
दिल्ली/भोपाल। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जब महिलाओं की उपलब्धियों और सशक्तिकरण की चर्चा होती है, उसी समाज में कई ऐसी कहानियां भी हैं जो बताती हैं कि सम्मान और अधिकार पाने के लिए एक महिला को कितनी लंबी और कठिन लड़ाई लड़नी पड़ती है। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के गैरतगंज में रहने वाली दलित महिला सुनीता आर्या की कहानी इसी संघर्ष की मिसाल है। घरेलू हिंसा, सामाजिक अपमान, रिश्तों में विश्वासघात और अदालतों की लंबी कानूनी लड़ाई से गुजरने के बाद आज वह अपने दो बच्चों की अकेले परवरिश कर रही हैं। साथ ही अपनी बेटी के संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए समाज के अन्य बच्चों और महिलाओं के अधिकारों के लिए भी सक्रिय रूप से काम कर रही हैं।
सुनीता आर्या बताती हैं कि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं। उनके माता-पिता की शादी के 7 साल बाद उनका जन्म हुआ था। हालांकि उनके जन्म के समय परिवार में खुशी का माहौल बनने के बजाय उदासी छा गई थी, क्योंकि बेटी का जन्म होना उस समय कई लोगों के लिए खुशी की बात नहीं माना जाता था। समाज की यही सोच उस दौर में परिवार के माहौल पर भी साफ दिखाई देती थी।
साल 2007 में उनकी शादी हुई थी और उस समय उनकी उम्र करीब 20 साल थी। वह कहती हैं, “मेरी शादी के लिए पापा ने दो एकड़ जमीन बेच दी थी। जून के महीने में मेरी शादी हुई और मैं ससुराल आ गई।”
शादी के शुरुआती दिनों में सब कुछ सामान्य लगा, नए माहौल में खुद को ढालने की कोशिश करते हुए उन्हें उम्मीद थी कि उनकी जिंदगी अब स्थिर हो जाएगी, लेकिन कुछ ही समय बाद हालात बदलने लगे।
सुनीता बताती हैं कि उनके जेठ अक्सर उन्हें घूंघट रखने की नसीहत देते थे, लेकिन उनकी नजरें उन पर ठीक नहीं थीं। कई बार वह उन्हें शहर ले जाने के बहाने छूने की कोशिश करते और बिना बताए कमरे में आ जाते थे। एक दिन रसोई में काम करते समय उनके सिर से पल्लू थोड़ा सरक गया। इस बात पर जेठ अचानक गुस्से में आ गए। उन्होंने गाली-गलौज करते हुए सुनीता के बाल पकड़ लिए।
तभी उनके पति भी वहां पहुंच गए, लेकिन उन्होंने पत्नी को बचाने के बजाय अपने भाई का साथ दिया। दोनों ने मिलकर सुनीता को घसीटा, बेल्ट और डंडों से पीटा और आंगन में पड़े पत्थर पर पटक दिया।
सुनीता बताती हैं कि उस समय वह तीन महीने की गर्भवती थीं और इस हिंसा से वह बुरी तरह घायल हो गई थीं।
इस घटना के बाद रिश्तेदारों को जब सच पता चला तो सुनीता के मामा का बेटा उन्हें ससुराल से मायके ले आया। कुछ महीनों बाद उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया। अस्पताल का पूरा खर्च उनके माता-पिता ने उठाया।
सुनीता कहती है “मेरे पति न अस्पताल आए और न ही कभी बच्चे को देखने आए। उन्होंने किसी तरह की जिम्मेदारी नहीं निभाई।” इसके बाद सुनीता ने अपने बेटे को अकेले ही पालना शुरू किया।
साल 2011 में सुनीता की मुलाकात गैरतगंज के एक जमीन कारोबारी मनीष जैन से हुई। वह उनके पिता की जमीन खरीदने के सिलसिले में घर आने लगे थे। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और रिश्ता बन गया। सुनीता का बेटा भी उन्हें अपनापन देने लगा। सुनीता के अनुसार, मनीष पहले से शादीशुदा था, लेकिन उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी को इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है। इसके बाद दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती गईं।
