
पटना: बिहार सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उम्मीदवारों के लिए एक बेहद अहम निर्देश जारी किया है। राज्य सरकार ने अधिकारियों को सख्त हिदायत दी है कि ओबीसी क्रीमी लेयर का दर्जा तय करने के लिए आय की गणना करते समय माता-पिता की सैलरी और कृषि से होने वाली कमाई को शामिल नहीं किया जाएगा।
राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने 1 सितंबर को सभी जिलाधिकारियों को इस संबंध में एक आदेश जारी किया है। इस आदेश में केंद्र और राज्य द्वारा पहले से जारी आय परीक्षण के नियमों का विस्तार से हवाला दिया गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि क्रीमी लेयर से जुड़ी कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की 1993 की मूल गाइडलाइंस का पूरी सख्ती के साथ पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। सरकार के संज्ञान में यह बात आई थी कि इन नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं हो रहा था।
बिहार सरकार का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। केंद्र ने शीर्ष अदालत से आय परीक्षण को लागू करने के तरीकों पर स्पष्टता मांगी है। दिलचस्प बात यह है कि केंद्र सरकार ने तर्क दिया है कि कुछ खास मामलों में ओबीसी उम्मीदवारों के बीच क्रीमी लेयर की पहचान करने के लिए माता-पिता के वेतन को आय में जोड़ना जरूरी हो सकता है।
हालांकि, बिहार सरकार के इस नए आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के 'रोहित नाथन' फैसले का सीधे तौर पर कोई जिक्र नहीं है। इसी साल मार्च में रोहित नाथन मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि डीओपीटी अलग-अलग ओबीसी श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आय परीक्षण के अलग-अलग नियम लागू कर रहा है।
अदालत ने उस समय इसे 'शत्रुतापूर्ण भेदभाव' करार दिया था, जहां केवल माता-पिता की सैलरी के आधार पर कुछ ओबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण के लाभ से वंचित कर दिया गया था। कोर्ट ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि क्रीमी लेयर की अवधारणा का उद्देश्य उन ओबीसी उम्मीदवारों को बाहर करना है, जिन्होंने सामाजिक और आर्थिक रूप से विशेषाधिकार हासिल कर लिए हैं। केवल आर्थिक मानदंडों के आधार पर किसी को बाहर करना क्रीमी लेयर के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि वह याचिकाकर्ता उम्मीदवारों के लिए सिविल सेवाओं में अतिरिक्त पदों का सृजन करके उन्हें समायोजित करे।
इस फैसले के कुछ महीनों बाद अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नई अर्जियां दाखिल की हैं। केंद्र का तर्क है कि इस फैसले को पिछली तारीख से लागू करना बेहद मुश्किल है। सरकार का यह भी मानना है कि दो अलग-अलग ओबीसी उम्मीदवारों के बीच स्पष्ट अंतर करने के लिए माता-पिता की सैलरी ही एकमात्र तार्किक आधार हो सकती है। अब इस बेहद संवेदनशील मामले पर सुप्रीम कोर्ट में इसी महीने के अंत में आगे की सुनवाई होने की उम्मीद है।
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