
नई दिल्ली: प्लेटफॉर्म-आधारित श्रम बल के अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में कर्नाटक सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए एक विशेष शिकायत निवारण तंत्र को आधिकारिक तौर पर लागू कर दिया है। यह भारत में अपनी तरह की पहली व्यवस्था है। इसे कर्नाटक प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स बोर्ड और ई-गवर्नेंस विभाग ने मिलकर विकसित किया है।
इस नई पहल के लागू होने के बाद, गिग वर्कर्स अब 'इंटीग्रेटेड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेसल सिस्टम' (IPGRS) पोर्टल के जरिए अपनी आधिकारिक शिकायतें दर्ज करा सकते हैं। इसमें वेतन, काम करने की स्थिति और प्लेटफॉर्म से जुड़े विवाद शामिल हैं। यह सिस्टम कर्नाटक के लाखों गिग वर्कर्स और टेक्नोलॉजी एग्रीगेटर्स के बीच एक सीधा और औपचारिक पुल बनाता है। इससे उस वर्कफोर्स के लिए पारदर्शिता और कानूनी रास्ता खुलेगा, जो अब तक बिना किसी औपचारिक विवाद समाधान ढांचे के काम कर रहा था।
कर्नाटक प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स (सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम और नियमों के तहत, हर एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म को एक आंतरिक विवाद समाधान समिति (IDRC) बनानी होगी। नम्मा यात्री (Namma Yatri) और युलु (Yulu) जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही अपने IDRC संपर्क विवरण को सरकारी पोर्टल के साथ जोड़ चुके हैं।
बोर्ड के सीईओ और अतिरिक्त श्रम आयुक्त जी. मंजूनाथ ने बताया कि अमेज़ॅन (Amazon) सहित अन्य प्लेटफॉर्म भी इस प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं।
IPGRS पर दर्ज की गई शिकायतें सीधे संबंधित प्लेटफॉर्म की IDRC को भेज दी जाएंगी। इनका समाधान एक तय समय सीमा के भीतर करना अनिवार्य होगा। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार एक केंद्रीय सुविधादाता के रूप में काम करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि वर्कर और प्लेटफॉर्म के बीच बातचीत सुचारू तथा पारदर्शी तरीके से हो।
श्रम मंत्री संतोष लाड ने कहा कि देश की तकनीकी राजधानी होने के नाते कर्नाटक इस क्षमता का उपयोग श्रमिकों के कल्याण के लिए भी कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रणाली के जरिए गिग इकॉनमी अब कोई अनौपचारिक क्षेत्र नहीं रह गई है, बल्कि एक ऐसा व्यवस्थित ढांचा बन गई है जहां हर मजदूर की आवाज सुनी जाएगी।
मंत्री ने इस बात पर गर्व जताया कि कर्नाटक नवाचार और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन बनाने वाला ऐसा सरकारी तंत्र लागू करने वाला देश का पहला राज्य है।
अतिरिक्त श्रम आयुक्त जी. मंजूनाथ के अनुसार, अब तक प्लेटफॉर्म्स द्वारा 12 लाख सक्रिय गिग वर्कर्स का विवरण साझा किया गया है। चूंकि कई कर्मचारी एक साथ कई प्लेटफॉर्म के लिए काम करते हैं, इसलिए डेटा में दोहराव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
इसे सुलझाने के लिए सरकार सॉफ्टवेयर की मदद से हर गिग वर्कर को एक विशिष्ट पहचान संख्या (Unique identification number) देगी, ताकि डुप्लीकेट एंट्री को हटाया जा सके। इस सॉफ्टवेयर पर अभी काम चल रहा है।
गिग वर्कर्स के लिए उनके प्लेटफॉर्म के अनुसार विशेष योजनाएं भी तैयार की जा रही हैं। अगली बोर्ड बैठक में इन पर चर्चा की जाएगी। जी. मंजूनाथ ने बताया कि ये योजनाएं प्लेटफॉर्म के प्रकार के आधार पर अलग-अलग होंगी।
उदाहरण के लिए, कैब चलाने का काम ज्यादातर पुरुष करते हैं, जबकि शहरी घरेलू काम मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। योजनाएं कर्मचारी द्वारा दिए गए योगदान, काम की मात्रा और काम के घंटों पर भी निर्भर करेंगी। चूंकि कुछ वर्कर आठ घंटे से ज्यादा काम करते हैं और कुछ केवल कुछ ही गिग्स करते हैं, इसलिए कार्यभार और समय के आधार पर योजनाएं अलग होंगी।
उन्होंने आगे कहा कि इस ढांचे को गिग वर्कर्स के प्रयास और श्रम के आधार पर वैज्ञानिक रूप से तैयार किया जाना चाहिए। इसके लिए ब्रिस्टन विश्वविद्यालय (Briston University), किंग्स कॉलेज (King’s College) और आईआईएससी (IISc) के शिक्षाविदों सहित कई विशेषज्ञों तथा बोर्ड के सदस्यों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है।
इस बीच, एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स को 5 जुलाई से शुरू होने वाली दूसरी तिमाही के लिए निर्धारित कैप के साथ 1% कल्याणकारी योगदान देना अनिवार्य होगा।
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