एक बेहद गंभीर और निराश करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक जरूरी सरकारी दस्तावेज न बन पाने के कारण कट्टूनायकन आदिवासी समुदाय के बच्चों का भविष्य अंधकार में डूब रहा है। जाति प्रमाण पत्र के अभाव में इस समुदाय के कम से कम 20 छात्रों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
यह पूरी समस्या पेनथूर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले जमन कुडालुर पोस्ट के वयालूर गांव की है। यहां की कुलथु मेडु स्ट्रीट पर पिछले 70 वर्षों से कट्टूनायकन समुदाय के करीब 46 परिवार निवास कर रहे हैं। इस समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी के तहत विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में रखा गया है। कई सालों से जाति प्रमाण पत्र के लिए संघर्ष कर रहे इन परिवारों ने 18 अक्टूबर को तिरुवन्नामलाई की कलेक्टर वंदना गर्ग को एक याचिका सौंपकर न्याय की गुहार लगाई है।
प्रमाण पत्र न होने का सबसे बड़ा खामियाजा इस समुदाय की नई पीढ़ी उठा रही है। समुदाय के एक सदस्य आर. कन्नन ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उनकी बेटी को 11वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। बिना जाति प्रमाण पत्र के उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी गई थी। कन्नन के बड़े बेटे सहित कई अन्य छात्रों का भी उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना इसी सरकारी पेंच की वजह से टूट गया। पढ़ाई छूटने के बाद अब ये युवा अपना पेट पालने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने को विवश हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि राजस्व विभाग के अधिकारी उनसे उनकी जाति साबित करने के लिए उनके दादा-परदादा के समय के दस्तावेज मांगते हैं। इतने पुराने कागजात न होने के कारण उनके आवेदन वहीं अटक जाते हैं। लोगों का आरोप है कि कलेक्टर, राजस्व मंडल अधिकारी (आरडीओ), तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और ग्राम प्रशासनिक अधिकारी को दिए गए उनके आवेदन सालों से सिर्फ फाइलों में धूल फांक रहे हैं।
ट्राइबल लिबरेशन मूवमेंट के समन्वयक और अधिवक्ता वी. अगतियन ने इस जमीनी हकीकत पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस समुदाय के लोग अब शिकार करने और कंद-मूल इकट्ठा करने जैसे अपने पारंपरिक पेशों को छोड़ चुके हैं और अपना जीवन यापन करने के लिए बर्तन बेचने जैसे काम करने लगे हैं। अगतियन ने सरकार से मांग की है कि मानव विज्ञानियों (एंथ्रोपोलॉजिस्ट) की मदद से क्षेत्र का सघन निरीक्षण कराया जाए, ताकि इस समुदाय की सही पहचान हो सके और पात्र परिवारों को उनके अधिकार मिल सकें।
दूसरी ओर, इस पूरे मसले पर तिरुवन्नामलाई के एक राजस्व अधिकारी का अपना तर्क है। उनका कहना है कि आवेदकों ने अपनी पहचान साबित करने के लिए जरूरी पुश्तैनी दस्तावेज जमा नहीं किए हैं। अधिकारी ने एक और गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि वेट्टईकरन जैसे अन्य समुदायों के लोग भी खुद को कट्टूनायकन बताकर प्रमाण पत्र मांग रहे हैं। ऐसे में बिना ठोस सबूत के कागजात जारी करने से असली कट्टूनायकन समुदाय के लोगों के वास्तविक अधिकार छिन जाने का खतरा बना हुआ है।
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