
भोपाल। देश में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के जरिए आरक्षण का लाभ लेने का मुद्दा अब संसद के उच्च सदन तक पहुँच गया है। सोमवार को राज्यसभा में भाजपा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने इस गंभीर विषय को उठाते हुए कहा कि गलत तरीके से बनाए गए जाति प्रमाण पत्र अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के वास्तविक हकदारों से उनका संवैधानिक अधिकार छीन रहे हैं। उन्होंने इसे केवल किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या बताते हुए सख्त और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की।
असली हकदारों से छीना जा रहा अधिकार
सदन में बोलते हुए सांसद सोलंकी ने कहा कि आरक्षण कोई दया या कृपा नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना है। लेकिन फर्जी प्रमाण पत्रों के सहारे शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अयोग्य लोग दाखिल हो रहे हैं, जिससे वास्तविक पात्र छात्र-युवा अवसरों से वंचित हो रहे हैं।
मध्यप्रदेश के आँकड़ों के साथ दावा
अपने वक्तव्य में सांसद ने मध्यप्रदेश का हवाला देते हुए कहा कि प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के सहारे नौकरी पाने के 232 मामलों की जांच चल रही है, जबकि 8 हजार से अधिक मामले पिछले करीब दो दशकों से छानबीन समितियों में लंबित हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश के लगभग 3000 क्लास-वन अधिकारियों में से 600 के जाति प्रमाण पत्र संदेह के घेरे में हैं।
इनमें सबसे अधिक 168 मामले लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) से जुड़े बताए जा रहे हैं।
कुल मिलाकर छोटे-बड़े पदों को मिलाकर करीब 8000 मामले राज्य की छानबीन समिति के पास लंबित हैं, जिनमें से कई 15 साल से अधिक समय से फैसले का इंतजार कर रहे हैं। सांसद सोलंकी ने सुप्रीम कोर्ट के रुख का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत स्पष्ट कर चुकी है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मिली नौकरी या शैक्षणिक दाखिला कभी वैध नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में न केवल नियुक्ति रद्द होनी चाहिए, बल्कि दोषियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी जरूरी है।
1950 का नियम बना सबसे बड़ा पेंच
मध्यप्रदेश में अधिकतर विवाद 1950 के नियम से जुड़े हैं। नियमों के अनुसार, वही जातियां एससी-एसटी मानी जाती हैं जो 1950 के अभिलेखों में मध्यप्रदेश में दर्ज थीं। बाद में दूसरे राज्यों से आकर बसने वालों को प्रदेश में एससी-एसटी आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इसी प्रावधान की गलत व्याख्या और दुरुपयोग कर फर्जी प्रमाण पत्र बनाए जाने के आरोप सामने आते रहे हैं।
पहले से ही मोर्चा खोले हुए है कांग्रेस SC विभाग
इस मुद्दे पर राजनीति पहले से गर्म है। इससे पहले कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग ने मध्यप्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों को लेकर मोर्चा खोल रखा है। विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने राज्य सरकार की मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को फर्जी बताते हुए जांच की मांग की थी।
द मूकनायक से बातचीत में कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने मध्यप्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के जरिए आरक्षण के दुरुपयोग को एक गंभीर और सुनियोजित साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सैकड़ों नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में ऐसे अधिकारी और कर्मचारी हैं, जो जाली जाति प्रमाण पत्रों के सहारे सरकारी नौकरियों में वर्षों से टिके हुए हैं और आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। अहिरवार के मुताबिक यह केवल प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक ऐसा अपराध है, जिसमें सत्ता और सिस्टम की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में हालात यहां तक पहुँच गए हैं कि कुछ लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षित सीटों से विधायक बने और फिर मंत्री पद तक पहुँच गए। इससे दलित और आदिवासी समाज के वास्तविक पात्र युवाओं के हिस्से की नौकरियां और राजनीतिक प्रतिनिधित्व उनसे छीन लिया गया है, जो सीधे तौर पर संविधान और सामाजिक न्याय की अवधारणा पर हमला है।
अहिरवार ने आगे कहा कि उन्होंने इस पूरे मामले को लेकर औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन इसके बावजूद राज्य छानबीन समिति पिछले आठ महीनों से उनकी शिकायत को दबाकर बैठी हुई है। उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जाति प्रमाण पत्र से जुड़े किसी भी विवाद या शिकायत की जांच अधिकतम 90 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए, ताकि दोषियों को समय रहते दंडित किया जा सके। इसके बावजूद मध्यप्रदेश में जांच को जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है, जिससे यह संदेह और गहराता है कि सरकार प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है। अहिरवार ने कहा कि भाजपा सरकार ऐसे लोगों के साथ खड़ी है, जो दलित-आदिवासियों का हक खा रहे हैं और सामाजिक न्याय की नींव को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने मांग की कि सभी मामलों की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि आरक्षण व्यवस्था की पवित्रता बनी रहे और संविधान पर आम जनता का विश्वास कायम रह सके।
सख्त और समयबद्ध व्यवस्था की मांग
राज्यसभा में चर्चा के दौरान सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने केंद्र सरकार से मांग की कि देशभर में जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए एक समान, पारदर्शी और समयबद्ध प्रणाली बनाई जाए। उन्होंने कहा कि जब तक दोषियों को कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक संविधान की भावना और आरक्षण व्यवस्था की पवित्रता सुरक्षित नहीं रह सकती।
फर्जी जाति प्रमाण पत्र का यह मुद्दा अब संसद से लेकर राज्यों तक सियासी और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है। सवाल यह है कि क्या दावों और आरोपों के बाद अब वास्तव में उन लोगों पर कार्रवाई होगी, जो वर्षों से दलित-आदिवासियों के हक पर डाका डालते आए हैं?
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