
भोपाल। मध्यप्रदेश सरकारी की नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इस पूरे मामले की जांच 60 दिनों यानी दो माह के भीतर पूरी कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। न्यायालय ने जांच के लिए गठित उच्च स्तरीय छानबीन समिति को 20 जून तक की समयसीमा निर्धारित की है।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अविनेंद्र कुमार सिंह की डबल बेंच ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि आखिर लगभग एक वर्ष से इस मामले की जांच लंबित क्यों रखी गई और इसे दबाकर क्यों रखा गया। कोर्ट की इस टिप्पणी को सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, यह पूरा मामला कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष और याचिकाकर्ता प्रदीप अहिरवार द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने अनुसूचित जाति वर्ग का फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाया है, जबकि उनका संबंध सामान्य वर्ग के राजपूत बागरी/बागड़ी समाज से बताया गया है। इस शिकायत के आधार पर पहले ही एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गई थी, लेकिन लंबे समय तक जांच पूरी नहीं होने पर मामला अदालत तक पहुंचा।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकेश अग्रवाल ने कोर्ट में पक्ष रखते हुए जांच में हो रही देरी को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने तर्क दिया कि शिकायत दर्ज होने के बावजूद एक साल तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जो प्रशासनिक लापरवाही और संभावित दबाव की ओर संकेत करती है। इस पर कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाते हुए सरकार को जवाबदेह ठहराया और तय समयसीमा में जांच पूरी करने का आदेश दिया।
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रदीप अहिरवार ने शुक्रवार को प्रेस वार्ता करते हुए तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा, “मंत्री प्रतिमा बागरी अब महज दो महीने की मंत्री ही शेष बची हुई हैं। जैसे ही जांच समिति की रिपोर्ट सामने आएगी, उनका जाति प्रमाण पत्र फर्जी साबित होगा और उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।”
अहिरवार ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार अपने मंत्रियों और अधिकारियों को बचाने में लगी हुई है, जिसके कारण जांच प्रक्रिया जानबूझकर धीमी रखी गई।
अहिरवार ने आगे कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि कोई व्यक्ति गलत तरीके से अनुसूचित जाति का लाभ लेता है, तो इससे वास्तविक पात्र लोगों के अधिकारों का सीधा हनन होता है। उन्होंने मांग की कि हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जाए और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई हो।
गौरतलब है कि इस मामले में शिकायत लगभग एक वर्ष पहले दर्ज कराई गई थी, लेकिन जांच में लगातार देरी होती रही। अंततः 1 अप्रैल 2025 को याचिकाकर्ता को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। अब हाईकोर्ट के सख्त रुख और तय समयसीमा के बाद यह मामला प्रदेश की राजनीति में और अधिक गर्मा गया है।
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