
जयपुर- पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने राजस्थान और अन्य राज्यों में चल रही जनगणना की 'आवास सूचीकरण कार्रवाई' (एचएलओ) के दौरान आंकड़ों में व्यापक गड़बड़ी और तथ्यों को छिपाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। पीयूसीएल ने इसे संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला बताते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
संगठन ने अपने एक बयान में कहा कि द हिंदू अखबार में 3 जून को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जमीनी स्तर पर काम कर रहे गणनाकर्ताओं (एन्यूमरेटर) पर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा यह दबाव बनाया जा रहा है कि वे वास्तविक स्थिति को दर्शाने वाले आंकड़ों में फेरबदल करें और उन्हें सरकारी दावों के अनुरूप बनाएं। पीयूसीएल के अनुसार, गणनाकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे ऐसे विकल्पों का चयन न करें, जिनसे सरकार की छवि खराब हो सकती है ।
पीयूसीएल ने कहा कि जनगणना केवल आंकड़े जुटाने का प्रशासनिक कार्य नहीं है, बल्कि यह समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) और जीवन एवं गरिमा का अधिकार (अनुच्छेद 21) जैसे मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करने का आधार स्तंभ है। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही कल्याणकारी योजनाओं, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों और संसदीय सीटों के परिसीमन का निर्धारण होता है। ऐसे में आंकड़ों में हेराफेरी को एक 'प्रशासनिक अनियमितता' नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाना चाहिए।
पीयूसीएल के अनुसार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में गणनाकर्ताओं, सरकारी स्कूल शिक्षकों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की गवाही से सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई सामने आई है। रिपोर्टों में खुलासा हुआ है कि:
कई ऐसे घर हैं जहां शौचालय नहीं हैं और लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं, जबकि सरकार ने भारत को 'खुले में शौच मुक्त' (ओडीएफ) घोषित कर रखा है।
बड़ी संख्या में घरों में नल से जुड़ा पीने का पानी या ट्रीटेड पानी उपलब्ध नहीं है, हालांकि जल जीवन मिशन के तहत लगभग सभी घरों में पानी की आपूर्ति का दावा किया जा रहा है।
कई परिवार खाना पकाने के लिए अभी भी लकड़ी, गोबर के कंडे या मिट्टी के तेल पर निर्भर हैं, जो उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी कनेक्शन के दावों के विपरीत है।
टीन की छत वाले घरों को पक्की छत वाला दिखाने का निर्देश दिया जा रहा है, जो आवासीय हालात का खुला झूठ है।
कई घरों में बिजली या इंटरनेट नहीं है, जबकि सरकार डिजिटल समावेशन के दावे कर रही है ।
पीयूसीएल ने राजस्थान के जनगणना संचालन निदेशक द्वारा 2 जून को जिला स्तरीय अधिकारियों को जारी पत्र पर विशेष चिंता जताई है। इस पत्र में 'विसंगतियों' को सुधारने का निर्देश देकर आंकड़ों में फेरबदल को संस्थागत रूप देने की कोशिश की गई है। संगठन का आरोप है कि गणनाकर्ताओं से कहा जा रहा है कि अगर किसी घर में शौचालय नहीं है, तो यह देखा जाए कि क्या उनके पड़ोसी का शौचालय या कोई सार्वजनिक शौचालय पास में है, अगर हां, तो फिर उसे 'खुले में शौच' की श्रेणी से बाहर कर दिया जाए। पीयूसीएल ने इसे 'गणना' नहीं, बल्कि 'झूठ के प्रति सहमति बनाना' करार दिया है ।
संगठन ने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब सरकारी कल्याणकारी आंकड़े जमीनी हकीकत से भिन्न पाए गए हैं। इससे पहले भी एसआईआर (विशेष गहन संशोधन) अभ्यास, मतदाता सूची से नाम काटे जाने और बीपीएल सूचियों में हेराफेरी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं । पीयूसीएल ने चेतावनी दी है कि मनगढ़ंत जनगणना के आंकड़े न सिर्फ गरीबों को उनके अधिकारों से वंचित करेंगे, बल्कि दशकों तक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की बुनियाद को भी खराब करेंगे ।
पीयूसीएल ने गणनाकर्ताओं, शिक्षकों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की बढ़ती मुश्किलों पर भी चिंता जताई है। ये कर्मचारी पेशेवर ईमानदारी और अपनी नौकरी के बीच फंस गए हैं। कई गणनाकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर अपनी आवाज उठाई है, लेकिन उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है। हाल ही में जयपुर नगर निगम ने दो कर्मचारियों को जनगणना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने पर निलंबित कर दिया था, जिससे कर्मचारियों में डर का माहौल बन गया है ।
संगठन ने यह भी बताया कि जनगणना का काम पूरी तरह से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गणनाकर्ताओं के निजी मोबाइल फोन के जरिए कराया जा रहा है, जबकि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में मोबाइल कनेक्टिविटी ठीक नहीं है। गणनाकर्ताओं को मात्र 66 रुपये का मोबाइल रिचार्ज भत्ता दिया जा रहा है, जो नाकाफी है। यह स्थिति जनगणना अभ्यास को संरचनात्मक रूप से समझौता करने वाली बनाती है ।
पीयूसीएल ने केंद्र और राज्य सरकारों से निम्नलिखित मांगें की हैं:
तत्काल रोक: गणनाकर्ताओं को जमीनी हकीकत के खिलाफ आंकड़े 'सुधारने' के लिए दिए गए सभी औपचारिक और अनौपचारिक निर्देशों पर तत्काल रोक लगाई जाए। सीएमएमएस पोर्टल का इस्तेमाल गणनाकर्ताओं पर दबाव बनाने के लिए न किया जाए।
स्वतंत्र जांच: राजस्थान जनगणना संचालन निदेशक के 2 जून, 2026 के पत्र और अन्य संबंधित संचारों की पूर्ण, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराई जाए।
गणनाकर्ताओं को संरक्षण: जिन गणनाकर्ताओं ने आंकड़ों में हेराफेरी के दबाव के खिलाफ आवाज उठाई है, उन्हें किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई, स्थानांतरण या प्रताड़ना से सुरक्षा दी जाए।
स्वतंत्र निगरानी तंत्र: नागरिक समाज, सेवानिवृत्त वरिष्ठ नौकरशाहों और सांख्यिकीविदों को शामिल करते हुए एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र बनाया जाए, जो अंतिम रिकॉर्ड संकलित होने से पहले ब्लॉक स्तर पर जनगणना के आंकड़ों का सत्यापन करे।
रजिस्ट्रार जनरल का बयान: भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त एक सार्वजनिक बयान जारी कर जनगणना के संवैधानिक दायित्व को दोहराएं और आंकड़ों को सरकारी योजनाओं के दावों के अनुरूप बनाने के किसी भी निर्देश को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करें।
गणनाकर्ताओं को सुविधाएं: गणनाकर्ताओं को पर्याप्त डेटा रिइम्बर्समेंट, समर्पित समय और एचएलओ अभ्यास के दौरान अन्य आधिकारिक कर्तव्यों से राहत दी जाए ।
पीयूसीएल ने कहा कि जनगणना का आंकड़ा भारतीय राज्य का वह दर्पण है जिसमें देश के हर नागरिक की स्थिति स्पष्ट झलकनी चाहिए। यदि इस दर्पण को ही धुंधला कर दिया गया, तो नीति-निर्माण गलत दिशा में जाएगा और गरीब एवं वंचित वर्गों का अस्तित्व ही सरकारी रिकॉर्ड से गायब हो जाएगा।
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