
चेन्नई- किसी फिल्म को देखे बिना उसके एक दृश्य पर राय बना लेना कितना आसान है। सोशल मीडिया के दौर में कुछ सेकंड की क्लिप पूरी कहानी पर भारी पड़ जाती है और फिर शुरू होती है बहस क्या दिखाया जाना चाहिए, क्या नहीं, बच्चों को क्या देखना चाहिए और समाज किस रिश्ते को ‘सामान्य’ माने। तमिल फिल्म ‘डोरोथी’ के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है। क्वियर रिश्तों, ट्रांसजेंडर पहचान और समाज की तय की हुई लैंगिक सीमाओं को कहानी का हिस्सा बनाने वाली इस फिल्म के रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर विरोध के स्वर तेज हो गए।
कुछ लोग इसे परिवार और बच्चों के संदर्भ में सवालों के घेरे में रख रहे हैं, तो वहीं ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े लोग और फिल्म के समर्थक कह रहे हैं: “राय बनाने से पहले फिल्म तो देखो।”
डोरोथी को लेकर प्रतिक्रियाओं का अंतर भी चर्चा में है। फिल्म को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) में स्क्रीनिंग के बाद स्टैंडिंग ओवेशन मिलने की रिपोर्ट सामने आई थी। इसके कुछ ही समय बाद भारत में रिलीज के साथ फिल्म सोशल मीडिया विवाद में घिर गई। वहीं बताया जाता है कि फिल्म में दिखाए गए समलैंगिक आकर्षण और LGBTQ+ थीम के तत्वों के कारण मलेशिया में सिनेमाघरों में रिलीज करने से रोक दिया गया है।
एक ही फिल्म के प्रति अलग-अलग दर्शक समूहों की अलग प्रतिक्रिया होना अपने आप में असामान्य नहीं है। लेकिन डोरोथी के मामले में यह अंतर इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि फिल्म का विषय ही लैंगिक पहचान और सामाजिक स्वीकृति जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा है।
आखिर डोरोथी में ऐसा क्या है जिसने तमिल सिनेमा में यह बहस छेड़ दी है?
कार्तिक सुब्बाराज के निर्देशन में बनी ‘डोरोथी’ में कीर्ति सुरेश, सनंत और रिशिकांत प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म 25 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई।
फिल्म की कहानी ग्रामीण तमिलनाडु के सामाजिक परिवेश में आगे बढ़ती है और इसके केंद्र में बचपन के दो दोस्त कार्थी और सुब्बू हैं। बचपन से साथ बड़े हुए इन दोनों की दोस्ती उस सामाजिक माहौल में आकार लेती है, जहां लड़कों और पुरुषों के लिए व्यवहार के कुछ तय मानक हैं- मजबूत रहना, भावनाएं न दिखाना और समाज द्वारा निर्धारित ‘मर्दानगी’ के ढांचे में फिट बैठना।
कहानी आगे बढ़ने के साथ सुब्बू की लैंगिक पहचान महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके बाद फिल्म दोस्ती और रिश्तों की कहानी से आगे बढ़कर यह सवाल उठाती है कि किसी व्यक्ति की पहचान को तय करने का अधिकार किसके पास है- खुद उस व्यक्ति के पास या उस समाज के पास जो उसके लिए कुछ निश्चित भूमिकाएं तय करता है?
