लोकसभा में अपनी बात रखने में क्यों पीछे हैं SC-ST सांसद? आंकड़ों से सामने आई चौंकाने वाली हकीकत

पीआरएस के आंकड़ों से बड़ा खुलासा: संसद में अहम बिलों पर चर्चा के दौरान अपनी बात रखने में सामान्य सांसदों के मुकाबले काफी पीछे छूट रहे हैं एससी-एसटी सीटों के नेता।
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नई दिल्ली: केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक अहम पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) सांसदों को संसद में बोलने के लिए अधिक समय देने की मांग की है। यह मांग ऐसे समय में उठी है जब नए आंकड़ों से पता चला है कि आरक्षित सीटों से चुनकर आए सांसद चर्चाओं में हिस्सा लेने के मामले में काफी पीछे छूट रहे हैं।

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के 24 जून 2024 से 23 अगस्त 2026 तक के ट्रैक डेटा के विश्लेषण से एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। इन आंकड़ों के अनुसार, एससी सीटों से निर्वाचित भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के 24 सांसदों ने औसतन केवल 14.67 बहसों में हिस्सा लिया है। इस सूची में एससी और एसटी क्षेत्रों से आने वाले छह मंत्रियों को शामिल नहीं किया गया है। वहीं, एसटी सीटों वाले 22 सांसदों का औसत मात्र 13.05 दर्ज किया गया है।

अगर इन दोनों को मिला दिया जाए, तो बीजेपी के इन 46 सांसदों की बहसों में भागीदारी का औसत 13.89 बैठता है। यह आंकड़ा लोकसभा के सभी 483 मौजूदा सांसदों के 21.53 के शानदार औसत से काफी कम है। इतना ही नहीं, ये सांसद अपनी ही पार्टी के अन्य सहयोगियों से भी पिछड़ गए हैं। एससी और एसटी के अलावा अन्य सीटों से आने वाले 145 बीजेपी सांसदों ने सदन में औसतन 19.68 बहसों में अपनी आवाज बुलंद की है।

गैर-आरक्षित सीटों पर चुने गए सभी बीजेपी सांसदों से तुलना करने पर यह अंतर और भी स्पष्ट हो जाता है। एससी सीट वाले बीजेपी सांसदों ने औसतन 4.14 कम बहसों (18.80 के मुकाबले 14.67) में अपनी बात रखी। इसी तरह, एसटी सीट वाले बीजेपी सांसदों की भागीदारी 5.92 कम (18.96 के मुकाबले 13.05) रही है।

इस मामले में देवास से लगातार दूसरी बार सांसद चुने गए 42 वर्षीय महेंद्र सिंह सोलंकी का प्रदर्शन सबसे अलग रहा है। वह इन 46 सांसदों में इकलौते ऐसे नेता हैं जिन्होंने एक भी चर्चा में हिस्सा नहीं लिया है। हालांकि, नौ सांसद ऐसे भी हैं जिनका प्रदर्शन सदन के औसत से बेहतर रहा। इनमें पलामू से बीजेपी सांसद विष्णु दयाल राम 44 बहसों के साथ सबसे आगे हैं, जबकि पालघर के सांसद हेमंत विष्णु सावरा 43 बहसों के साथ उनके ठीक पीछे खड़े हैं।

यह स्थिति केवल सत्ताधारी दल तक सीमित नहीं है। सभी राजनीतिक दलों के आंकड़े देखें तो एससी सीटों वाले सांसदों ने औसतन 18.22 बहसों में हिस्सा लिया, जबकि अन्य का औसत 22.15 रहा। एसटी सीटों के सांसदों का औसत 17.67 रहा, जो दूसरों के 21.91 के मुकाबले कम है।

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में भी यह फासला साफ नजर आता है। कांग्रेस के एससी सांसदों का औसत 19 रहा, जो उनके सामान्य साथियों के 23.38 के औसत से काफी कम है। हालांकि, कांग्रेस के एसटी सांसदों ने इस मामले में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। उनका औसत 24.42 रहा, जो उनके बाकी साथियों के 22.22 के आंकड़े से अधिक है।

जीतन राम मांझी ने 16 सितंबर को लिखे अपने पत्र में इस मुद्दे की असल वजह का भी जिक्र किया था। उन्होंने बताया कि 5 अगस्त को उनके आवास पर 'एनडीए सांसद समूह संवाद बैठक' आयोजित की गई थी। इस बैठक में मध्य प्रदेश की खरगोन सुरक्षित आदिवासी सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले बीजेपी सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने एक गंभीर मुद्दा उठाया था।

पटेल का कहना था कि संसद में महत्वपूर्ण बिलों पर चर्चा के दौरान एससी/एसटी समुदाय के सांसदों को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा है। इसी चिंता को दूर करने के लिए मांझी ने लोकसभा अध्यक्ष से उचित कदम उठाने का आग्रह किया है।

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