
भोपाल/विदिशा। “हम गांव में आधी मिट्टी-आधी रोटी खाते थे, पर सुखी थे... अब हमें यहां लाकर कह रहे हैं, दुकान खाली करो, हम आखिर जाएं तो कहां जाएं?” द मूकनायक से यह कहते हुए भाग बाई भावुक हो गईं और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
दरअसल विदिशा जिले के करीब 30 किलोमीटर दूर ओलिंजा गांव की रहने वाली भाग बाई पांच साल पहले बेहतर जिंदगी और रोजगार की उम्मीद लेकर अपना गांव छोड़कर विदिशा शहर आई थीं। उनके साथ पति और तीन बच्चे भी हैं और अब पूरा परिवार शहर में किराए के मकान में रहता है। भाग बाई ने द मूकनायक से बातचीत में बताया कि ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ने के लिए अधिकारियों ने उन्हें प्रोत्साहित किया था। उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि योजना से जुड़ने पर दुकान मिलेगी और रोजगार के जरिए परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। इस भरोसे पर वह गांव छोड़कर विदिशा आ गईं और सब्जी की दुकान शुरू की।
भाग बाई कहती हैं, “हम घर पर थे, आधी मिट्टी-आधी रोटी खाते थे, लेकिन सुखी थे। अधिकारियों ने हमें योजना का लाभार्थी बनाकर यहां ले आए। कहा था दुकान मिलेगी, रोजगार मिलेगा, अब वही दुकान खाली करने को कह रहे हैं।” पांच साल में मेहनत करके उन्होंने अपना काम जमा लिया, ग्राहक बनाए और दुकान से होने वाली कमाई से परिवार का खर्च चलने लगा, लेकिन अब अचानक उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
रक्षाबंधन के पर्व पर जहां भाई-बहन के प्रेम और बहनों के सम्मान की बातें हो रही हैं, वहीं मध्यप्रदेश के विदिशा में ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ीं महिलाओं का दर्द सामने आया है। खुद को आत्मनिर्भर बनाने और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालने वालीं ‘लखपति दीदियों’ के सामने अब रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।
जिला पंचायत की दुकानों में महिला समूहों के माध्यम से व्यवसाय कर परिवार का पालन-पोषण कर रहीं महिलाओं को दुकानें खाली करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे परेशान महिलाएं कई बार कलेक्टर से लेकर अन्य अधिकारियों को पीड़ा सुना चुकी है, पर कोई भी हल नहीं निकला।
जानकारी के अनुसार सिविल लाइन रोड पर गायत्री मंदिर के सामने कुल छह दुकानें हैं। इनमें से चार दुकानें महिला समूहों को दी गई थीं। वर्तमान में तीन दुकानों में महिलाएं सब्जी, जनरल स्टोर और चाय-नाश्ते का व्यवसाय कर रही हैं।
इन दुकानों के माध्यम से महिलाएं पिछले करीब पांच वर्षों से अपने परिवार का खर्च चला रही हैं। ओलिंजा की भागवई कुशवाह और ग्राम सुनपुरा की अर्चना राजपूत सहित अन्य महिला समूहों का कहना है कि अब अचानक उनसे दुकानें खाली कराई जा रही हैं।
महिलाओं का आरोप है कि जब उन्हें दुकानें दी गई थीं, तब उनसे व्यवसाय शुरू करने और आत्मनिर्भर बनने का आग्रह किया गया था। लेकिन अब उन्हीं दुकानों के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
द मूकनायक से बातचीत में भाग बाई बताती हैं कि वह पिछले पांच सालों से दुकान का करीब 1050 रुपये प्रतिमाह किराया देती आ रही हैं, लेकिन अब अधिकारियों की ओर से कहा जा रहा है कि या तो दुकान खाली कर दीजिए या फिर करीब 8 हजार रुपये प्रतिमाह किराया जमा करिए। उनका आरोप है कि दुकान देते समय उनसे कहा गया था कि दुकान निशुल्क मिलेगी और रोजगार का अवसर दिया जाएगा।
भाग बाई कहती हैं, “पांच साल मेहनत करके जब काम जमा लिया तो अब दुकान खाली करने को कह रहे हैं। कहते हैं दूसरी महिलाओं को दुकान देंगे, लेकिन अब हम कहां जाएं? हम गरीब लोग आठ हजार रुपये महीना कहां से देंगे?” गांव छोड़कर शहर में किराए के मकान में रह रहे इस परिवार के लिए दुकान सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवन का सहारा है। भाग बाई का सवाल है कि जिस सरकारी योजना पर भरोसा कर उन्होंने अपना गांव और पुराना जीवन छोड़ दिया, अगर आज उसी योजना से मिला रोजगार छिन गया तो पति और तीन बच्चों के साथ वह आखिर जाएंगी कहां।
विदिशा जिले के चीरखेड़ा गांव की एक अन्य महिला मामता सक्सेना भी रोजगार और आत्मनिर्भर बनने की उम्मीद लेकर इसी योजना के तहत गांव छोड़कर विदिशा शहर आई थीं। द मूकनायक से बातचीत में उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि दुकान निशुल्क मिलेगी और इसके जरिए महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हो सकेंगी। शुरुआत में वह गांव से रोज दुकान पर आती-जाती थीं। गांव शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर था, इसलिए उन्हें सुबह चार बजे उठकर घर के काम निपटाने पड़ते और फिर दुकान पहुंचना होता था। रोज की इस मशक्कत के बाद उन्होंने पति और दो बच्चों के साथ विदिशा शहर में किराए का मकान ले लिया। अब उनकी फोटो कॉपी और स्टेशनरी की छोटी सी दुकान ही परिवार की आजीविका का सहारा है।
मामता सक्सेना कहती हैं, “हमें यह कहकर लाया गया था कि दुकान निशुल्क है, लेकिन शुरू से ही हमसे 1050 रुपये प्रतिमाह किराया लिया जाता रहा। अब अचानक दुकान खाली करने को कहा जा रहा है। अधिकारियों से बात की तो पता चला कि करीब आठ हजार रुपये महीने की मांग की जा रही है, नहीं तो दुकान खाली करा देंगे।” उन्होंने कहा कि उन्हें लगा था सरकार महिलाओं के लिए अच्छा काम कर रही है और ऐसी योजनाओं से महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी होकर आत्मनिर्भर बनेंगी, लेकिन अब पांच साल बाद दुकान और रोजगार छिनने की आशंका ने उनकी उम्मीदों को चिंता में बदल दिया है।
उनका कहना है, “हमने सोचा था सरकार हमें आगे बढ़ाने के लिए काम कर रही है, लेकिन अब हमारे साथ ऐसा किया जा रहा है। आखिर इतने साल मेहनत करके काम जमाने के बाद हम कहां जाएं?”