फिल्म में ट्रांसजेंडर पहचान के साथ-साथ पितृसत्ता, सामाजिक पूर्वाग्रह, जाति, हिंसा और पुरुषत्व की पारंपरिक परिभाषा को भी कहानी में जगह दी गई है।
यही वह बिंदु है जहां डोरोथी को लेकर बहस केवल एक फिल्म के कथानक की बहस नहीं रह जाती।
फिल्म के रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर इसके कुछ दृश्यों और संवादों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। खास तौर पर ट्रांसजेंडर पहचान और दो पुरुष किरदारों के बीच संबंधों से जुड़े हिस्सों ने बहस को तेज किया।
कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने फिल्म के LGBTQ+ चित्रण पर आपत्ति जताई। कुछ पोस्टों में इसे ‘फैमिली वैल्यूज’ और बच्चों के संदर्भ में भी सवालों के घेरे में रखा गया। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि फिल्म ऐसे रिश्तों को ‘नॉर्मलाइज’ करने की कोशिश करती है।
इसके अलावा फिल्म को कथित ‘माफिया प्रभाव’, राजनीतिक समर्थन और सेंसर मंजूरी से जोड़ने वाले दावे भी सोशल मीडिया पर दिखाई दिए। हालांकि फिल्म को पसंद करने वाले दर्शकों का कहना है कि ऐसी फ़िल्म बनाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए। यह बहुत बोल्ड था। यह शायद हर किसी को पसंद न आए, लेकिन यह एक ऐसी कहानी थी जिसे सुनाना ज़रूरी था और डायरेक्टर ने इसे बहुत खूबसूरती से सुनाया।
फिल्म के बचाव में सोशल मीडिया पर एक अलग प्रतिक्रिया देखने को मिली। एक यूजर ने लिखा कि ऑनलाइन होने वाली तमाम नफरत उन लोगों की ओर से आ रही है जिन्होंने फिल्म देखी ही नहीं, जबकि फिल्म देखने वाले दर्शकों की वास्तविक प्रतिक्रिया इससे अलग है। फिल्म समर्थकों का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली कुछ सेकंड की क्लिप या किसी एक संवाद से पूरी कहानी का अर्थ निकालना उचित नहीं है। उनका कहना है कि दर्शक फिल्म के संदेश से असहमत हो सकते हैं, लेकिन पहले पूरी फिल्म देखना और उसके बाद उसके कथानक, अभिनय, निर्देशन या सामाजिक संदेश पर सवाल उठाना अधिक उचित होगा।
विवाद के बीच चेन्नई में ट्रांसजेंडर समुदाय के एक वर्ग ने फिल्म का बचाव किया है और आम लोगों से इसकी आलोचना करने से पहले इसे देखने की अपील की है। मीडिया से बात करते हुए, एक ट्रांसवुमन कलाईममानी सुधा ने कहा, "यह फ़िल्म लोगों की आँखें खोलने वाली है और दिखाती है कि ट्रांस-लोग बचपन से कैसे जीते हैं। संगठन के तौर पर हम इतने बड़े स्तर पर लोगों तक यह संदेश नहीं पहुँचा पाए, इसलिए हमें खुशी है कि यह फ़िल्म ऐसा कर रही है।" उन्होंने बताया कि पहले कई फ़िल्मों में इस समुदाय को बहुत बुरे ढंग से दिखाया गया है और कहानी को आगे बढ़ाने के लिए सच्चाई नहीं दिखाई गई। एक ट्रांसवुमन वैष्णवी ने कहा, "यह फ़िल्म देखकर ऐसा लगा जैसे मैं बड़े पर्दे पर अपना ही अनुभव देख रही हूँ। हमारी ज़िंदगी इस फ़िल्म में है।"
समुदाय से जुड़े लोगों का कहना है कि फिल्म में ट्रांसजेंडर लोगों के जीवन और अनुभवों को मुख्यधारा के सिनेमा में जगह दी गई है। उनके मुताबिक, किसी फिल्म के चित्रण पर बहस हो सकती है, लेकिन किसी समुदाय के अस्तित्व और उसके अनुभवों को ही विवाद का कारण नहीं बनाया जाना चाहिए।
उनका कहना है कि डोरोथी को सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे छोटे-छोटे वीडियो के आधार पर नहीं, बल्कि पूरी कहानी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
फिल्म को लेकर जारी आलोचना के बीच निर्देशक कार्तिक सुब्बाराज ने भी दर्शकों से पहले फिल्म देखने की अपील की है।
उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को फिल्म में ट्रांसजेंडर समुदाय के चित्रण या किसी खास हिस्से से आपत्ति है, तो वह फिल्म देखने के बाद उस पर चर्चा कर सकता है।
