इलाहाबाद हाईकोर्ट: 'तारीख पे तारीख' के लिए सिर्फ जज जिम्मेदार नहीं, क्रिमिनल ट्रायल में तेजी लाने के लिए AI और फोरेंसिक बदलाव के निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी सरकार और पुलिस को कड़ा निर्देश, क्रिमिनल ट्रायल में देरी खत्म करने के लिए AI तकनीक और फोरेंसिक व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत।
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उत्तर प्रदेश: साल 1993 में आई बॉलीवुड फिल्म 'दामिनी' का मशहूर डायलॉग 'तारीख पे तारीख' आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी डायलॉग का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में होने वाली देरी के लिए सिर्फ न्यायिक अधिकारी ही जिम्मेदार नहीं हैं। अदालत के अनुसार, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, कर्मचारियों की भारी कमी और पुलिस के असहयोग जैसे कारण भी इस देरी की मुख्य वजह हैं।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने 7 मई को अपने एक आदेश में यह अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक जज बिना पर्याप्त स्टाफ और पुलिस के सहयोग के मामलों का निपटारा नहीं कर सकता। मामलों को जल्द सुलझाने के लिए अदालत में आरोपियों और गवाहों की समय पर उपस्थिति के साथ-साथ एक सटीक फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) रिपोर्ट का होना बेहद जरूरी है।

यह आदेश एक जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। इस मामले में जांचकर्ताओं ने फोरेंसिक जांच के लिए खून से सना पेचकस तो भेजा था, लेकिन उन्होंने यह पता लगाने के लिए डीएनए मिलान की मांग नहीं की कि वह खून मृतक का ही है या नहीं। इस पर एफएसएल निदेशक ने अदालत को बताया कि उत्तर प्रदेश की फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में कर्मचारियों और आधुनिक उपकरणों की भारी कमी है। वर्तमान में राज्य की 12 में से केवल 8 प्रयोगशालाओं में ही डीएनए प्रोफाइलिंग की सुविधा उपलब्ध है।

मुकदमों के बोझ और देरी को कम करने के लिए अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस को कई कड़े निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के अनुरोध के अनुसार, यूपी सरकार को राज्य के एफएसएल को गृह मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त विभाग बनाने पर विचार करना चाहिए।

इसके साथ ही, राज्य सरकार को एक साल के भीतर एफएसएल में खाली पदों को भरने और वहां अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने के लिए हर संभव प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। पुलिस अधिकारियों को भी फोरेंसिक साक्ष्य वैज्ञानिक तरीके से जुटाने की उचित ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।

तकनीक के बेहतर इस्तेमाल पर जोर देते हुए कोर्ट ने कई अहम बदलावों की बात कही है। यूपी के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया गया है कि वे गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए पुलिस विभाग में 'स्पीच-टू-टेक्स्ट एआई मॉड्यूल' (Speech-to-text AI module) लागू करवाएं। डीजीपी ने कोर्ट को जानकारी दी कि पुलिस गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए इस एआई मॉड्यूल को पेश करने की योजना बना रही है।

इसके अलावा, ई-प्रोसेस नियम, 2026 के नियम 8 के तहत जांच के दौरान आरोपियों और गवाहों के सत्यापित ईमेल, मोबाइल नंबर और मैसेजिंग ऐप (जैसे व्हाट्सएप, टेलीग्राम और फेसबुक मैसेंजर) की जानकारी चार्जशीट के साथ-साथ क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) में दर्ज करना अनिवार्य किया गया है।

अदालत की प्रक्रिया को और तेज बनाने के लिए न्यायिक अधिकारियों को भी खास निर्देश दिए गए हैं। जजों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) नियम, 2024 और ई-प्रोसेस नियम, 2026 के तहत ई-समन और ई-वारंट भेजने को कहा गया है।

इसके साथ ही, बीएनएसएस, 2023 के प्रावधानों के अनुसार ई-एफआईआर और ई-चार्जशीट का उपयोग करने के भी निर्देश दिए गए हैं। डीजीपी को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जांच अधिकारी खून से सने हथियारों और कपड़ों का डीएनए आरोपी या मृतक से मिलाने के लिए एफएसएल को सैंपल भेजते समय अनिवार्य रूप से रिपोर्ट मांगें।

अदालत की कार्यवाही में पुलिस की लापरवाही को रोकने के लिए डीजीपी को एक कड़ा सर्कुलर जारी करने को कहा गया है। इसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि अदालती प्रक्रियाओं में कोताही बरतने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसके अतिरिक्त, जिले के सभी पुलिस प्रमुखों और पुलिस आयुक्तों को संबंधित जिला जज की अध्यक्षता में होने वाली मासिक निगरानी सेल की बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।

हाईकोर्ट ने विभिन्न जिला अदालतों से मिले फीडबैक की समीक्षा के बाद पाया कि गवाहों का न आना, बार-बार सुनवाई टलना, एफएसएल रिपोर्ट में देरी और पुलिस, अभियोजन तथा न्यायपालिका के बीच खराब समन्वय मामलों के लंबित होने का बहुत बड़ा कारण है। अंत में, अदालत ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा पर भी गहरी चिंता व्यक्त की।

कोर्ट ने कहा कि यूपी में जिला जज, प्रथम अतिरिक्त जिला जज और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को छोड़कर अन्य जजों को निजी सुरक्षा नहीं मिलती है। इसलिए, राज्य सरकार को पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर सभी जिला अदालत के जजों को व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) मुहैया कराने की व्यवहार्यता पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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