
लखनऊ: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए संभल हिंसा के एक आरोपी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) को रद्द कर दिया है। मंगलवार 29 सितंबर को शीर्ष अदालत ने इस कार्रवाई को पूरी तरह से अवैध करार दिया। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए संभल के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अक्टूबर 2025 में पारित किए गए हिरासत के आदेश को खारिज कर दिया। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारियों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने से पहले जरूरी तथ्यों पर विचार ही नहीं किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल किसी कबूलनामे के आधार पर ही निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) को सही नहीं ठहराया जा सकता है।
खुली अदालत में फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि प्रशासन द्वारा हिरासत की शक्तियों का गैरकानूनी तरीके से इस्तेमाल किया गया है। अधिकारियों ने उचित सामग्री और साक्ष्यों की अनदेखी की। इसलिए 13 अक्टूबर 2025 को जारी किए गए हिरासत आदेश को निरस्त किया जाता है और राज्य पर 10 लाख रुपये का हर्जाना लगाया जाता है।
यह अहम फैसला मुल्ला अफरोज नामक व्यक्ति की याचिका पर आया है। अफरोज को 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। इस भयंकर बवाल और झड़प में चार लोगों की जान चली गई थी।
गौरतलब है कि 19 नवंबर 2024 को संभल की एक सिविल कोर्ट ने मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था। यह आदेश उन हिंदू याचिकाकर्ताओं के दावे पर सुनवाई के दौरान दिया गया था, जिनका कहना था कि मस्जिद का निर्माण एक मंदिर के ऊपर किया गया है।
अफरोज की तरफ से शीर्ष अदालत में पेश हुए वकील दिव्येश प्रताप सिंह ने बताया कि उनके मुवक्किल को 17 जनवरी 2025 को हिरासत में लिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर में मारने की धमकी देकर जबरन जुर्म कबूल करवाया। वकील ने यह भी तर्क दिया कि पुलिस का पूरा केस केवल इस कथित कबूलनामे और अफरोज की निशानदेही पर एक .32 बोर की पिस्तौल की बरामदगी पर टिका हुआ था।
बचाव पक्ष के वकील ने फोरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए एक बड़ा खुलासा भी किया। उन्होंने बताया कि जिस व्यक्ति की हत्या का आरोप अफरोज पर लगा है, उसकी मौत .315 बोर के आग्नेयास्त्र से लगी चोटों के कारण हुई थी। जबकि पुलिस ने अफरोज के पास से .32 बोर के हथियार की बरामदगी दिखाई थी, जो पुलिस की कहानी पर बड़े सवाल खड़े करता है।
पुलिस हिरासत में रहने के दौरान ही संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को अफरोज पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), 1980 की धारा 3(2) लगा दी। इसके तहत उसे प्रिवेंटिव डिटेंशन में भेज दिया गया। बाद में राज्य और केंद्र सरकार ने भी उसकी रिहाई की अपीलों को खारिज कर दिया था।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 8 नवंबर 2025 को इस हिरासत के आदेश पर मुहर लगाते हुए निर्देश दिया था कि अफरोज 12 अक्टूबर 2026 तक जेल में ही रहेगा। इसके बाद अफरोज ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैबियस कॉर्पस) के जरिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन 8 जून 2026 को हाई कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद आखिरकार उसने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
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