धर्म बदलने से खत्म नहीं होता जातिगत भेदभाव: YSR कांग्रेस ने उठाई दलित ईसाइयों को SC का दर्जा देने की मांग

वाईएसआर कांग्रेस का बड़ा कदम: जस्टिस केजी बालकृष्णन आयोग को ज्ञापन सौंपकर दलित ईसाइयों के लिए मांगा आरक्षण और एससी का दर्जा, कहा- धर्म बदलने से नहीं बदलती सामाजिक स्थिति।
Maddila Gurumoorthy, YSR Congress
क्या धर्म बदलने से जातिगत भेदभाव खत्म हो जाता है? YSR कांग्रेस ने की दलित ईसाइयों को SC का दर्जा देने की जोरदार मांग।
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नई दिल्ली: वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (SC) की सूची में शामिल करने की जोरदार मांग उठाई है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर पार्टी ने सीधे जस्टिस केजी बालकृष्णन आयोग का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी का साफ तौर पर कहना है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी इन लोगों को जाति आधारित बहिष्कार, सामाजिक अलगाव और आर्थिक तंगी का लगातार सामना करना पड़ता है।

तिरुपति से सांसद मद्दीला गुरुमूर्ति के नेतृत्व में पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने शनिवार को आयोग को अपना विस्तृत ज्ञापन सौंपा। आपको बता दें कि यह आयोग विशेष रूप से इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को एससी का दर्जा देने के मुद्दे का अध्ययन करने के लिए अक्टूबर 2002 में गठित किया गया था। हाल ही में इस आयोग के कार्यकाल को तीसरी बार विस्तार दिया गया है।

मौजूदा समय में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से ताल्लुक रखने वाले दलितों को ही एससी सूची में जगह मिली है। हालांकि, लंबे समय से इस्लाम और ईसाई धर्म अपना चुके दलितों को भी इस सूची में शामिल करने की मांग उठती रही है।

वाईएसआर कांग्रेस ने अपने ज्ञापन में इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि एससी की मान्यता न मिलने के कारण दलित ईसाइयों को कई बुनियादी अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है। उन्हें शिक्षा और रोजगार में आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, छात्रवृत्ति, आवास लाभ और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का वह फायदा नहीं मिल पा रहा है, जो समान स्थिति वाले अन्य अनुसूचित जातियों को आसानी से उपलब्ध हैं।

पार्टी का तर्क है कि दलित ईसाइयों को इस सूची से बाहर रखना पूरी तरह से धर्म पर आधारित एक मनमाना वर्गीकरण है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है। ईसाई धर्म अपनाने मात्र से किसी की जातिगत पहचान या उससे जुड़ी ऐतिहासिक और सामाजिक विसंगतियां खत्म नहीं हो जाती हैं।

संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार होने के बावजूद, दलित ईसाई आज भी संस्थागत भेदभाव का शिकार हो रहे हैं। ज्ञापन में इस बात का भी प्रमुखता से जिक्र किया गया है कि 1950 के आदेश से यह साफ होता है कि धर्म बदलने से जातिगत विसंगतियां दूर नहीं होतीं।

इसी आधार पर काका कालेलकर आयोग की सिफारिश पर 1956 में सिख दलितों को एससी का दर्जा दिया गया था। इसके बाद अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर बने उच्चाधिकार प्राप्त पैनल की सिफारिशों के बाद 1990 में बौद्ध दलितों को भी इस सूची में शामिल किया गया था।

पार्टी ने जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग (2007) की रिपोर्ट का भी प्रमुखता से हवाला दिया। उस रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया था कि दलित ईसाई और दलित मुस्लिम भी अन्य एससी समुदायों की तरह ही सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। आयोग ने 1950 के आदेश में मौजूद धर्म-आधारित प्रतिबंध को हटाकर धर्म-तटस्थ आधार पर एससी का दर्जा देने की जोरदार सिफारिश की थी।

दलित ईसाइयों को बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और 15(1) (धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव का निषेध) के बिल्कुल खिलाफ माना गया है। इसके अलावा, यह स्थिति सकारात्मक कार्रवाई से जुड़े अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के मूल संवैधानिक इरादे को भी विफल करती है।

वाईएसआर कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान कानूनी स्थिति संविधान के अनुच्छेद 46 के उस दृष्टिकोण को भी कमजोर करती है, जो राज्य को कमजोर वर्गों को सामाजिक अन्याय से बचाने के लिए बाध्य करता है। केवल धर्म की वजह से दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाले सख्त कानूनी संरक्षण से भी पूरी तरह बाहर रखा गया है।

Maddila Gurumoorthy, YSR Congress
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