सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: "सच्चा भाईचारा तभी आएगा, जब जज और रिक्शावाले का बच्चा एक ही स्कूल की बेंच पर साथ पढ़ेगा"

RTE के तहत निजी स्कूलों में 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR से 31 मार्च तक मांगी रिपोर्ट
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नई दिल्ली: शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक और भावुक टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हमारे संविधान में जिस 'भाईचारे' (Fraternity) की बात कही गई है, वह लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है जब एक रिक्शा चलाने वाले का बच्चा और किसी करोड़पति या सुप्रीम कोर्ट के जज का बच्चा एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ाई करें।

कोर्ट ने इस दिशा में सख्ती दिखाते हुए यह सुनिश्चित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है कि सभी स्कूल गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरटीई कानून के तहत अनिवार्य 25% मुफ्त सीटें उपलब्ध कराएं।

अमीरी-गरीबी का भेदभाव मिटाने वाली शिक्षा

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरटीई अधिनियम (RTE Act) की परिकल्पना ही यही है कि सभी बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा एक साझा माहौल में मिले। वहां जाति, वर्ग, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव न हो।

फैसला लिखते हुए जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, "यह कानून ढांचागत रूप से यह संभव बनाता है कि एक मल्टी-मिलियनेयर (करोड़पति) का बच्चा या यहां तक कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के जज का बच्चा, उसी कक्षा और उसी बेंच पर बैठे जहां एक ऑटो-रिक्शा चालक या सड़क पर सामान बेचने वाले (Street Vendor) का बच्चा बैठा हो। यही वह तरीका है जिससे धारा-12 समानता और स्वतंत्रता के साथ-साथ भाईचारे के संवैधानिक सिद्धांत को ठोस रूप देती है।"

भाईचारा सिर्फ शब्द नहीं, रिश्तों का नाम है

अक्सर यह माना जाता है कि 'भाईचारा' कानूनन लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पुरानी धारणा को खारिज कर दिया। पीठ ने समझाया कि समानता और स्वतंत्रता व्यक्तिगत अधिकारों के दावे हो सकते हैं, लेकिन भाईचारा रिश्तों से जुड़ा है। यह ऐसी संस्थागत व्यवस्थाओं के जरिए काम करता है जो व्यक्तियों को जाति या क्लास जैसी दीवारों को तोड़ने और एकजुटता के बंधन बनाने में मदद करता है।

कोर्ट ने कहा, "इस मायने में, बिना सहायता प्राप्त निजी स्कूलों (Unaided Schools) में धारा-12 के तहत 25% समावेशन (Inclusion) केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 21A और अनुच्छेद 39(f) के तहत बच्चों के विकास और भाईचारे के वादे को पूरा करने का एक जरिया है।"

इस दौरान कोर्ट ने कोठारी आयोग की रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसने 'कॉमन स्कूल सिस्टम' पर जोर दिया था, ताकि समाज के हर वर्ग के बच्चे बिना किसी भेदभाव के समान शिक्षा पा सकें।

आत्मसम्मान बढ़ाने की जरूरत

अदालत ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय (HRD Ministry) के एक पुराने बयान को भी उद्धृत किया, जो गरीब बच्चों के अमीर माहौल में ढलने की चिंता का समाधान करता है। बयान में कहा गया था: "अक्सर यह चिंता जताई जाती है कि वंचित समूहों के 25% बच्चे अमीर बच्चों वाले माहौल में कैसे सामंजस्य बिठाएंगे। यह तब हल हो सकता है जब शिक्षण प्रक्रिया और शिक्षक इन बच्चों के अनुभवों को 'ज्ञान के स्रोत' के रूप में इस्तेमाल करें। इससे उनका आत्मसम्मान और पहचान बढ़ेगी और उन्हें बराबरी का दर्जा मिलना शुरू होगा।"

31 मार्च तक मांगी रिपोर्ट

बेंच ने कहा कि यह बेहद जरूरी है कि कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को पड़ोस के स्कूलों में प्रवेश देने के तरीके और प्रक्रिया को तय करने के लिए नियम बनाए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया: "हम सक्षम अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य आयोगों के साथ-साथ सलाहकार परिषदों के परामर्श से, अधिनियम की धारा 12(1)(c) को लागू करने के लिए आवश्यक नियम और विनियम तैयार करें।"

कोर्ट ने एनसीपीसीआर (NCPCR) को निर्देश दिया है कि वह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा जारी किए गए नियमों की जानकारी इकट्ठा करे और 31 मार्च तक कोर्ट के समक्ष हलफनामा दायर करे। इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को तय की गई है।

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