
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र जारी करने और उसकी वैधता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य प्रशासन द्वारा जारी किया गया कोई भी जाति प्रमाणपत्र 'संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950' के प्रावधानों के विपरीत नहीं हो सकता।
यह अहम फैसला 'चिंथाडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' (क्रिमिनल अपील संख्या 1580/2026) मामले की सुनवाई के दौरान आया। इस मामले में अपीलकर्ता ने ईसाई धर्म अपनाने और एक दशक से अधिक समय तक पादरी (Pastor) के रूप में काम करने के बावजूद खुद को मादिगा समुदाय (SC) का बताकर एससी/एसटी एक्ट के तहत संरक्षण की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाता है।
न्यायालय ने अपने फैसले में 'के.पी. मनु बनाम स्क्रूटनी कमेटी' मामले का हवाला देते हुए अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र के लाभार्थियों के लिए तीन अनिवार्य और सख्त शर्तें निर्धारित की हैं। न्यायालय के अनुसार, इन नियमों का कड़ाई से पालन किए बिना कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र का कानूनी लाभ नहीं ले सकता।
सबसे पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि दावेदार के पास इस बात का बिल्कुल स्पष्ट और अकाट्य प्रमाण होना चाहिए कि वह उसी जाति से संबंध रखता है जिसे संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत मान्यता प्राप्त है।
दूसरी महत्वपूर्ण शर्त धर्म वापसी (Reconversion) से जुड़ी है। यदि किसी व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन कर लिया था और वह दोबारा एससी दर्जे का दावा करता है, तो उसे यह साबित करना होगा कि उसने अपने माता-पिता और पिछली पीढ़ियों के मूल धर्म में विधिवत और वास्तविक वापसी कर ली है।
तीसरी और सबसे अहम शर्त समुदाय द्वारा स्वीकार किए जाने की है। अदालत ने निर्देश दिया है कि दावेदार को ऐसे पुख्ता साक्ष्य पेश करने होंगे जो यह स्थापित करें कि धर्म वापसी के बाद उस व्यक्ति को उसकी मूल जाति और संबंधित समुदाय ने पूरी तरह से अपने अंदर वापस अपना लिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद सख्त लहजे में कहा है कि यदि इन तीनों में से एक भी पहलू प्रमाणित नहीं होता है, तो व्यक्ति को अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता देना किसी भी सूरत में संभव नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल राज्य सरकार का जाति प्रमाणपत्र हाथ में होने भर से किसी को लाभ नहीं मिलेगा, यदि वह प्रमाणपत्र इन संवैधानिक आदेशों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
इस कड़े फैसले के बाद यह तय हो गया है कि यदि किसी भी व्यक्ति का अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र इन तीन अनिवार्य मापदंडों का पालन किए बिना जारी किया गया है, तो उसे गैर-कानूनी माना जाएगा। ऐसे किसी भी असंवैधानिक प्रमाणपत्र को रद्द करने के लिए अब नागरिक इन कड़े नियमों का हवाला देकर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष चुनौती दे सकते हैं।
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