महिलाओं का कहना है कि वे वर्तमान में ग्राम संगठन के माध्यम से करीब 1050 रुपये प्रतिमाह किराया दे रही हैं। नई व्यवस्था में यदि उन्हें टेंडर के माध्यम से दुकान लेनी है तो किराया करीब 8 हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंच सकता है।
महिलाओं का कहना है कि इतनी अधिक राशि देना उनके लिए संभव नहीं है। उनका सवाल है कि जिस योजना का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना है, उसी से जुड़ी महिलाओं का रोजगार क्यों छीना जा रहा है।
भावुक महिलाओं ने कहा, “यह हमें लखपति दीदी बनाने का काम नहीं, बल्कि सड़क पर लाने का काम हो रहा है।”
बीते दिनों, मंगलवार को महिलाएं अपनी समस्या लेकर जनसुनवाई में पहुंचीं। यहां उन्होंने तहसीलदार निधि लोधी, प्रीति पंथी और डिप्टी कलेक्टर निकिता तिवारी के सामने अपनी बात रखी।
महिलाओं के अनुसार, वे अपनी समस्या लेकर कलेक्टर से मिलना चाहती थीं, लेकिन उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। अधिकारियों के सामने अपनी रोजी-रोटी का संकट बताते हुए कुछ महिलाएं भावुक होकर रोने लगीं। बाद में उन्होंने डिप्टी कलेक्टर के सामने भी शिकायत रखी, लेकिन तत्काल कोई समाधान नहीं निकल सका।
इधर, ग्रामीण आजीविका मिशन के परियोजना प्रबंधक संजय चौरसिया ने बताया कि संबंधित दुकानें जिला पंचायत की हैं। दुकानों की संख्या सीमित होने के कारण अब जिला पंचायत ने टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से दुकानों का आवंटन करने का निर्णय लिया है।
उनका कहना है कि टेंडर प्रक्रिया में जो सफल होगा, उसे दुकान आवंटित की जाएगी। नई व्यवस्था का उद्देश्य सभी महिला समूहों को बारी-बारी से अवसर उपलब्ध कराना है।
हालांकि, वर्षों से इन्हीं दुकानों के सहारे परिवार चला रहीं महिलाओं के लिए यह फैसला रोजगार के भविष्य को लेकर बड़ी चिंता बन गया है। रक्षाबंधन के मौके पर सामने आई ‘लखपति दीदियों’ की यह पीड़ा सरकार की महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े कर रही है।
दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) केंद्र सरकार की एक प्रमुख ग्रामीण गरीबी उन्मूलन योजना है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीब परिवारों, विशेष रूप से महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जोड़कर आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाना है। इस मिशन के तहत महिलाओं को समूहों के माध्यम से बचत, बैंक ऋण, वित्तीय सहायता, कौशल प्रशिक्षण, स्वरोजगार और आजीविका के अवसरों से जोड़ा जाता है। योजना का उद्देश्य केवल आर्थिक मदद देना नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें अपने व्यवसाय और आय के स्रोत विकसित करने के लिए सक्षम बनाना भी है। इसके तहत कृषि, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, छोटे व्यापार और अन्य स्थानीय आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा देने का प्रावधान है।
इसी मिशन के तहत ‘लखपति दीदी’ पहल शुरू की गई, जिसका लक्ष्य स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को इतनी स्थायी और नियमित आय के अवसर उपलब्ध कराना है कि उनके परिवार की वार्षिक घरेलू आय कम से कम 1 लाख रुपये या उससे अधिक हो सके। इसके लिए महिलाओं को उनकी क्षमता और स्थानीय संसाधनों के अनुसार व्यवसाय से जोड़ने, प्रशिक्षण देने, बाजार तक पहुंच बनाने और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करने में सहयोग दिया जाता है। सरकार की मंशा महिलाओं को केवल सहायता का लाभार्थी बनाने के बजाय उन्हें आत्मनिर्भर उद्यमी के रूप में स्थापित करने की है, ताकि वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी सक्रिय भूमिका निभा सकें।
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