
भोपाल। मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग से जुड़ा एक कथित फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद सरकारी तंत्र और आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि अनुराग शुक्ला नामक व्यक्ति ने बिना किसी अधिकृत नियुक्ति के खुद को आयोग के अध्यक्ष डॉ. कैलाश जाटव का OSD (विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी) बताते हुए अलग-अलग जिलों के वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को पत्र भेजे।
मामले में अब जांच और आपराधिक कार्रवाई की तैयारी की बात सामने आ रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि संबंधित व्यक्ति की OSD पद पर कोई वैधानिक नियुक्ति नहीं थी, तो वह आयोग के नाम से आधिकारिक पत्राचार कैसे कर रहा था? आयोग का लेटरहेड उसके पास कैसे पहुंचा और पत्रों पर इस्तेमाल डिजिटल हस्ताक्षर किसकी अनुमति से किए गए? जांच में इन सभी पहलुओं की पड़ताल की जाएगी।
जानकारी के अनुसार, इस मामले का खुलासा अलग-अलग जिलों के अधिकारियों को भेजे गए पत्रों की जांच के दौरान हुआ। बताया जा रहा है कि 5 जुलाई को शहडोल के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को एक पत्र भेजा गया था। इसके बाद 30 जुलाई को छिंदवाड़ा कलेक्टर के नाम भी पत्राचार किया गया।
इन पत्रों में भेजने वाले व्यक्ति ने स्वयं को मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष का OSD बताया। पत्र अंग्रेजी भाषा में तैयार किए गए थे और आयोग के लेटरहेड के साथ डिजिटल हस्ताक्षर का भी उपयोग किया गया था।
पत्रों की प्रकृति और उनमें दर्ज जानकारी को लेकर संबंधित अधिकारियों को संदेह हुआ। इसके बाद उन्होंने मामले की पुष्टि के लिए आयोग स्तर पर संपर्क किया। शुरुआती पड़ताल में अध्यक्ष के प्रस्तावित दौरे से जुड़ी कुछ जानकारियां सही पाई गईं, लेकिन OSD पद और संबंधित व्यक्ति की नियुक्ति की जांच शुरू होते ही मामला संदिग्ध होता चला गया।
सूत्रों के अनुसार, अनुसूचित जाति विकास विभाग से नियुक्ति संबंधी जानकारी जुटाई गई तो अनुराग शुक्ला के नाम से OSD पद पर कोई अधिकृत नियुक्ति दर्ज नहीं मिली। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया।
अब सवाल उठ रहा है कि यदि कोई व्यक्ति शासकीय प्रक्रिया के तहत नियुक्त नहीं था, तो उसे आयोग अध्यक्ष के कार्यालय का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार किसने दिया? वह वरिष्ठ अधिकारियों से सीधे पत्राचार कैसे कर रहा था?
मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग के सचिव सुधीर श्रीवास्तव से इस संबंध में सवाल किए गए, लेकिन उन्होंने पूरे मामले पर विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज किया।
सरकारी और वैधानिक संस्थाओं में नियुक्ति तथा आधिकारिक पत्राचार की स्पष्ट प्रक्रिया होती है। ऐसे में किसी व्यक्ति द्वारा बिना अधिकृत पद के आयोग के नाम से कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र भेजना प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करता है।
मामला सामने आने के बाद कांग्रेस ने भी सरकार और आयोग की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति बिना अधिकृत नियुक्ति के खुद को आयोग अध्यक्ष का OSD बताकर अधिकारियों से संपर्क करता रहा, तो यह केवल प्रशासनिक चूक का मामला नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ा विषय है।
कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आयोग के नाम और पद का इस्तेमाल कर अधिकारियों पर प्रभाव डालने या उन्हें निर्देश देने की कोशिश की गई है, तो इसमें शामिल लोगों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
अहिरवार ने यह सवाल भी उठाया है कि कथित व्यक्ति तक आयोग का आधिकारिक लेटरहेड कैसे पहुंचा और डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल किस आधार पर किया गया। उन्होंने कहा कि जांच में यह भी सामने आना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति अब तक किन अधिकारियों और विभागों से संपर्क कर चुका है और इस पत्राचार का उद्देश्य क्या था।
वहीं, बीजेपी ने मामले में दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। बीजेपी प्रवक्ता महेश शर्मा का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी तरीके से किसी सरकारी या वैधानिक संस्था के पद और नाम का इस्तेमाल किया है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
सत्ता पक्ष का कहना है कि जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। किसी भी व्यक्ति को सरकारी संस्था या संवैधानिक पद की पहचान का दुरुपयोग करने की छूट नहीं दी जा सकती।
विधि विशेषज्ञ एडवोकेट बी.के. शर्मा के अनुसार, जांच में यदि यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने बिना वैध नियुक्ति के खुद को सरकारी पदाधिकारी बताकर अधिकारियों को भ्रमित किया, तो विभिन्न आपराधिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि झूठी पहचान का इस्तेमाल, धोखाधड़ी, कूटरचना और फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से जुड़े पहलुओं की जांच हो सकती है। यदि डिजिटल हस्ताक्षर या किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो संबंधित तकनीकी और साइबर कानूनों के प्रावधानों की भी जांच की जा सकती है।
हालांकि, अंतिम रूप से कौन-कौन सी धाराएं लगेंगी, इसका फैसला पुलिस और जांच एजेंसी उपलब्ध दस्तावेजों, तकनीकी साक्ष्यों और जांच के निष्कर्ष के आधार पर करेगी।
आयोग की आंतरिक सुरक्षा और दस्तावेज व्यवस्था पर भी सवाल
इस पूरे मामले ने मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग की आंतरिक व्यवस्था और दस्तावेजों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता का कहना है कि मामला केवल दो पत्रों तक सीमित नहीं माना जा सकता।
उनके अनुसार, सबसे अहम सवाल यह है कि जिस व्यक्ति की नियुक्ति पर सवाल उठ रहे हैं, वह आयोग के नाम से आधिकारिक पत्राचार की स्थिति तक कैसे पहुंचा। क्या उसे किसी स्तर पर अनौपचारिक सहयोग मिला? क्या आयोग के किसी कर्मचारी ने उसकी मदद की? या फिर लेटरहेड और अन्य दस्तावेजों का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया?
डिजिटल हस्ताक्षर की तकनीकी जांच भी इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकती है। जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि पत्रों पर इस्तेमाल हस्ताक्षर किसके नाम से थे, उन्हें किस माध्यम से तैयार किया गया और उनका इस्तेमाल अधिकृत प्रक्रिया के तहत हुआ था या नहीं।
जांच से खुल सकते हैं कई राज
मामले में जांच शुरू होने और आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की तैयारी की बात सामने आने के बाद अब कई सवालों के जवाब जांच से मिलने की उम्मीद है। अनुराग शुक्ला की वास्तविक भूमिका क्या थी? वह आयोग अध्यक्ष के नाम से अधिकारियों तक कैसे पहुंचा? आयोग का लेटरहेड किसने उपलब्ध कराया और डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल किसकी जानकारी या अनुमति से हुआ?
यह भी जांच का विषय होगा कि संबंधित व्यक्ति ने केवल शहडोल और छिंदवाड़ा के अधिकारियों को ही पत्र भेजे या अन्य जिलों और विभागों के साथ भी इसी तरह का पत्राचार किया गया।
मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग सामाजिक न्याय और अनुसूचित जाति वर्ग से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संस्था है। ऐसे में उसके नाम और पद के कथित दुरुपयोग का मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्था की विश्वसनीयता और उसकी कार्यप्रणाली से भी जुड़ा गंभीर सवाल है।
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