सुब्बाराज ने यह भी कहा है कि फिल्म ने कम से कम लैंगिक पहचान और सामाजिक स्वीकृति जैसे विषयों पर बातचीत शुरू की है। निर्देशक की प्रतिक्रिया का मूल तर्क यही है कि किसी फिल्म के बारे में राय उसके पूरे संदर्भ को देखने के बाद बननी चाहिए, न कि केवल सोशल मीडिया पर प्रसारित किसी दृश्य के आधार पर।
विख्यात फिल्म क्रिटिक भारद्वाज रंगन ने डोरोथी का रिव्यू किया, वे कहते हैं यह कार्तिकसुब्बाराज की बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है। इलैयाराजा का म्यूज़िक शानदार है, हालांकि इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या इतनी कम चीज़ों वाली फ़िल्म को ऐसे म्यूज़िक की ज़रूरत थी। ऐसा लगता है कि स्क्रीनप्ले आखिरी सीन से पीछे की ओर कहानी बनाने की कोशिश कर रहा था, और एक इमोशनल स्थिति से दूसरी स्थिति में बदलाव को ठीक से नहीं दिखाया गया है। इसमें एक ही बात बार-बार कही गई है, और इस डायरेक्टर के सबसे अच्छे काम में जो ज़बरदस्त एनर्जी होती है, वह इसमें नहीं है।
फिल्ममेकर राजुमुरुगन फिल्म की तारीफ करते हुए लिखते हैं, " 'डोरोथी' तमिल सिनेमा की बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है। यह फ़िल्म हमारे सामने एक ऐसे हथियार की तरह खड़ी है जो जेंडर से जुड़ी असमानताओं को खूबसूरती और मज़बूती से खत्म करती है। जो बातें अक्सर अनकही रह जाती हैं, उन्हें कहने की हिम्मत दिखाने और उसे इतनी शानदार ढंग से पेश करने के लिए हमारे दोस्त कार्तिक सुब्बाराज जितनी भी तारीफ़ें पाएं, कम हैं। सनथ, ऋषिकंध, कीर्ति सुरेश समेत सभी कलाकारों और सिनेमैटोग्राफर थिरु समेत फ़िल्म की पूरी टीम को उनके शानदार योगदान के लिए बधाई। "
फिल्म को लेकर चल रही बहस में उसका एक महत्वपूर्ण पहलू कई बार पीछे छूट जाता है: पुरुषत्व की सामाजिक परिभाषा।
फिल्म उस सामाजिक व्यवस्था को भी सामने रखती है जिसमें लड़कों से बचपन से ही एक खास तरह का व्यवहार करने की उम्मीद की जाती है। रोना कमजोरी माना जाता है, संवेदनशील होना कमजोरी माना जाता है और आक्रामकता को पुरुषत्व से जोड़ दिया जाता है।
सुब्बू का किरदार इसी सामाजिक ढांचे के भीतर अपनी पहचान के साथ संघर्ष करता है।
इस लिहाज से फिल्म का सवाल केवल यह नहीं है कि समाज ट्रांसजेंडर व्यक्ति को स्वीकार करता है या नहीं। सवाल यह भी है कि समाज पुरुष और महिला होने की अपनी परिभाषाएं किस तरह बनाता है और उनसे अलग खड़े व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है।
सोशल मीडिया पर फिल्म की आलोचना करने वाले कुछ लोगों ने इसे बच्चों और परिवार के संदर्भ में देखा है।
उनका सवाल है कि मुख्यधारा के सिनेमा में समान-लैंगिक आकर्षण और ट्रांसजेंडर पहचान को दिखाने से समाज में इन रिश्तों और पहचानों को सामान्य बनाने का प्रभाव पड़ सकता है।
कुछ लोगों ने इसे पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों के लिए चुनौती के रूप में भी पेश किया है।
दूसरी ओर, फिल्म समर्थकों का तर्क है कि सिनेमा में हिंसा, अपराध, नशा, हत्या और कई अन्य विवादित सामाजिक विषय लंबे समय से दिखाए जाते रहे हैं। उनके अनुसार LGBTQ+ पात्रों या रिश्तों के चित्रण को अलग मानक से देखना भी बहस का विषय है।
तमिल फिल्म निर्देशक मोहन क्षत्रियण की LGBTQ+ प्रतिनिधित्व को लेकर की गई सोशल मीडिया टिप्पणी भी इस बहस का हिस्सा बन गई।
रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने दावा किया कि तमिल सिनेमा में LGBTQ+ विषयों वाली सामग्री के पीछे NGO फंडिंग और युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है। उन्होंने इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से जोड़कर सवाल उठाए।
