'डायन बताकर महिलाओं की हत्या सभ्य समाज पर कलंक', सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी; 26 साल पुराने मामले में उम्रकैद बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के ओडिशा मर्डर केस में दो दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखते हुए कहा कि डायन प्रथा जैसी कुरीतियां संवैधानिक लोकतंत्र और सभ्य समाज के लिए एक बड़ा खतरा हैं।
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नई दिल्ली: भारत के संविधान को लागू हुए 75 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन आज भी देश में अंधविश्वास और कुरीतियों के नाम पर बेबस महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 'डायन प्रथा' जैसी कुप्रथाओं के जारी रहने पर गहरी चिंता और दुख व्यक्त किया है। अदालत ने ओडिशा के एक आदिवासी गांव में फरवरी 1998 में हुई एक महिला की हत्या के मामले में दो दोषियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए यह कड़ी टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि इस दर्दनाक घटना के तथ्यों ने उन्हें भीतर तक झकझोर कर रख दिया है। एक निहत्थी और बेबस महिला को डायन बताकर उसकी ही बेटी के सामने बेरहमी से पीटा गया। बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि अपनी आंखों के सामने मां को इतनी क्रूरता से मरते हुए देखने वाली उस मासूम बेटी के मन पर क्या असर पड़ा होगा।

इस अहम फैसले को लिखते हुए जस्टिस मिश्रा ने समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर किया। उन्होंने कहा कि डायन प्रथा जैसी बीमारी आज भी हमारे समाज के कई हिस्सों को बुरी तरह खोखला कर रही है। इन इलाकों में अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और निराधार डर इस कदर हावी हैं कि वे कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता को भी पीछे छोड़ देते हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि डायन प्रथा से जुड़ी क्रूरता केवल जान लेने तक ही सीमित नहीं है। इसके शिकार होने वाले लोगों, जिनमें ज्यादातर महिलाएं शामिल होती हैं, उन्हें भयानक यातनाएं, यौन हिंसा, मारपीट और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। ऐसे हालात में अंधविश्वास को तर्क पर तरजीह दी जाती है, जिससे कमजोर और बेसहारा महिलाएं सामूहिक नफरत का शिकार बन जाती हैं।

यह खौफनाक घटना फरवरी 1998 में ओडिशा के आदिवासी बहुल सुंदरगढ़ जिले के एक सुदूर गांव में घटी थी। वहां मनोबोध नाइक नाम के एक व्यक्ति की बेटी की मौत हो गई थी। परिवार वालों ने आरोप लगाया कि पुनी नाइक के जादू-टोने के कारण उसकी जान गई है।

यह अफवाह सुनकर उदय ओराम ने पुनी नाइक को घसीटकर मनोबोध नाइक के घर तक पहुंचाया। वहां उसने अपने एक साथी के साथ मिलकर लाठियों से पुनी को इतनी बेरहमी से पीटा कि उसकी मौत हो गई। निचली अदालत ने साल 2002 में दोनों को दोषी ठहराया था, लेकिन उड़ीसा हाई कोर्ट को इस सजा और उम्रकैद को बरकरार रखने में दो दशक का लंबा समय लग गया।

जस्टिस मिश्रा और जस्टिस अंजारिया ने समाज की दूषित मानसिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुश्किल हालात में लोग अक्सर अपनी परेशानियों का दोष किसी बेकसूर महिला पर मढ़कर आसानी से बचना चाहते हैं। यह हमारी गहरी सामाजिक कुंठा और पूर्वाग्रह को दर्शाता है, जहां समाधान खोजने के बजाय बलि का बकरा ढूंढा जाता है। जजों ने कहा कि ऐसी सामूहिक मूर्खता और अतार्किकता के खिलाफ केवल 'तर्क' और 'समझदारी' ही एकमात्र मजबूत ढाल बन सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि हमारा संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है, भाईचारे को बढ़ावा देता है और समाज से ऐसी कुप्रथाओं को मिटाने के लिए वैज्ञानिक सोच अपनाने की प्रेरणा देता है। इसके बावजूद, समाज के कुछ हिस्सों में डायन प्रथा जैसी कुरीतियां आज भी अपनी जड़ें जमाए हुए हैं।

शीर्ष अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि हमारे जैसा कोई भी संवैधानिक लोकतंत्र तब तक जीवित नहीं रह सकता, जब तक कि इस तरह की अपमानजनक प्रथाएं कानून के शासन और संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देती रहेंगी।

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