महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में बुनियादी सुविधाओं और शैक्षणिक मांगों को लेकर सुलग रहा छात्र आंदोलन अब सड़क पर आ गया है। बीते 8 जुलाई से परिसर में चल रहा यह संघर्ष विश्वविद्यालय प्रशासन की दमनात्मक कार्रवाइयों के बाद वर्धा के जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंच चुका है। प्रशासन की ओर से की गई बेदखली के बाद छात्रों ने 3 सितंबर से गांधी प्रतिमा स्थल पर अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू कर दिया है।
छात्रों का सीधा आरोप है कि प्रशासन ने उनकी मांगों पर बातचीत का रास्ता चुनने के बजाय दमन की नीति अपनाई। पहले छह छात्रों पर आधी रात को एफआईआर दर्ज कराई गई और फिर 1 सितंबर से उनके विश्वविद्यालय परिसर व छात्रावास में प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया। प्रशासन की इस एकतरफा कार्रवाई ने छात्रों के आक्रोश को और भड़का दिया है।
इस विवाद की शुरुआत 6 जुलाई को हुई, जब प्रशासन ने प्रशासनिक भवन के गेट बंद कर दिए थे। इससे छात्रों को अपने जरूरी कार्यालयी कामों के लिए भारी परेशानी हो रही थी। इसी तानाशाही के विरोध में 20 अगस्त को छात्रों ने कुलपति कार्यालय का घेराव किया। छात्रों की मांग थी कि कुलपति प्रोफेसर कुमुद शर्मा बाहर आकर उनसे संवाद करें, लेकिन आरोप है कि संवाद के बजाय उन्हें कार्रवाई और भविष्य खराब करने की धमकियां दी गईं।
छात्रों का दावा है कि कुलानुशासक राकेश मिश्रा और प्रभारी कुलानुशासक संदीप सापताले की एफआईआर दर्ज कराने की धमकी के बाद उसी रात करीब 11 बजे छह छात्रों को चुनकर उनके खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करा दिया गया। आंदोलनकारियों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि निशाना बनाए गए इन छह छात्रों में से तीन दलित और तीन ओबीसी समुदाय से हैं। छात्रों के अनुसार यह वंचित तबके की आवाज को दबाने का एक सोचा-समझा संस्थागत प्रयास है।
छात्र शिवपूजन और राकेश अहिरवार के मुताबिक, अपने अधिकारों की मांग करने वालों पर ऐसी प्रशासनिक गाज गिरना विश्वविद्यालय में नया नहीं है। एफआईआर में नामजद शोधार्थी रामचंद्र, निरंजन कुमार और राजेश कुमार यादव को वर्ष 2024 में भी निलंबित किया गया था। तब बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के आदेश के बाद ही लगभग दो साल बाद उनकी बहाली हो सकी थी। छात्रों का कहना है कि यह बार-बार होने वाली कार्रवाई प्रशासन के लगातार बढ़ते दबाव को दर्शाती है।
कैंपस से बाहर किए जाने के दौरान छात्रों के साथ हुए अमानवीय व्यवहार ने आंदोलन को और तीखा कर दिया। छात्रों का आरोप है कि 1 सितंबर को प्रशासनिक भवन के सामने चल रहे धरना स्थल की बिजली काट दी गई और वॉशरूम व पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी बंद कर दी गईं। शोधार्थी निरंजन ने बताया कि सुबह 10 बजे नोटिस देकर उन्हें फौरन बाहर निकाल दिया गया। छात्रावास में रखे छात्रों के कपड़े, किताबें और रोजमर्रा का सारा सामान प्रशासन ने जब्त कर लिया है, जिससे छात्र उसी हाल में सड़क पर आ गए हैं, जिस हाल में वे उस वक्त थे।
अपनी मांगों पर अडिग छात्रों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी शर्तें नहीं मानी जातीं, उनका सत्याग्रह जारी रहेगा। उनकी प्रमुख मांगों में छह दलित-पिछड़े छात्रों पर दर्ज एफआईआर और कैंपस प्रतिबंध की तत्काल वापसी शामिल है। इसके अलावा, 20 अगस्त को छात्र राकेश अहिरवार पर कुलपति की गाड़ी से हुए कथित जानलेवा हमले तथा शोध छात्र रामचंद्र के साथ हुए जातिगत भेदभाव के मामले में 24 अगस्त को रामनगर थाने में दी गई शिकायत पर तत्काल एफआईआर दर्ज कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है।
अकादमिक स्तर पर छात्र स्त्री अध्ययन एवं फिल्म अध्ययन विभाग को वर्धा मुख्य परिसर में दोबारा शुरू करने, 2022 से अटकी पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया बहाल करने और नए डिप्लोमा कोर्स शुरू करने की मांग कर रहे हैं। बुनियादी सुविधाओं के तहत सभी छात्रावासों में उचित मेस, परिसर में कम से कम तीन कैंटीन, जेरॉक्स सेंटर, स्टेशनरी, स्वच्छ पानी, 24 घंटे लाइब्रेरी, वातानुकूलित रीडिंग रूम और 24 घंटे चिकित्सालय के साथ डॉक्टरों की नियुक्ति की मांग प्रमुखता से उठाई गई है। प्रशासन के स्तर पर कुलसचिव कादर नवाज खान को पद से हटाकर उन पर लगे आरोपों की जांच और स्थाई कुलसचिव की नियुक्ति की सख्त मांग भी की गई है।
सड़क पर पहुंचे विश्वविद्यालय के इस छात्र संघर्ष को अब व्यापक सामाजिक और राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। आंदोलन स्थल पर भारतीय लोकशाही अभियान, एनएसयूआई, सीआईटू, बीएसपी और वंचित बहुजन अघाड़ी जैसे संगठनों के प्रतिनिधि पहुंचकर अपना समर्थन जता चुके हैं। छात्रों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि प्रशासनिक दबाव, मुकदमों और पाबंदियों के बावजूद उनका यह संघर्ष तब तक नहीं थमेगा, जब तक उनकी सभी जायज मांगें पूरी नहीं हो जातीं।
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