फिल्म के विवाद में एक अंतरराष्ट्रीय मोड़ तब आया जब रिपोर्टें सामने आईं कि ‘डोरोथी’ को मलेशिया में सिनेमाघरों में रिलीज नहीं किया गया है।
कुछ मीडिया रिपोर्टों ने इसके पीछे LGBTQ+ कंटेंट और समान-लैंगिक आकर्षण को कथित कारण बताया। लेकिन इस दावे के साथ एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है।
अब तक किसी सार्वजनिक आधिकारिक मलेशियाई सेंसर आदेश का हवाला नहीं दिया गया है, जिसमें साफ तौर पर यह लिखा हो कि फिल्म को LGBTQ+ कंटेंट के कारण रोका गया। मलेशिया में फिल्म की कथित रिलीज रोक की खबर के बाद सोशल मीडिया पर मलेशिया में LGBTQ+ लोगों के साथ व्यवहार को लेकर भी टिप्पणियां सामने आईं।
तमिल नाडू से ट्रांसजेंडर राइट्स एक्टिविस्ट डॉ. गार्गी की एक सोशल मीडिया टिप्पणी में डोरोथी की कथित रोक को टी. नहावीन मामले के संदर्भ में देखा गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस देश में कथित तौर पर ‘feminine’ होने के कारण नहावीन को बुलिंग और हिंसा का सामना करना पड़ा, वहां डोरोथी जैसी फिल्म की रिलीज पर रोक की खबर सामने आना विरोधाभासी है।
मलेशिया के 18 वर्षीय टी. नहावीन पर 2017 में हमला हुआ था। मानवाधिकार संगठन Human Rights Watch के अनुसार उन्हें पहले उनके कथित ‘feminine’ व्यवहार को लेकर बुली किया जाता था। हमले के बाद यौन हिंसा और गंभीर मारपीट के आरोप सामने आए थे। इस मामले में वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया चली और अलग-अलग अदालतों में अलग-अलग फैसले आए।
डोरोथी के विवाद के बीच सोशल मीडिया पर दक्षिण भारतीय सिनेमा की कई दूसरी फिल्मों का भी उल्लेख किया जा रहा है।
मलयालम फिल्म ‘Kaathal – The Core’, जिसमें ममूटी ने अभिनय किया था, का उदाहरण दिया जा रहा है। इसके अलावा Moothon और Mumbai Police जैसी फिल्मों का भी उल्लेख हुआ है।
इन फिल्मों की कहानियां अलग हैं और उन्हें डोरोथी के समान नहीं माना जा सकता। लेकिन इनका जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि दक्षिण भारतीय सिनेमा में LGBTQ+ पहचान, यौनिकता और सामाजिक स्वीकृति पर आधारित कहानियां पहले भी सामने आती रही हैं।
Kaathal – The Core में विवाह, यौन पहचान और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच संघर्ष को कहानी का हिस्सा बनाया गया था। डोरोथी इन सवालों को अपनी कहानी और पात्रों के जरिए अलग सामाजिक संदर्भ में सामने रखती है।
डोरोथी के आसपास चल रही बहस को अगर अलग-अलग हिस्सों में देखा जाए तो तस्वीर कुछ साफ होती है। एक तरफ वे लोग हैं जो फिल्म में LGBTQ+ और ट्रांसजेंडर पहचान के चित्रण को लेकर असहज हैं। वे परिवार, बच्चों, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक मान्यताओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
दूसरी तरफ ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े लोग और फिल्म समर्थक हैं, जो कहते हैं कि उनके जीवन और पहचान को पर्दे पर दिखाना भी प्रतिनिधित्व का हिस्सा है।
और तीसरी तरफ एक बड़ा सवाल है: क्या किसी फिल्म को उसके पूरे संदर्भ में देखा जा रहा है या सोशल मीडिया पर वायरल कुछ सेकंड की क्लिप ही उसकी पूरी कहानी तय कर रही है?
यही वजह है कि डोरोथी अब सिर्फ एक तमिल फिल्म नहीं रह गई है। यह लैंगिक पहचान, क्वियर रिश्तों, ट्रांसजेंडर प्रतिनिधित्व, पुरुषत्व, परिवार और सेंसरशिप पर चल रही व्यापक सामाजिक बहस का हिस्सा बन चुकी है।
और शायद इसी वजह से इस विवाद के बीच सबसे ज्यादा दोहराई जा रही अपील भी सबसे सरल है: “राय बनाने से पहले फिल्म तो देखो।”
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