
नई दिल्ली: 2027 की जनगणना में जातियों की गिनती के लिए मौजूदा केंद्रीय और राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूचियों का उपयोग न करने के केंद्र सरकार के तर्क को OBC समूहों ने सिरे से खारिज कर दिया है। शुक्रवार, 4 सितंबर को विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने कहा कि सरकार की यह दलील पूरी तरह से गलत है कि OBC सूचियों में जातियों के बजाय वर्गों का उल्लेख है।
हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि सरकार इसी आधार पर मौजूदा सूचियों से जातियों के नाम और कोड नहीं ले रही है। OBC संगठनों की स्पष्ट मांग है कि यदि मौजूदा सूचियों में कोई कमी या विसंगतियां हैं, तो उन्हें पूरी तरह से दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार को विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए ताकि इन सूचियों को सुव्यवस्थित किया जा सके और सही जातियों के नाम निकालकर उनका इस्तेमाल जनगणना में हो।
सरकार की इस दलील के सामने आने के बाद से ही विवाद गहरा गया है। मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे वरिष्ठ विपक्षी नेताओं के साथ-साथ कई संगठन अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा अन्य जातियों की गिनती के लिए अपनाई जा रही 'ओपन-कॉलम' (खुले कॉलम) कार्यप्रणाली की उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं।
जातिगत जनगणना की मांग का सबसे बड़ा ऐतिहासिक आधार देश भर में OBC आबादी की सही संख्या जानना रहा है। वर्तमान में यह आंकड़ा केवल 1931 के ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुमानों पर ही आधारित है।
ऑल इंडिया ओबीसी स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AIOBCSA) ने शुक्रवार को इस मुद्दे पर कड़ा एतराज जताया। संगठन ने कहा कि जब सरकार आरक्षण और अन्य कल्याणकारी उपायों के लिए इन समुदायों को OBC के रूप में मान्यता देती है, तो जनसंख्या के आंकड़े जुटाते समय उनकी जातिगत पहचान को अचानक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
संगठन के अनुसार जनगणना का असल मकसद देश की सामाजिक वास्तविकताओं को सटीकता से सामने लाना है। वर्ग और जाति के बीच एक कृत्रिम अंतर पैदा करके सरकार को जातिगत गणना से बचने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
तेलंगाना सरकार के पूर्व मंत्री, टीआरएस (TRS) नेता और OBC जन प्रतिनिधि फोरम के राष्ट्रीय अध्यक्ष वी. श्रीनिवास गौड़ ने भी इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के ऐसे स्पष्टीकरणों से यह धारणा मजबूत होती है कि उन्होंने जनगणना के लिए हामी तो भर दी है, लेकिन इसे सही तरीके से लागू करने की उनकी कोई वास्तविक मंशा नहीं है।
बैकवर्ड क्लासेस इंटेलेक्चुअल फोरम के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी टी. चिरंजीवुलु ने भी सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए। उनका तर्क है कि जातियों के नामों को कोडबद्ध न करने और उनकी आबादी की गणना SC और ST की तर्ज पर न करने का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को दिए गए आरक्षण की कमियों को छिपाना है।
टी. चिरंजीवुलु ने एक मीडिया हाउस से बातचीत में बताया कि जब EWS आरक्षण लागू किया गया था, तब सरकार ने यह अनुमान लगाने की कोशिश की थी कि गैर-SC/ST/OBC आबादी लगभग 35 से 40 प्रतिशत है। उन्हें लगता है कि सरकार यह भली-भांति जानती है कि यदि 2027 की जनगणना में वैज्ञानिक तरीके से OBC आबादी की सटीक गणना हो गई, तो EWS आबादी का उनका शुरुआती अनुमान गलत और बहुत अधिक साबित होगा।
सरकार के तर्कों का खंडन करते हुए AIOBCSA ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि प्रशासनिक स्तर पर हमेशा समुदायों की विशिष्ट सामाजिक और जातिगत पहचान का उपयोग होता है। यहां तक कि EWS प्रमाणपत्र भी निर्धारित सामाजिक मानदंडों के माध्यम से ही लाभार्थी की पहचान करते हैं, जो यह दिखाता है कि प्रशासनिक वर्गीकरण और सामाजिक पहचान दोनों एक साथ काम कर सकते हैं।
छात्र संगठन ने आगे स्पष्ट किया कि यदि मौजूदा OBC सूचियां अपर्याप्त हैं, तो समाधान उन्हें छोड़ना बिल्कुल नहीं है। इसके बजाय सरकार को चाहिए कि वह उचित परामर्श करे, नामों का मानकीकरण करे और जातियों व समुदायों को अद्वितीय (यूनिक) कोड प्रदान करे। केवल इसी व्यवस्थित तरीके से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रत्येक जाति की सटीक गणना हो सके।
इससे पहले इसी सप्ताह राष्ट्रीय अध्यक्ष जी. किरण कुमार के नेतृत्व में AIOBCSA के प्रतिनिधियों ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी। इस अहम बैठक में भारत में OBC समुदायों को प्रभावित करने वाले कई प्रमुख मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की गई, जिनमें सरकार द्वारा अपनाई जा रही जातिगत जनगणना की मौजूदा कार्यप्रणाली का मुद्दा सबसे प्रमुख था।
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