नई दिल्ली: शुक्रवार, 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल और वहां के डॉक्टर को कड़ी फटकार लगाई। यह मामला चार साल की एक मासूम बच्ची के साथ हुए बलात्कार और हत्या से जुड़ा है। आरोप है कि जब गंभीर हालत में बच्ची को अस्पताल लाया गया, तो डॉक्टर ने उसे इमरजेंसी इलाज देने से साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद इलाज के अभाव में बच्ची ने दम तोड़ दिया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने डॉक्टर के इस रवैये को बेहद निर्मम, क्रूर और संवेदनहीन करार दिया। अदालत ने मेडिकल एथिक्स पर गंभीर सवाल उठाते हुए अस्पताल को चेतावनी दी कि अगर अदालत इस आचरण के लिए उन पर आर्थिक दंड लगाती है, तो इसका असर बहुत गहरा होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल के वकील को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अगर आप अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, तो आपको अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लिखने का कोई हक नहीं है। पीठ ने कड़ी नाराजगी जताते हुए पूछा कि क्या बच्ची गरीब थी और आपकी फीस नहीं दे सकती थी, इसलिए आपने उसे अनदेखा कर दिया?
अदालत ने कहा कि अगर डॉक्टर में थोड़ी भी इंसानियत होती, तो सुविधा न होने पर वह खुद बच्ची को लेकर किसी दूसरे अस्पताल जाते। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी आपातकालीन स्थिति में किसी भी डॉक्टर से यह उम्मीद की जाती है कि वह बिना समय गंवाए पीड़ित को तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराए।
सीजेआई ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इतने जघन्य अपराध का शिकार हुई बच्ची आपके सामने लाई गई और आप इतने बेरहम निकले कि आपने उसे इलाज तक नहीं दिया। अदालत ने अस्पताल को उसके इस अमानवीय व्यवहार के संभावित परिणामों के प्रति आगाह किया है। गाजियाबाद की इस हृदयविदारक घटना पर सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ किया कि अब इस मामले पर अगले सप्ताह, संभवतः मंगलवार, 21 जुलाई को विचार किया जाएगा।
इससे पहले की सुनवाई में अदालत ने गाजियाबाद पुलिस की शुरुआती जांच में बरती गई भारी लापरवाही और असंवेदनशीलता पर भी गहरी नाराजगी जताई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची के निजी अंगों पर किसी ठोस वस्तु से हमले के निशान साफ नजर आ रहे थे। इसके बावजूद, पुलिस ने शुरुआत में रेप और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज नहीं किया था, जिसे लेकर पुलिस महकमे को भी कोर्ट की नाराजगी झेलनी पड़ी।
जांच में सामने आई इन चौंकाने वाली खामियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर और नंदग्राम पुलिस स्टेशन के एसएचओ (SHO) को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर पूरे घटनाक्रम का स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया था। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई थी कि चार साल की मासूम के साथ इतनी भयानक दरिंदगी होने के बावजूद एफआईआर (FIR) एक दिन की देरी से क्यों दर्ज की गई।
शुरुआत में पुलिस ने इस मामले की जांच केवल हत्या और सबूत मिटाने के नजरिए से की थी। यौन उत्पीड़न के स्पष्ट संकेत होने के बावजूद शुरुआत में पॉक्सो एक्ट या बलात्कार की धाराएं नहीं लगाई गई थीं। पुलिस के इसी ढुलमुल रवैये पर अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि अब तक कोई भी उचित जांच नहीं की गई है और ऐसा लगता है कि पूरे मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.
यहां सपोर्ट करें