मध्यप्रदेश में सूचना का अधिकार व्यवस्था पर बढ़ता दबाव! राज्य सूचना आयोग में 30 हजार से ज्यादा अपीलें लंबित TM Exclusive

आयुक्तों के पांच पद खाली, हर साल बढ़ रही अपीलों की संख्या, लोगों को सूचना पाने के लिए करना पड़ रहा लंबा इंतजार
मध्यप्रदेश में सूचना का अधिकार व्यवस्था पर बढ़ता दबाव! राज्य सूचना आयोग में 30 हजार से ज्यादा अपीलें लंबित TM Exclusive
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भोपाल। मध्यप्रदेश में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून इन दिनों खुद व्यवस्था संबंधी संकट से जूझ रहा है। राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपीलों का लंबित बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे आम नागरिकों को सूचना प्राप्त करने में महीनों ही नहीं, बल्कि कई मामलों में वर्षों तक इंतजार करना पड़ रहा है। वर्तमान स्थिति यह है कि आयोग में करीब 30 हजार से अधिक अपीलें सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं, जो इस व्यवस्था की धीमी गति और प्रशासनिक ढांचे की कमजोरियों को उजागर करती हैं।

दरअसल, आयोग में अपीलों के तेजी से बढ़ते बोझ के पीछे सबसे बड़ा कारण सूचना आयुक्तों के पदों का खाली होना माना जा रहा है। राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त सहित कुल 10 पद स्वीकृत हैं, लेकिन फिलहाल केवल चार आयुक्त ही कार्यरत हैं। यानी आधे से अधिक पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। ऐसे में उपलब्ध आयुक्तों पर काम का अत्यधिक दबाव है, जिसके चलते अपीलों का समयबद्ध निपटारा संभव नहीं हो पा रहा है। यह स्थिति न केवल आरटीआई कानून की भावना के विपरीत है, बल्कि नागरिकों के सूचना के अधिकार को भी प्रभावित कर रही है।

सूत्रों के अनुसार, आयोग में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने की प्रक्रिया अब गति पकड़ती नजर आ रही है। बताया जा रहा है कि दो नए सूचना आयुक्तों के नामों को राज्यपाल की मंजूरी मिल चुकी है और जल्द ही उनकी नियुक्ति की अधिसूचना जारी हो सकती है। अधिकारियों का मानना है कि नए आयुक्तों के कार्यभार संभालने के बाद लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और व्यवस्था में कुछ हद तक सुधार संभव होगा।

अपीलों में वृद्धि दर्ज

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी गंभीर दिखाई देती है। आयोग में हर साल लगभग 6 हजार नई द्वितीय अपीलें दर्ज होती हैं, लेकिन वर्तमान संसाधनों के साथ केवल 1,000 से 1,500 अपीलों का ही निपटारा हो पा रहा है। यानी हर साल लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है। आयोग की प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 की शुरुआत में 12,619 अपीलें लंबित थीं, जो साल के अंत तक बढ़कर 17,933 हो गईं। इस दौरान कुल 5,314 अपीलों की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि केवल 1,140 मामलों का ही निराकरण हो सका। यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि निपटारे की गति, नए मामलों के मुकाबले बेहद धीमी है।

वर्ष 2025 में यह दबाव और अधिक बढ़ गया। अनुमान है कि इस दौरान लगभग 12 हजार नई अपीलें और आयोग में दर्ज हुईं, जिससे लंबित मामलों की कुल संख्या बढ़कर करीब 30 हजार तक पहुंच गई। यह स्थिति बताती है कि अगर जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह संख्या और भी भयावह रूप ले सकती है।

पारदर्शिता की कमी से आयोग पहुँच रही अपील

आयोग में आने वाली शिकायतों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि कुछ विभागों में पारदर्शिता की कमी अधिक है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग तथा राजस्व विभाग से संबंधित मामलों की संख्या सबसे अधिक है। इन विभागों से जुड़ी सूचनाएं समय पर उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण बड़ी संख्या में लोग पहले प्रथम अपील और फिर द्वितीय अपील के लिए आयोग का रुख करते हैं।

आरटीआई की प्रक्रिया के तहत यदि किसी आवेदक को निर्धारित समय सीमा में सूचना नहीं मिलती है, तो वह पहले संबंधित विभाग में प्रथम अपील करता है। इसके बाद भी समाधान न मिलने पर राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की जाती है। लेकिन वर्तमान में आयोग में लंबित मामलों की अधिकता के कारण इन अपीलों की सुनवाई में लंबा समय लग रहा है। इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जो अपनी ही जानकारी पाने के लिए सिस्टम के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

द मूकनायक से बातचीत करते हुए भोपाल के आरटीआई कार्यकर्ता विकास कुमार ने बताया कि राज्य सूचना आयोग में लंबित अपीलों की बढ़ती संख्या बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि सूचना आयुक्तों के कई पद लंबे समय से खाली पड़े हैं, जिसके कारण अपीलों का समय पर निपटारा नहीं हो पा रहा है। इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जिन्हें अपनी ही जानकारी पाने के लिए महीनों तक इंतजार करना पड़ता है।

उन्होंने आगे कहा कि आरटीआई कानून का उद्देश्य प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन जब आयोग में ही सुनवाई में देरी होने लगे तो यह कानून की मूल भावना के विपरीत है। विकास कुमार के मुताबिक, हर साल बड़ी संख्या में नई अपीलें दर्ज हो रही हैं, लेकिन उनके मुकाबले निपटारा बहुत कम हो रहा है, जिससे लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

विकास कुमार ने सरकार से मांग की कि खाली पदों पर जल्द से जल्द नियुक्तियां की जाएं और आयोग की कार्यप्रणाली को मजबूत किया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि डिजिटल सुनवाई को बढ़ावा दिया जाए और विभागों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि लोगों को समय पर सूचना मिल सके और उन्हें आयोग के चक्कर न लगाने पड़ें।

कांग्रेस ने उठाया सवाल

मध्यप्रदेश कांग्रेस आरटीआई प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश सचिव संजय मिश्रा ने कहा कि राज्य सूचना आयोग में बढ़ता लंबित बोझ सीधे तौर पर सरकार की लापरवाही का नतीजा है। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय से सूचना आयुक्तों के पद खाली पड़े हैं, लेकिन सरकार इन पर नियुक्ति करने में गंभीरता नहीं दिखा रही है, जिससे पूरी व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

संजय मिश्रा ने कहा कि जब आयोग में पर्याप्त आयुक्त ही नहीं होंगे तो अपीलों का समय पर निपटारा कैसे संभव होगा। उन्होंने इसे आम जनता के सूचना के अधिकार के साथ अन्याय बताते हुए कहा कि लोग अपनी ही जानकारी पाने के लिए महीनों तक भटकने को मजबूर हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आयुक्तों की नियुक्ति ही इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि आयोग की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार की भी जरूरत है। डिजिटल सुनवाई, समयबद्ध निस्तारण की सख्त व्यवस्था, विभागों में पारदर्शिता बढ़ाने और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने जैसे कदम उठाए बिना इस बढ़ते बोझ को नियंत्रित करना मुश्किल होगा।

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