पूर्व CJI चंद्रचूड़ की 'जेंडर हैंडबुक' की भाषा और जातिगत टिप्पणियों पर जजों में असंतोष, सुप्रीम कोर्ट बनाएगा नई गाइडलाइंस

पूर्व सीजेआई की 'जेंडर हैंडबुक' पर उठे सवालों के बाद, अब सुप्रीम कोर्ट यौन अपराधों की सुनवाई के लिए सरल भाषा में नए नियम और दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है।
DY Chandrachud_ Gender Stereotypes Handbook
जेंडर हैंडबुक विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट यौन अपराधों की सुनवाई के लिए नई गाइडलाइंस बनाएगा। जानिए जजों की संवेदनशीलता पर SC का यह अहम फैसला।
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नई दिल्ली: यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान जजों के बीच संवेदनशीलता को बढ़ावा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नए दिशा-निर्देश तैयार करने का फैसला किया है। यह अहम कदम अदालत के भीतर ही एक पिछली पहल को लेकर सामने आई असहमति के बाद उठाया गया है।

नए दिशा-निर्देशों के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन

बीती 10 फरवरी को जारी एक आदेश में, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची तथा एनवी अंजारिया की तीन जजों की पीठ ने इस दिशा में स्पष्ट निर्देश दिए हैं। पीठ ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के निदेशक और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस से एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने का आग्रह किया है। इस समिति को नई गाइडलाइंस विकसित करने के लिए एक विस्तृत और व्यापक रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

2023 की 'हैंडबुक' पर क्यों उठे सवाल?

इससे पहले साल 2023 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर "जेंडर स्टीरियोटाइप्स से निपटने पर हैंडबुक" (Handbook on Combating Gender Stereotypes) प्रकाशित की गई थी। इस हैंडबुक का मुख्य उद्देश्य महिलाओं से जुड़ी रूढ़िवादी धारणाओं को पहचानने, समझने और उनसे निपटने में न्यायपालिका की मदद करना था। इसमें लिंग-अन्यायपूर्ण शब्दों की एक शब्दावली दी गई थी और अदालती दस्तावेजों या फैसलों में उनके स्थान पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले वैकल्पिक शब्दों का सुझाव भी शामिल था।

हालांकि, 10 फरवरी के नए आदेश में यह बात सामने आई है कि 2023 की इस हैंडबुक की भाषा आम आदमी की समझ से परे हो सकती है। उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, कई जजों में इस हैंडबुक को अपनाने की प्रक्रिया और इसकी कुछ सामग्री को लेकर गहरा असंतोष था। उनका मानना था कि यह स्थिति को सुधारने के बजाय पूर्वाग्रहों को और मजबूत करती है।

प्रक्रिया और सामग्री को लेकर असंतोष

प्रक्रिया के मुद्दे पर सूत्रों का कहना है कि हैंडबुक प्रकाशित करने से पहले सभी जजों को भरोसे में लिया जाना चाहिए था, क्योंकि अंततः उन्हें ही इसका पालन करना था। नियमतः इसे व्यापक चर्चा के लिए पूरी अदालत (फुल कोर्ट) के समक्ष रखा जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

सामग्री के मोर्चे पर भी हैंडबुक में लिंग संबंधी रूढ़ियों को समझाने के तरीके के कुछ हिस्सों को 'समस्याग्रस्त' माना गया। उदाहरण के लिए, हैंडबुक में एक रूढ़ि का जिक्र था कि उच्च जाति के पुरुष शोषित जातियों की महिलाओं के साथ यौन संबंध नहीं बनाना चाहते, इसलिए शोषित जाति की महिला द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप झूठे होते हैं। इसके स्पष्टीकरण में हैंडबुक यह कहती है कि वास्तविकता यह है कि उच्च जाति के पुरुषों ने ऐतिहासिक रूप से जातिगत पदानुक्रम को बनाए रखने के लिए यौन हिंसा को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है।

इस पर जजों के एक वर्ग का स्पष्ट विचार था कि सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के सामान्यीकृत और व्यापक बयान नहीं देने चाहिए, जिनका प्रभाव पूरे के पूरे समुदायों पर निशाना साधने जैसा हो।

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा लिखे गए इस हैंडबुक के प्रस्तावना के अनुसार, इसकी परिकल्पना कोविड-19 महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी के ज्ञान घटक के रूप में की गई थी। इसमें कलकत्ता हाईकोर्ट की जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य, दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस प्रतिभा सिंह और प्रोफेसर झूमा सेन के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के सेंटर फॉर रिसर्च एंड प्लानिंग के योगदान और संपादन की सराहना की गई थी। जब इस पूरे विवाद पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ से संपर्क किया गया, तो उन्होंने किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

आम आदमी की भाषा और भारतीय समाज से जुड़ाव पर जोर

10 फरवरी के आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि न्यायपालिका के सदस्यों के दृष्टिकोण और अदालती प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और विवेक को पोषित करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। अदालत ने माना कि पूर्व में किए गए प्रयासों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए हैं। इसलिए, अदालत कोई भी नया और 'दिशाहीन' कदम उठाने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नई समिति पिछले सभी प्रयासों का बारीकी से अध्ययन करे।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि नए दिशा-निर्देश विदेशी भाषाओं या जटिल शब्दावली के बोझ तले दबे हुए नहीं होने चाहिए। समिति को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि नई गाइडलाइंस आम नागरिकों की समझ में आने वाली सरल भाषा में तैयार की जाएं, जिनके हितों की रक्षा के लिए इन्हें बनाया जा रहा है। ये नियम भारतीय न्याय प्रक्रिया, देश के सामाजिक ताने-बाने, मूल्यों और जमीनी हकीकत से पूरी तरह जुड़े होने चाहिए।

सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई समिति की रिपोर्ट के आधार पर जो भी नए दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे, उन्हें अंतिम रूप से अपनाने से पहले सभी जजों के विचार जानने के लिए 'फुल कोर्ट' के समक्ष रखा जाएगा ताकि पिछली गलतियों को दोहराने से बचा जा सके।

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