साल 2013 में सुनीता गर्भवती हुईं। लेकिन उन्होंने भी बच्चे को जन्म देने से मना कर दिया और गर्भपात कराने का दबाव बनाया। सुनीता बताती हैं कि उनके दबाव में आकर उन्होंने गर्भपात करा लिया।
दो साल बाद वह फिर से गर्भवती हुईं। इस बार मनीष ने बच्चे को अपना मानने से ही इनकार कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि बच्चा उनका नहीं है। सुनीता कहती हैं, “उस समय मुझे लगा जैसे मेरे विश्वास की कोई कीमत ही नहीं थी।”
सुनीता ने तय किया कि वह इस बच्चे को जन्म देंगी और अदालत में सच साबित करेंगी। बेटी के जन्म के बाद उन्होंने डीएनए टेस्ट कराया और अदालत में मामला दायर किया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 2015 में अदालत ने फैसला सुनीता के पक्ष में दिया और यह साबित हुआ कि बच्ची मनीष जैन की है।मनीष ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 2018 में हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
कानूनी जीत के बावजूद सुनीता की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। आज वह रायसेन जिले के गैरतगंज में अपने दोनों बच्चों और मां के साथ एक छोटे से घर में रहती हैं। सुनीता बताती हैं कि उनकी बेटी को स्कूल में प्रवेश दिलाने में भी मुश्किलें आती हैं क्योंकि उसका जन्म लिव-इन संबंध के दौरान हुआ था।
उनका कहना है कि कई स्कूलों ने बच्ची को एडमिशन देने से मना कर दिया। इसके खिलाफ उन्होंने अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत की है, यह मामला फिलहाल आयोग में प्रचलित है।
साल 2018 में कोर्ट की कानूनी लड़ाई जीतने के बाद सुनीता आर्या ने तय किया कि वह केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि समाज के वंचित लोगों के अधिकारों के लिए भी काम करेंगी। पढ़ाई के साथ खासकर बच्चों के अधिकारों (चाइल्ड राइट्स) के प्रति उन्होंने सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के साथ जुड़कर बच्चों और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को समझा और उन पर काम किया। सुनीता तीन वर्षों तक बाल कल्याण समिति, रायसेन (मध्य प्रदेश) की सदस्य भी रहीं, जहां उन्होंने महिलाओं और बच्चों के सुरक्षित व उज्जवल भविष्य के लिए काम किया।
इस दौरान उन्होंने वास्तविक गरीब, जरूरतमंद, दिव्यांगों, कामकाजी महिलाओं और श्रमिक वर्ग के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और उनके जीवन को बेहतर बनाने के प्रयास किए। उन्होंने मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के साथ मिलकर “अनुभूति कैंप” का आयोजन भी किया, जिसका उद्देश्य स्कूली बच्चों में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना था।
सुनीता सामाजिक जागरूकता के कई अभियानों से भी जुड़ी रहीं। वह गर्भ में ही बच्चियों की हत्या और नवजात शिशुओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म “गर्भ: द वूम्ब” का हिस्सा भी बनीं। कोविड-19 के कठिन समय में उन्होंने महिलाओं और स्कूली छात्राओं के बीच मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता को लेकर जागरूकता अभियान चलाया। इसके अलावा वन स्टॉप सेंटर के साथ मिलकर उन्होंने यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं को नैतिक और भावनात्मक सहयोग दिया। साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, रायसेन में पैरा-लीगल वॉलंटियर के रूप में कार्य करते हुए लोगों को कानूनी सहायता और न्याय के प्रति जागरूक करने का काम भी किया।
