
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की एक पूछताछ के बाद उच्च शिक्षा विभाग देश के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के सिलेबस की जांच कर रहा है। यह जांच सोशल मीडिया पर किए गए एक गुमनाम पोस्ट के बाद शुरू हुई है, जिसमें विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले प्रमुख बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों के विचारों को 'जहर' करार दिया गया था। इन लेखकों में डॉ. बी.आर. अंबेडकर, ज्योतिराव फुले, गेल ओमवेट, ब्रज रंजन मणि और शर्मिला रेगे जैसे बड़े नाम शामिल हैं।
रविवार, 27 सितंबर को उच्च शिक्षा विभाग ने देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों को एक तत्काल ऑनलाइन पत्र भेजा। इस ईमेल में PMO से मिले निर्देशों का हवाला देते हुए वायरल सोशल मीडिया पोस्ट पर विश्वविद्यालयों की प्रतिक्रिया मांगी गई है। इसके साथ ही, विभाग ने विश्वविद्यालयों से उन विशिष्ट पाठ्यक्रमों में छात्रों के नामांकन का पूरा ब्यौरा भी मांगा है जिनका जिक्र उस विवादित पोस्ट में किया गया था।
विभाग द्वारा भेजे गए इस आधिकारिक पत्र में मामले को 'अति आवश्यक' श्रेणी में रखा गया है। पत्र में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय इस मुद्दे पर अपनी टिप्पणियां दें और संबंधित पाठ्यक्रमों में पढ़ रहे छात्रों की संख्या के बारे में मंत्रालय को जल्द से जल्द अवगत कराएं।
यह पूरा विवाद 26 सितंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर साझा किए गए एक पोस्ट से उपजा है। इस गुमनाम पोस्ट में लिखा गया था कि हमारे विश्वविद्यालयों में छात्रों को पितृसत्ता से लेकर जाति विनाश और इतिहास के गैर-ब्राह्मणीकरण तक का जहर परोसा जा रहा है। पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि वामपंथी समूह इसका इस्तेमाल अपने भविष्य के कार्यकर्ताओं को तैयार करने के लिए कर रहे हैं। इसी विषय पर लगातार छह और पोस्ट का एक थ्रेड भी प्लेटफॉर्म पर साझा किया गया था।
इस पोस्ट के साथ 35 किताबों और रचनाओं की एक सूची भी संलग्न की गई थी, जिसमें चौंकाने वाली बात यह है कि रामायण और महाभारत का भी नाम शामिल है। हालांकि, थ्रेड में बी.आर. अंबेडकर की 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट', शर्मिला रेगे द्वारा संकलित 'अगेन्स्ट द मैडनेस ऑफ मनु', ज्योतिराव फुले की 'गुलामगिरी' और ब्रज रंजन मणि की 'डीब्राह्मनाइजिंग हिस्ट्री' जैसी किताबों को विशेष रूप से निशाने पर लिया गया है।
सूची में गेल ओमवेट की 'दलित्स एंड डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशन', प्रमोद रंजन की 'महिषासुर: एक जननायक' और एस.एल. निर्मोही की 'भारत के मूलनिवासी' जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का भी जिक्र है। इसके अलावा, भिक्खु बोधानंद को वामपंथी अकादमिक हलकों में ब्राह्मण-विरोधी विचारधारा का जनक बताया गया है।
पोस्ट के अंत में यह तर्क दिया गया है कि कन्हैया कुमार या नेहा बोरा जैसे लोग इसी शिक्षा प्रणाली की उपज हैं। पोस्ट में गंभीर आरोप लगाया गया है कि यह पूरा एजुकेशन सिस्टम वामपंथी झुकाव वाले शिक्षकों द्वारा फैलाई जा रही हिंदू-विरोधी किताबों से ग्रसित है और अब समय आ गया है कि इस चक्र को तोड़ा जाए।
दिलचस्प बात यह है कि इस पोस्ट में जिन लेखकों पर निशाना साधा गया है, उनमें से किसी को भी पारंपरिक अर्थों में वामपंथी नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, इनमें से कई विचारकों ने हमेशा जाति और जेंडर के दृष्टिकोण से पारंपरिक भारतीय वामपंथ की कड़ी आलोचना की है।
प्रसिद्ध लेखक और शिक्षाविद कांचा इलैया शेफर्ड ने इस पूरी सरकारी कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनकी 'व्हाई आई एम नॉट ए हिंदू' सहित तीन किताबें इस विवादित सूची में शामिल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंबेडकरवाद ने हमेशा वामपंथियों के वर्ग संघर्ष के विचार का विरोध किया है।
कांचा इलैया ने सवाल उठाया कि यदि PMO फुले और अंबेडकर को पढ़ाए जाने का विरोध कर रहा है, तो इसका सीधा मतलब है कि वह एससी/एसटी और ओबीसी वर्गों के खिलाफ खड़ा है, जबकि खुद प्रधानमंत्री ओबीसी वर्ग से आते हैं और देश की राष्ट्रपति एक आदिवासी हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि PMO पितृसत्ता का समर्थन कर रहा है, तो यह महिला-पुरुष समानता के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।
उन्होंने विश्वविद्यालयों के सिलेबस में प्रधानमंत्री कार्यालय के सीधे हस्तक्षेप पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उनका तर्क है कि पाठ्यक्रम तय करने और उसकी समीक्षा करने का अधिकार उच्च शिक्षा विभाग या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अधिकार क्षेत्र में आना चाहिए, न कि PMO के।
इलैया के अलावा, इस विवादित सूची में ई.वी. रामासामी (पेरियार), आर.एस. शर्मा, सावित्रीबाई फुले, उमा चक्रवर्ती, सुवीरा जायसवाल, आलोका पाराशर, शिरीन रत्नागर, जी. अलोसियस और अनुपमा राव जैसे दिग्गजों का साहित्य शामिल है। ये सभी किताबें वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध आशुतोष कॉलेज में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर छात्रों को पढ़ाई जाती हैं।
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