मणिपुर: नई हिंसा घटनाओं के बीच केंद्र और राज्य सरकार ने कुकी-जो विद्रोही गुटों के साथ फिर शुरू की बातचीत

दो महीने बाद फिर शुरू हुई शांति वार्ता, कुकी-जो गुटों ने दोहराई 'केंद्र शासित प्रदेश' की मांग और उखरूल की ताजा हिंसा पर जताई गंभीर चिंता।
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मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्र का न्यू लमका रोड फोटो- राजन चौधरी, द मूकनायक
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नई दिल्ली: मणिपुर में एक बार फिर से भड़की अशांति के बीच शांति बहाली की कोशिशें तेज कर दी गई हैं। शुक्रवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकार ने कुकी-जो विद्रोही गुटों के साथ फिर से बातचीत शुरू कर दी है। ये विद्रोही गुट फिलहाल सरकार के साथ 'सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस' (SoO) समझौते के दायरे में आते हैं।

दो महीने के लंबे अंतराल के बाद दोबारा शुरू हुआ यह संवाद बेहद अहम माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसमें मणिपुर सरकार के अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया है। 4 फरवरी को मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह के नेतृत्व में चुनी हुई सरकार की बहाली के बाद यह इस तरह की पहली आधिकारिक बैठक है।

इससे पहले जब 9 फरवरी, 2024 को SoO समझौते के वार्षिक नवीनीकरण का समय आया था, तब तत्कालीन बीरेन सिंह सरकार ने इसकी अवधि को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया था।

बाद में जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था, तब 4 सितंबर, 2025 को "नई शर्तों और जमीनी नियमों" के साथ इस समझौते पर दोबारा हस्ताक्षर किए गए थे। यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 13 सितंबर के दौरे से ठीक पहले उठाया गया था। 3 मई, 2023 को कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच भड़की जातीय हिंसा के बाद प्रधानमंत्री का यह पहला मणिपुर दौरा था।

इस त्रिपक्षीय समझौते की शुरुआत सबसे पहले साल 2008 में हुई थी। तब यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (UPF) और 24 विद्रोही गुटों के प्रमुख संगठन 'कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन' (KNO) ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।

दिल्ली में आयोजित इस ताजा दौर की बैठक का नेतृत्व गृह मंत्रालय के पूर्वोत्तर सलाहकार अजीत लाल ने किया। उनके साथ इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के अधिकारियों के अलावा मणिपुर के गृह सचिव एन. अशोक कुमार और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक आशुतोष कुमार सिन्हा भी इस अहम चर्चा में शामिल हुए।

बैठक के बाद KNO और UPF ने एक संयुक्त बयान जारी कर बताया कि दिन भर चली इस चर्चा का मुख्य फोकस सुरक्षा और संचालन से जुड़े मुद्दों पर रहा। स्थानीय लोगों के साथ टकराव कम करने और सुरक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए दोनों पक्ष कुछ SoO शिविरों को दूसरी जगह स्थानांतरित करने पर सहमत हुए हैं। सरकार ने विद्रोही गुटों से 14 में से 7 शिविरों को हटाने के लिए कहा है, जबकि कुकी-जो गुटों ने अपने शिविरों को समेकित करके 12 तक सीमित करने का फैसला लिया है।

कुकी-जो प्रतिनिधियों ने गृह मंत्रालय के अधिकारियों का ध्यान उखरूल जिले में चल रही ताजा अशांति की ओर भी खींचा। उन्होंने दावा किया कि कुकी समुदाय के लोग कथित तौर पर तांगखुल सशस्त्र गुटों के हमलों के डर के साये में जीने को मजबूर हैं। पिछले एक महीने में कुकी-जो नागरिकों के कई गांव जला दिए गए हैं, जो तुरंत सुरक्षा हस्तक्षेप और विश्वास बहाली के उपायों की मांग करता है।

नागा बहुल उखरूल जिले में 7 फरवरी से ही तांगखुल नागा और कुकी समुदाय के बीच एक नया संघर्ष शुरू हो गया है, जिसने स्थिति को और भी तनावपूर्ण बना दिया है।

बैठक के दौरान कुकी-जो गुटों ने अपनी पुरानी मांग को फिर से मजबूती से उठाया। उन्होंने पहाड़ी इलाकों के लिए एक अलग विधायिका वाले 'केंद्र शासित प्रदेश' की मांग रखी और स्पष्ट किया कि पुरानी स्थिति में लौटना अब उनके लिए किसी भी कीमत पर संभव नहीं है।

उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि तीन साल बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार की कोई जवाबदेही तय नहीं हुई है। इम्फाल के मुख्य इलाकों से लेकर घाटी के जिलों—बिष्णुपुर, इम्फाल ईस्ट, इम्फाल वेस्ट, थौबल, काचिंग और जिरिबाम तक—कुकी-जो विधायकों, सरकारी अधिकारियों और आम नागरिकों पर हुए अभूतपूर्व हिंसक हमलों के दोषियों को पकड़ने में प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 7 अप्रैल से अब तक कम से कम 11 लोगों की जान जा चुकी है। ये हत्याएं और मौतें मुख्य रूप से मैतेई बहुल बिष्णुपुर जिले और उखरूल से सामने आई हैं, जहां तांगखुल नागा और कुकी के बीच यह नया खूनी संघर्ष पनपा है।

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