
नई दिल्ली: तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी शैक्षणिक संस्थान कथित बकाया फीस की वसूली के लिए छात्रों के ओरिजिनल सर्टिफिकेट नहीं रोक सकता। अदालत ने एक कॉलेज को तीन बीटेक (BTech) स्नातकों के मूल शैक्षणिक प्रमाण पत्र तुरंत वापस करने का सख्त निर्देश दिया है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि ये सर्टिफिकेट पूरी तरह से छात्रों की अपनी संपत्ति हैं।
जस्टिस जुव्वादि श्रीदेवी की अदालत ने बीटेक स्नातकों की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया, जिसमें उन्होंने कॉलेज प्रशासन से अपने ओरिजिनल सर्टिफिकेट वापस दिलाने की गुहार लगाई थी। 21 अगस्त को दिए गए अपने आदेश में अदालत ने कहा कि ये प्रमाण पत्र छात्रों की व्यक्तिगत और शैक्षणिक साख हैं, इसलिए ये निस्संदेह उनकी संपत्ति हैं। कोर्ट के अनुसार, ऐसे में कॉलेज को इन दस्तावेजों को अपने पास रखने का कोई अधिकार नहीं है और इस तरह का कृत्य पूरी तरह से अनुचित है।
इन छात्रों ने कॉलेज में बीटेक कोर्स में दाखिला लेते समय अपने सभी ओरिजिनल शैक्षणिक प्रमाण पत्र जमा किए थे। इनमें सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट (SSC), डिप्लोमा मार्क्स के मेमो, प्रोविजनल और कंसोलिडेटेड सर्टिफिकेट, जाति प्रमाण पत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) शामिल थे। साल 2025 में अपना कोर्स पूरा करने के बाद, छात्रों ने उच्च शिक्षा के लिए अपने इन दस्तावेजों की मांग की थी।
कॉलेज प्रबंधन ने सरकार की तरफ से ट्यूशन फीस की प्रतिपूर्ति (रीइंबर्समेंट) लंबित होने का हवाला देते हुए छात्रों के सर्टिफिकेट रोक लिए। दस्तावेजों को लौटाने के एवज में प्रत्येक छात्र से 70,000 रुपये की मांग की गई। आरोप है कि एक छात्र द्वारा यह रकम चुका दिए जाने के बावजूद उसे उसके ओरिजिनल सर्टिफिकेट नहीं लौटाए गए। परेशान होकर इन छात्रों ने राज्य मानवाधिकार आयोग और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) का भी दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली।
छात्रों का कहना था कि दस्तावेजों के अभाव में उनका एक अकादमिक वर्ष पहले ही बर्बाद हो चुका है। वहीं, साल 2026 के शैक्षणिक सत्र के लिए पोस्टग्रेजुएट (PG) कोर्सेज में दाखिले की प्रक्रिया भी महज तीन दिनों में बंद होने वाली थी। ऐसे में अगर उन्हें तुरंत उनके सर्टिफिकेट नहीं मिलते, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता और वे उच्च शिक्षा हासिल करने के अवसर से पूरी तरह वंचित रह जाते। इसी मजबूरी के चलते उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता मोहम्मद लतीफ खान ने अदालत को बताया कि 2025 में बीटेक पूरा होने के बावजूद, सरकारी फीस प्रतिपूर्ति के नाम पर कॉलेज द्वारा सर्टिफिकेट रोकना पूरी तरह से गैरकानूनी और मनमाना रवैया है।
इस पर सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कॉलेज का यह कदम बिल्कुल अनुचित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कॉलेज का छात्रों पर कोई वित्तीय दावा बनता भी है, तो वह इसकी वसूली के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन कर सकता है, लेकिन इसके लिए ओरिजिनल सर्टिफिकेट को ढाल नहीं बनाया जा सकता। अंततः अदालत ने आदेश की कॉपी मिलते ही कॉलेज को तुरंत सभी सर्टिफिकेट लौटाने का निर्देश दिया।
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