
भोपाल। मध्य प्रदेश में लंबे समय से चल रहे ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों में अब फिर से तेजी आने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन मामलों को वापस हाईकोर्ट भेजे जाने के बाद बीते 23 मार्च को सुनवाई हुई थी, जिसमें स्पष्ट किया गया कि इन सभी प्रकरणों की सुनवाई अगले महीने की जाएगी।
कोर्ट ने 2 अप्रैल 2026 से एक साथ शुरू करने को कहा है, इसके साथ ही अदालत ने यह भी तय कर दिया है कि 15 अप्रैल से इन मामलों की नियमित सुनवाई होगी और कोशिश की जाएगी कि सभी मामलों का निराकरण दो माह के भीतर कर लिया जाए।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा ट्रांसफर किए गए सभी ओबीसी आरक्षण मामलों को वापस हाईकोर्ट भेज दिया था। साथ ही यह भी कहा था कि इन मामलों की सुनवाई एक विशेष पीठ द्वारा की जाए और तीन माह के भीतर गुण-दोष के आधार पर फैसला सुनाया जाए। इसी आदेश के पालन में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने सुनवाई की थी और आगे की प्रक्रिया तय की।
आदित्य संघी ने कोर्ट को बताया कि याचिका क्रमांक 5901/2019 इस मामले की लीड पिटीशन है, जिस पर पूर्व में कई सुनवाई हो चुकी हैं और 19 मार्च 2019 को अंतरिम आदेश भी पारित किया गया था। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, विनायक शाह और हस्तक्षेपकर्ताओं के वकील वरुण ठाकुर ने इस दावे का विरोध किया। उनका कहना था कि उक्त याचिका अब प्रासंगिक नहीं रह गई है क्योंकि यह 8 मार्च 2019 के अध्यादेश को चुनौती देती थी, जो अब समाप्त हो चुका है और 14 जुलाई 2019 को विधिवत कानून बन चुका है, जिस पर कोई स्थगन नहीं है।
सरकार की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि याचिका के सभी याचिकाकर्ता अब मेडिकल क्षेत्र में स्थापित हैं और अपने-अपने अस्पताल चला रहे हैं, इसलिए इस याचिका को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार ने जो ऐतिहासिक अभिलेख प्रस्तुत किए हैं, वे अभी हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं के साथ संलग्न नहीं हैं। इस पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि उपलब्ध दस्तावेजों को डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया जाए ताकि सुनवाई के दौरान उन पर विचार किया जा सके।
मुख्य न्यायाधीश ने इस पूरे मामले को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी मामलों को 2 अप्रैल 2026 को एक साथ सूचीबद्ध किया जाए। इसके साथ ही सभी पक्षों के अधिवक्ताओं को यह भी निर्देशित किया गया है कि वे अपने-अपने दस्तावेज और आवश्यक अभिलेख 15 अप्रैल से पहले दाखिल कर दें, ताकि नियमित सुनवाई में किसी प्रकार की देरी न हो।
कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि 15 अप्रैल से इन मामलों की नियमित और निरंतर सुनवाई शुरू होगी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप दो माह के भीतर इनका अंतिम निर्णय देने का प्रयास किया जाएगा। इस तरह, लंबे समय से लंबित ओबीसी आरक्षण के मामलों में अब निर्णायक चरण शुरू होने जा रहा है, जिस पर प्रदेश के लाखों अभ्यर्थियों और संबंधित पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं।
अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने द मूकनायक से बातचीत में कहा कि ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों में राज्य सरकार का पक्ष पूरी तरह मजबूत और तथ्यात्मक आधार पर टिका हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्ष 2019 में जो अध्यादेश लाया गया था, उसे बाद में विधिवत कानून का रूप दे दिया गया है और वर्तमान में वही प्रभावी है, जिस पर किसी प्रकार का स्थगन आदेश लागू नहीं है। ऐसे में पुरानी याचिकाओं को लीड पिटीशन मानना न्यायसंगत नहीं होगा।
उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और तथ्यात्मक अभिलेख प्रस्तुत किए हैं, जिन्हें अब हाईकोर्ट के समक्ष भी रखा जाएगा। उनका मानना है कि जब इन सभी दस्तावेजों पर समग्र रूप से विचार होगा, तब राज्य सरकार का पक्ष और अधिक स्पष्ट होकर सामने आएगा।
रामेश्वर ठाकुर ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट द्वारा 2 अप्रैल से सभी मामलों को एक साथ सूचीबद्ध करना और 15 अप्रैल से नियमित सुनवाई तय करना एक सकारात्मक कदम है। इससे लंबे समय से लंबित मामलों के शीघ्र निराकरण का रास्ता साफ होगा और उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार निर्धारित समय-सीमा के भीतर अंतिम निर्णय आ जाएगा।
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