
भोपाल। यूजीसी एक्ट के बाद एक नई बहस सोशल मीडिया पर तेज हो गई है, जिसमें SC-ST एक्ट और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं। इन्हीं दावों के बीच सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश के ललितपुर निवासी विष्णु तिवारी का मामला फिर से वायरल किया जा रहा है। पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि एक निर्दोष व्यक्ति को एससी-एसटी एक्ट के तहत 20 साल जेल में रहना पड़ा और इस कानून ने उसकी जिंदगी तबाह कर दी। कुछ डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म और वेबसाइट्स भी इस खबर को इसी एंगल से हेडलाइन बनाकर प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे भ्रम की स्थिति और गहरी हो रही है।
हालांकि, इस पूरे मामले को केवल एक कानून के संदर्भ में पेश करना अधूरा और भ्रामक हो सकता है। किसी भी आपराधिक मामले में गिरफ्तारी और सजा न्यायालय द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दी जाती है, और बाद में उच्च अदालतों द्वारा फैसलों की समीक्षा भी की जाती है। ऐसे मामलों को एकतरफा तरीके से “कानून की वजह से जिंदगी बर्बाद” जैसे निष्कर्षों के साथ प्रस्तुत करना कानूनी और तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं माना जा सकता।
दरअसल सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर कई भ्रामक पोस्ट प्रसारित की गईं, जिनमें यह दावा किया गया कि विष्णु तिवारी ने एससी-एसटी एक्ट के तहत 20 वर्ष की सजा काटी। द मूकनायक की पड़ताल में सामने आया कि कुछ लोग स्वयं को न्यूज़ पोर्टल या यूट्यूब चैनल संचालक बताते हुए इसी तरह की भ्रामक सामग्री प्रसारित कर रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर, ‘ऋचा पराशर’ नाम के एक यूज़र ने एक रील साझा कर यह दावा किया कि विष्णु तिवारी को एससी-एसटी एक्ट में 20 वर्ष की सजा हुई थी। इसी तरह ‘हिंदी खबर लाइव डिजिट’ नामक एक चैनल ने भी अपनी रील में यही दावा दोहराया।
इसके अतिरिक्त, एक्स सहित अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी कई हैंडल्स द्वारा इसी प्रकार के दावे किए गए। ‘प्रीति गौतम’ नाम के एक हैंडल ने पोस्ट करते हुए कहा कि एक व्यक्ति की ज़िंदगी एससी-एसटी एक्ट के कारण बर्बाद हो गई।
‘द मूकनायक’ इस पूरे प्रकरण की फैक्ट-चेकिंग कानूनी दृष्टिकोण से करेगा, जिसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि मामला किन धाराओं में दर्ज हुआ था, न्यायालय का निर्णय क्या था, अपील में क्या हुआ, और एससी-एसटी एक्ट की वास्तविक भूमिका क्या रही।
सोशल मीडिया पर वायरल दावों और कानूनी तथ्यों के बीच अंतर समझना जरूरी है, ताकि संवेदनशील कानूनों को लेकर गलतफहमियां न फैलें और सार्वजनिक विमर्श तथ्यों पर आधारित रहे।
द मूकनायक ने इस मामले में कानूनी प्रावधानों और सजा की व्यवस्था को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जबलपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर से बातचीत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को 20 वर्ष की सजा हो जाना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि एससी-एसटी एक्ट के साथ अन्य गंभीर आपराधिक धाराएं भी लगती हैं, तो सजा कठोर हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अकेले एससी-एसटी एक्ट के तहत इतनी लंबी सजा दी जाती है।
रामेश्वर ठाकुर के अनुसार, जब पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति वर्ग से संबंधित हो और आरोपी यह जानते हुए उसके साथ कोई आपराधिक कृत्य करता है, तब आरोपी पर संबंधित धाराओं के साथ एससी-एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ी जाती हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यदि किसी मामले में हल्की मारपीट या कथित गाली-गलौज जैसी घटना हो, तो एससी/एसटी एक्ट लगने के बावजूद सजा मामूली होती है। लेकिन यदि मामला हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार या अपहरण जैसे गंभीर अपराधों से जुड़ा हो, तो अदालत संबंधित गंभीर धाराओं के तहत अधिकतम सजा दे सकती है।