सुनीता आर्या ने सामाजिक जिम्मेदारी के तहत देहदान का संकल्प भी लिया है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी शरीर समाज के काम आ सकता है और चिकित्सा शिक्षा तथा जरूरतमंद लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने देहदान के लिए अपनी सहमति दी है, ताकि उनके जाने के बाद भी उनका शरीर किसी के जीवन में नई उम्मीद और ज्ञान का स्रोत बन सके।
इन तमाम संघर्षों के बीच सुनीता आर्या ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। उन्होंने एम.ए., एम.एस.डब्ल्यू (मास्टर ऑफ सोशल वर्क) की पढ़ाई पूरी की और समाज के कमजोर वर्गों के साथ काम करते हुए उनके अधिकारों को समझा। अब वह लोगों को कानूनी रूप से कैसे मदद मिल सके, इसके लिए वर्तमान में कानून (लॉ) की पढ़ाई भी कर रही हैं, ताकि जरूरतमंदों को न्याय दिलाने में बेहतर तरीके से सहयोग कर सकें।
द मूकनायक से बातचीत में सुनीता आर्या कहती हैं, “मेरे दोनों बच्चे बिना पिता के बड़े हो रहे हैं। उनके लिए अब मैं ही मां भी हूं और पिता भी। जिंदगी में बहुत कुछ झेला है, घरेलू हिंसा, अपमान और रिश्तों का टूटना भी देखा, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैं बस इतना चाहती हूं कि मेरे बच्चों को वह सम्मान और अधिकार मिले जो संविधान ने हर बच्चे को दिए हैं। मेरी बेटी को सिर्फ इसलिए स्कूल में दाखिला देने से मना कर दिया जाता है क्योंकि उसका जन्म लिव-इन रिश्ते में हुआ है, लेकिन इसमें उसका क्या दोष है? मैं अपनी बेटी के शिक्षा के अधिकार के लिए आखिरी दम तक लड़ूंगी।”
भारतीय संविधान हर नागरिक को समानता और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 सभी को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 21 गरिमा के साथ जीवन का अधिकार सुनिश्चित करता है। इसके अलावा अनुच्छेद 21-A के तहत हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बच्चे के साथ उसके जन्म की परिस्थितियों के आधार पर भेदभाव करना संविधान की भावना के खिलाफ है।
सुनीता कहती हैं कि पिछले 15 वर्षों के संघर्ष ने उन्हें भीतर से मजबूत बना दिया है। वह कहतीं हैं, “अब मैं अपने बच्चों और जरूरतमंदों के लिए जी रही हूं। मैं चाहती हूं मेरे बच्चों को वह सम्मान और अधिकार मिले जो संविधान ने हर नागरिक को दिए हैं,”
द मूकनायक से बातचीत में सुनीता आर्या ने कहा कि उनके पूरे संघर्ष में सबसे बड़ी प्रेरणा उन्हें डॉ. भीमराव अंबेडकर से मिली है। उनका कहना है कि आज वह अपने बच्चों के अधिकारों और न्याय की बात कानूनी व संवैधानिक तरीके से कर पा रही हैं, तो यह संविधान की ताकत और बाबा साहेब के विचारों की वजह से संभव है। सुनीता के अनुसार, आज अगर महिलाएं आत्मसम्मान के साथ सिर उठाकर जीने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की स्थिति में हैं, तो इसका श्रेय संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को जाता है।
ग्रामीण समाज में सुनीता आर्या का संघर्ष कई परतों में दिखाई देता है। एक ओर वह एक महिला हैं, दूसरी ओर दलित समुदाय से आती हैं, और ऊपर से जिस ग्रामीण परिवेश में वह रहती हैं वहां आज भी सामाजिक और जातिगत भेदभाव की जड़ें काफी गहरी मानी जाती हैं। ऐसे माहौल में एक अकेली महिला का अपने बच्चों के अधिकारों के लिए खड़े होना अपने आप में बड़ा संघर्ष है। सुनीता की कहानी केवल व्यक्तिगत पीड़ा की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक संरचना को भी सामने लाती है जहां जाति, लिंग और सामाजिक हैसियत आज भी कई बार लोगों के अधिकारों और अवसरों को तय करने लगती है।
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