
नई दिल्ली: OBC क्रीमी लेयर से जुड़े आय परीक्षण और पदों की समानता का महत्वपूर्ण मुद्दा फिलहाल दो केंद्रीय मंत्रालयों के बीच उलझता हुआ नजर आ रहा है। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कल्याण संबंधी संसदीय समिति के प्रमुख और भाजपा सांसद गणेश सिंह ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय तथा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के बीच यह अहम मामला अटका पड़ा है।
समिति के अध्यक्ष गणेश सिंह का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मार्च में आय परीक्षण को लेकर दिए गए फैसले के आधार पर सामाजिक न्याय मंत्रालय को एक स्पष्ट नीति तैयार करनी चाहिए। नियमानुसार इस नीति को अंतिम मंजूरी के लिए जल्द से जल्द कैबिनेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए था। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना था कि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) आय परीक्षण लागू करने में काफी भेदभावपूर्ण रवैया अपना रहा है। अदालत ने उन ओबीसी उम्मीदवारों के प्रति 'शत्रुतापूर्ण भेदभाव' का जिक्र किया था, जिनके माता-पिता गैर-सरकारी नौकरियों में हैं और उनके पदों की सरकारी पदों के साथ समानता तय नहीं की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया था कि ऐसी श्रेणी वाले मामलों में आय परीक्षण से वेतन के माध्यम से होने वाली आय को बाहर रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही, अदालत ने सरकार को उन ओबीसी उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त (सुपरन्यूमरेरी) पद सृजित करने का भी आदेश दिया था, जिन्हें इस गलत आकलन के कारण नॉन-क्रीमी लेयर के दर्जे से अनुचित रूप से वंचित कर दिया गया था।
हालांकि अदालत ने सरकार को इन निर्देशों को लागू करने के लिए छह महीने का समय दिया था, लेकिन इस मुद्दे ने ओबीसी वर्ग के एक बड़े हिस्से में आक्रोश पैदा कर दिया है। सरकार ने इसके बाद वापस सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए एक आवेदन दायर किया, जिसमें कहा गया कि आय परीक्षण की इस नई व्याख्या को पिछले (पूर्वव्यापी) प्रभाव से लागू करना बेहद मुश्किल है। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि कुछ मामलों में वेतन से होने वाली आय को शामिल किया जाना व्यावहारिक रूप से जरूरी है।
गणेश सिंह के नेतृत्व में संसदीय समिति लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि सरकार 2004 के एक DoPT पत्र की गलत व्याख्या कर रही है। समिति के अनुसार, बिना सरकारी समानता वाले पदों पर काम करने वाले माता-पिता के ओबीसी उम्मीदवारों पर आय परीक्षण पूरी तरह से गलत तरीके से थोपा जा रहा है।
इस पूरे प्रशासनिक विवाद पर बात करते हुए गणेश सिंह ने कहा कि कार्मिक मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय सिर्फ एक-दूसरे पर अपनी जिम्मेदारी टालते हुए दिख रहे हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि पदों की समानता और आय परीक्षण लागू करने की नीति सामाजिक न्याय मंत्रालय को ही बनानी चाहिए, ताकि बिना देरी किए इसे कैबिनेट के सामने रखा जा सके।
वर्तमान में कार्मिक मंत्रालय का प्रभार सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास है, जबकि सामाजिक न्याय मंत्रालय का नेतृत्व वीरेंद्र सिंह कर रहे हैं। वर्ष 2025 में हुई संसदीय समिति की सुनवाई के दौरान कार्मिक मंत्रालय ने कहा था कि पदों की समानता स्थापित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सामाजिक न्याय मंत्रालय की ही है। अप्रैल 2025 में भी कार्मिक मंत्रालय ने अपनी यही बात दोहराई थी और अगस्त तक यह बताया गया कि सामाजिक न्याय मंत्रालय से समिति को जवाब देने के लिए कहा जा चुका है।
सूत्रों के अनुसार, सामाजिक न्याय मंत्रालय ने अभी तक समिति को इस जटिल मुद्दे पर कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया है। इसी महीने सुप्रीम कोर्ट में जमा किए गए आवेदनों में केंद्र सरकार ने बताया है कि सभी मौजूदा राज्य सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के लिए पदों की समानता स्थापित करने में ही दो साल तक का लंबा समय लग सकता है। इसके अलावा निजी क्षेत्र के पदों के लिए इसमें और भी अधिक वक्त लगने की संभावना जताई गई है।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले और केंद्र सरकार द्वारा दिए गए तर्कों पर जब गणेश सिंह से उनकी राय मांगी गई, तो उन्होंने बेहद सधा हुआ जवाब दिया। उनका कहना था कि जब देश की सर्वोच्च अदालत ने किसी मामले पर अपना अंतिम फैसला सुना दिया है, तो उसके बाद वहां किसी भी व्यक्तिगत राय की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है।
दूसरी तरफ, 11 मार्च को आए रोहिथ नाथन फैसले के नतीजों से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले ओबीसी उम्मीदवारों में इस पूरी प्रक्रिया को लेकर काफी निराशा है। उनका तर्क है कि आय परीक्षण को सही ढंग से लागू करने में कठिनाई का हवाला देकर केंद्र सरकार केवल टालमटोल की रणनीतियां अपना रही है।
पुराने नियमों के तहत नॉन-क्रीमी लेयर के दर्जे से वंचित किए गए सिविल सेवा के एक उम्मीदवार ने बताया कि सरकार सभी पुरानी भर्तियों और प्रवेश प्रक्रियाओं का डर दिखाकर बेवजह दहशत फैला रही है। उम्मीदवार के अनुसार, अदालत ने कभी भी इस फैसले को हर जगह पिछले प्रभाव से लागू करने का निर्देश नहीं दिया है और न ही प्रशासनिक रूप से ऐसा करने की कोई आवश्यकता है।
उम्मीदवारों का यह भी गंभीर आरोप है कि आय परीक्षण को असमान और मनमाने ढंग से लागू करने की समस्या मुख्य रूप से केवल DoPT के स्तर पर ही देखी जा रही है। ऐसे ढेरों मामले हैं जहां संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) एक साल किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में मानता है और अगले ही साल उसे नॉन-क्रीमी लेयर में डाल देता है। इसी तरह, कुछ उम्मीदवारों को UPSC ने क्रीमी लेयर मानकर बाहर का रास्ता दिखा दिया, जबकि अन्य सरकारी भर्तियों में उन्हें नॉन-क्रीमी लेयर का पूरा लाभ मिला।
केंद्र सरकार द्वारा अदालत से मांगी गई स्पष्टीकरण याचिका में DoPT ने पूछा है कि क्या 11 मार्च का फैसला सभी सरकारी भर्तियों में पिछले प्रभाव से लागू किया जाना है। इस पर एक अन्य ओबीसी उम्मीदवार ने सवाल उठाया कि सरकार ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट या संसदीय समिति के समक्ष पहले कभी इन व्यावहारिक समस्याओं का जिक्र क्यों नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के इन आवेदनों के सार्वजनिक होने के बाद ऑल इंडिया ओबीसी स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AIOBCSA) ने भी एक कड़ा बयान जारी कर अपनी नाराजगी जताई है। एसोसिएशन का कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और DoPT के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मुद्दे को सुलझाना महज एक दिन का काम है।
उनका स्पष्ट आरोप है कि सरकार के पास समय या प्रशासनिक क्षमता की कोई कमी नहीं है, बल्कि ओबीसी समुदाय की वास्तविक और जायज चिंताओं को दूर करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का पूरी तरह से अभाव है।
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