
भोपाल। मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के जाति प्रमाण पत्रों को लेकर राज्य सरकार ने सख्त रुख अपना लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद प्रदेश के सभी कलेक्टरों, संभागायुक्तों और संबंधित विभागों को विस्तृत आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि एससी-एसटी प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की लापरवाही या नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार ने विशेष रूप से अंतर-राज्यीय प्रवास यानी दूसरे राज्यों से मध्य प्रदेश में आकर बसने वाले परिवारों के मामलों में गहन सत्यापन के निर्देश दिए हैं। अब ऐसे आवेदकों को अपने मूल राज्य के दस्तावेजों के साथ-साथ मध्य प्रदेश में निवास की अवधि और वैधानिक स्थिति से जुड़े प्रमाण भी प्रस्तुत करने होंगे।
राज्य सरकार का यह कदम केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 10 मार्च 2026 को जारी किए गए दिशा-निर्देशों के बाद सामने आया है। केंद्र ने सभी राज्यों को निर्देश दिए थे कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित की जाए तथा पूर्व में जारी नियमों और सर्कुलरों का कड़ाई से पालन किया जाए। इसी के तहत मध्य प्रदेश सरकार ने 1 अगस्त 1985, 11 नवंबर 2005 और 22 जनवरी 2014 को जारी आदेशों को फिर से प्रभावी रूप से लागू करने के निर्देश दिए हैं। सरकार का मानना है कि कई मामलों में नियमों के उल्लंघन के कारण अपात्र लोग एससी-एसटी आरक्षण और अन्य संवैधानिक सुविधाओं का लाभ उठा लेते हैं, जबकि वास्तविक पात्र व्यक्ति वंचित रह जाते हैं।
जारी आदेश में अधिकारियों को स्पष्ट कहा गया है कि जाति प्रमाण पत्र जारी करते समय यह जांच अनिवार्य होगी कि आवेदक वास्तव में उस राज्य का “मूल निवासी” है या नहीं। विशेष रूप से उन परिवारों की जांच की जाएगी जो उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों से मध्य प्रदेश में आकर बसे हैं। सरकार को आशंका है कि कुछ मामलों में प्रवास के बाद स्थानीय स्तर पर जाति प्रमाण पत्र बनवाकर आरक्षण का लाभ लेने की कोशिशें की जा रही हैं। ऐसे मामलों में अब जिला प्रशासन, एसडीएम और संबंधित जांच समितियों को दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन करना होगा।
सरकार द्वारा पुनः लागू किए जा रहे 1 अगस्त 1985 के आदेश को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस आदेश में यह निर्धारित किया गया था कि किसी भी एससी-एसटी व्यक्ति की पहचान और उसके प्रमाण पत्र का आधार यह होगा कि राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य के लिए अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की सूची अधिसूचित किए जाने के समय वह व्यक्ति या उसका परिवार किस राज्य का मूल निवासी था। मध्य प्रदेश में इस संदर्भ में वर्ष 1950 से निवास संबंधी दस्तावेजों को मान्य माना गया है। इसका अर्थ यह है कि केवल वर्तमान निवास के आधार पर कोई व्यक्ति एससी-एसटी का लाभ नहीं ले सकेगा, बल्कि उसके ऐतिहासिक और वैधानिक निवास का रिकॉर्ड भी देखा जाएगा।
11 नवंबर 2005 के आदेश में अंतर-राज्यीय माइग्रेशन के मामलों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया था। इस आदेश के अनुसार यदि कोई व्यक्ति दूसरे राज्य से मध्य प्रदेश में आकर बसता है, तो उसे आरक्षण और जाति से जुड़े लाभ उसके मूल राज्य के मानदंडों के आधार पर ही मिलेंगे। केवल मध्य प्रदेश में निवास करने मात्र से वह यहां की एससी-एसटी सूची के लाभ का स्वतः पात्र नहीं माना जाएगा। यह आदेश विशेष रूप से फर्जी जाति प्रमाण पत्रों पर रोक लगाने और वास्तविक पात्रता की पुष्टि करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। अब सरकार ने फिर से इस व्यवस्था को सख्ती से लागू करने के संकेत दिए हैं।
इसके अलावा 22 जनवरी 2014 का आदेश जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इसमें प्रमाण पत्र जारी करने वाले सक्षम अधिकारियों जैसे एसडीएम और तहसील स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की गई थीं। आदेश में दस्तावेजों के भौतिक सत्यापन, जांच की समय सीमा और रिकॉर्ड संधारण की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई थी। अब जीएडी ने इन सभी प्रावधानों को अनिवार्य रूप से लागू करने को कहा है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की अनियमितता सामने न आए।
द मूकनायक से बातचीत में कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेशाध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने कहा कि मध्य प्रदेश में लंबे समय से फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के जरिए आरक्षण का लाभ लेने की शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका आरोप है कि कुछ लोग दूसरे राज्यों से आकर गलत दस्तावेजों के आधार पर एससी-एसटी प्रमाण पत्र बनवा लेते हैं और फिर सरकारी नौकरियों, शिक्षा तथा अन्य योजनाओं का लाभ उठाते हैं, जबकि वास्तविक पात्र वर्ग के लोग अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह सामाजिक न्याय और संविधान की भावना के खिलाफ है।
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि सरकार को ऐसे मामलों की निष्पक्ष और गंभीर जांच करानी चाहिए तथा प्रमाण पत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि जिन लोगों ने फर्जी तरीके से जाति प्रमाण पत्र बनवाए हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और वास्तविक अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लोगों को आरक्षण का पूरा लाभ सुनिश्चित किया जाए।
सरकार के इस कदम को प्रदेश में आरक्षण व्यवस्था और जातिगत प्रमाण पत्रों की विश्वसनीयता बनाए रखने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों से जुड़े कई मामले सामने आए थे, जिनके कारण वास्तविक एससी-एसटी वर्ग के लोगों के अधिकार प्रभावित हुए। अब नए निर्देशों के बाद जिला स्तर पर जांच प्रक्रिया और अधिक कठोर हो सकती है। आने वाले समय में जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में दस्तावेजों की जांच, मूल राज्य के रिकॉर्ड का मिलान और परिवार की निवास स्थिति की पुष्टि महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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