नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने ओबीसी क्रीमी लेयर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के सामने अपने ही विरोधाभासी बयानों से उपजी उलझन को सुलझाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। यह पूरा विवाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) में काम करने वाले परिवारों के ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 11 मार्च को आए रोहित नाथन फैसले को लागू करने से जुड़ा है।
रोहित नाथन फैसले ने उन ओबीसी उम्मीदवारों के लिए प्रतिष्ठित सिविल सेवाओं में चयन का रास्ता साफ कर दिया था, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों में परीक्षाएं तो पास कीं लेकिन उन्हें नियुक्ति नहीं मिल सकी। इस ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि पीएसयू पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के 'क्रीमी लेयर' का निर्धारण करते समय उनकी 'आय' में 'वेतन' को नहीं जोड़ा जा सकता। यह नियम ठीक उसी तरह लागू होगा जैसे गैर-पीएसयू परिवारों के ओबीसी उम्मीदवारों के मामले में होता है।
सरकार ने 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इसी फैसले पर सवाल खड़े किए थे। वहीं दूसरी ओर, केंद्र ने अब कैट से अपने 19 अगस्त के उस आदेश में संशोधन करने की मांग की है जिसमें उसने रोहित नाथन फैसले को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई थी।
सोमवार को कैट में दाखिल किए गए एक नए हलफनामे में सरकार ने अपना रुख स्पष्ट किया। सरकार का कहना है कि रोहित नाथन मामले में फैसले को लागू करने के उसके पिछले बयान को स्पष्ट करने की आवश्यकता है, क्योंकि इस संबंध में एक संशोधन आवेदन फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सरकार ने साफ किया है कि इस फैसले का कार्यान्वयन अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम नतीजे पर ही निर्भर करेगा।
सरकार ने न्यायाधिकरण को बताया है कि अगर उसका पिछला आदेश बिना किसी बदलाव के रिकॉर्ड में बना रहता है, तो इससे एक बेहद विरोधाभासी स्थिति पैदा हो जाएगी। इससे ऐसा संदेश जाएगा कि सरकार उस फैसले को लागू करने के लिए तैयार है, जिसे वह पहले ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे चुकी है।
यह पूरा विरोधाभास तब खुलकर सामने आया जब ओबीसी उम्मीदवार बसंत सिंह ने कैट पर दबाव डाला कि वह सिविल सेवाओं में उनकी नियुक्ति के आदेश को सख्ती से लागू करे। सिंह का मामला भी बिल्कुल उन्हीं उम्मीदवारों जैसा है जिनके पक्ष में सुप्रीम कोर्ट ने रोहित नाथन फैसला सुनाया था।
सरकार के इस ताजा हलफनामे पर प्रतिक्रिया देते हुए बसंत सिंह के वकील विक्रम हेगड़े ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। नए हलफनामे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार स्पष्ट रूप से समय के पहिये को पीछे घुमाने की कोशिश कर रही है।
गौरतलब है कि 1993 के एक कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, किसी भी परिवार की कुल 'आय' की गणना करते समय 'वेतन' और 'कृषि आय' को उसमें शामिल नहीं किया जाता है। यह पूरा विवाद इसी बात पर केंद्रित है कि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) उन उम्मीदवारों के मामले में 'वेतन' को आय का हिस्सा क्यों मान रहा था जिनके माता-पिता पीएसयू में कार्यरत हैं।
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