ललितपुर के विष्णु तिवारी मामले का जिक्र करते हुए अधिवक्ता ने कहा कि सोशल मीडिया पर यह दावा किया जाना कि किसी व्यक्ति ने केवल एससी/एसटी एक्ट में 20 साल की सजा काटी, कानूनी रूप से गलत है। यदि उस मामले में बलात्कार की धारा (IPC 376) लगी थी, तो सजा उसी धारा के तहत निर्धारित अधिकतम अवधि के अनुसार सुनाई गई होगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब किसी मामले में कई धाराएं लगती हैं, तो सामान्यतः अधिकतम सजा वाली धारा प्रभावी होती है और सजा साथ-साथ (concurrent) चलती है। ऐसे में यह कहना उचित नहीं है कि 20 वर्ष की सजा केवल एससी-एसटी एक्ट के तहत दी गई।
द मूकनायक ने इस मामले में सीधे ललितपुर के विष्णु तिवारी से बातचीत की। विष्णु तिवारी ने बताया कि वर्ष 2000 में अनुसूचित जाति वर्ग की एक महिला ने उनके खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया था। इस प्रकरण में उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) के साथ-साथ एससी/एसटी एक्ट एवं अन्य धाराएं लगाई गई थीं।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 में ललितपुर की निचली अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। इसी सजा के तहत उन्होंने करीब 20 वर्ष जेल में बिताए। बाद में उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए उन्हें दोषमुक्त कर दिया।
विष्णु तिवारी को बरी करते हुए फैसले में हाईकोर्ट अदालत ने कहा, “चिकित्सकीय साक्ष्य से जबरदस्ती यौन संबंध के कुछ संकेत तो मिलने ही चाहिए, भले ही हम पीड़िता के बयान पर ही भरोसा करें कि आरोपी ने उसका मुंह दस मिनट तक बंद रखा और उसे जमीन पर पटक कर पीटा। एक वयस्क महिला को चोटें तो आनी ही चाहिए थीं।”
पीठ ने आगे कहा, “हमारे निष्कर्ष में, चिकित्सकीय साक्ष्य से यह स्पष्ट होता है कि डॉक्टर को कोई शुक्राणु नहीं मिला। डॉक्टर ने स्पष्ट रूप से कहा कि जबरदस्ती यौन संबंध के कोई संकेत नहीं मिले। यह इस निष्कर्ष पर भी आधारित था कि महिला के शरीर पर कोई आंतरिक चोट नहीं थी।”
“तथ्यात्मक आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि तीनों गवाहों की मुख्य परीक्षा और जिरह में कई विरोधाभास हैं। रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों और सबूतों के आधार पर, हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि आरोपी को गलत तरीके से दोषी ठहराया गया है। इसलिए, चुनौती दी गई सुनवाई और आदेश को रद्द किया जाता है और आरोपी को बरी किया जाता है,” फैसले में कहा गया।
द मूकनायक की फैक्ट चेक पड़ताल में यह स्पष्ट हुआ कि विष्णु तिवारी ने करीब 20 वर्ष कारावास में बिताए और बाद में उच्च न्यायालय से बरी होकर निर्दोष साबित हुए। हालांकि, सोशल मीडिया पर यह दावा किया जाना कि उन्हें केवल एससी-एसटी एक्ट के आरोप में 20 साल की सजा हुई थी, भ्रामक है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, उनके विरुद्ध मुख्य और गंभीर धारा भारतीय दंड संहिता की बलात्कार संबंधी धारा (IPC 376) थी, जिसके साथ एससी-एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ी गई थीं। ऐसे में पूरी सजा को केवल एससी-एसटी एक्ट से जोड़कर प्रस्तुत करना तथ्यों का अधूरा और भ्रामक चित्रण है।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना और पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाना है। इस कानून के तहत विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। सामान्यतः अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत आने वाले अपराधों में कम से कम 6 माह से लेकर 5 वर्ष तक की सजा और जुर्माना अनिवार्य है।
कुछ गंभीर मामलों जैसे गंभीर चोट, संपत्ति पर हमला, सामाजिक बहिष्कार, यौन अपराध आदि में सजा 5 वर्ष से आजीवन कारावास तक कठोर हो सकती है, विशेषकर तब जब संबंधित अपराध भारतीय दंड संहिता (IPC) की गंभीर धाराओं के साथ जुड़ा हो, यानी जब अपराध हत्या जैसे अपराधो की श्रेणी में हो, यह कानून अग्रिम जमानत (anticipatory bail) पर भी प्रतिबंध लगाता है (कुछ परिस्थितियों को छोड़कर), तथा मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का प्रावधान करता है ताकि त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
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