
भोपाल। मध्य प्रदेश के सतना जिले में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग ने सख्त टिप्पणी करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने शासकीय नाली से अवैध अतिक्रमण नहीं हटाने और उसकी नियमित साफ-सफाई सुनिश्चित नहीं करने को नगर निगम की सेवा में कमी माना है। इस मामले में आयोग ने नगर निगम पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही निगम को तत्काल प्रभाव से नाली से अवैध अतिक्रमण हटाने, उसकी नियमित सफाई कराने और भविष्य में जल निकासी की व्यवस्था सुचारु रखने के निर्देश दिए हैं।
आयोग ने शिकायतकर्ता को हुए मानसिक, आर्थिक और कानूनी खर्च को देखते हुए 5 हजार रुपये परिवाद व्यय के रूप में देने का भी आदेश दिया है।
यह फैसला जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग के अध्यक्ष श्यामाचरण उपाध्याय तथा सदस्य उमेश गिरि और विद्या पांडेय की पीठ ने सुनाया। यह मामला धवारी निवासी अधिवक्ता वीरेन्द्र सिंह की ओर से दायर किया गया था, जबकि उनकी ओर से अधिवक्ता विपिन सिंह ने आयोग में पक्ष रखा। आयोग ने उपलब्ध दस्तावेजों, दोनों पक्षों की दलीलों और पूर्व न्यायिक आदेशों का अध्ययन करने के बाद नगर निगम की लापरवाही को गंभीर मानते हुए यह आदेश पारित किया।
शिकायत में बताया गया था कि वार्ड क्रमांक-32 के गली नंबर-1, चांदमारी रोड, धवारी स्थित उनके मकान के पास बनी शासकीय नाली पर कुछ लोगों ने अवैध अतिक्रमण कर लिया था। इस अतिक्रमण के कारण नाली की नियमित सफाई संभव नहीं हो पा रही थी और गंदे पानी का निकास पूरी तरह बाधित हो गया था। परिणामस्वरूप बरसात और सामान्य दिनों में भी गंदा पानी शिकायतकर्ता के घर में भरने लगा, जिससे भवन की दीवारों, फर्श और घरेलू सामान को लगातार नुकसान पहुंच रहा था। शिकायतकर्ता का कहना था कि कई बार नगर निगम को इस समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि नगर निगम नागरिकों से संपत्ति कर के साथ-साथ साफ-सफाई और अन्य शहरी सुविधाओं के लिए नियमित शुल्क वसूलता है। ऐसे में नालियों की सफाई कराना, अतिक्रमण हटाना और जल निकासी की व्यवस्था बनाए रखना नगर निगम का वैधानिक दायित्व है। यदि निगम अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करता और नागरिकों को नुकसान उठाना पड़ता है, तो इसे सेवा में कमी माना जाएगा। आयोग ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि सार्वजनिक सुविधाओं का रखरखाव स्थानीय निकाय की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि संबंधित नाली में बने अवरोध और अतिक्रमण को हटाने के लिए सिविल न्यायालय पहले ही आदेश जारी कर चुका था। इसके बावजूद नगर निगम ने उस आदेश का प्रभावी ढंग से पालन नहीं किया और न ही नाली की नियमित सफाई सुनिश्चित की। आयोग ने इसे नगर निगम की गंभीर लापरवाही माना और कहा कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी तथा नागरिकों की शिकायतों पर कार्रवाई न करना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि नगर निगम तत्काल नाली से अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करे, नियमित साफ-सफाई सुनिश्चित करे और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न होने पाए। इसके साथ ही नगर निगम को 10 हजार रुपये का जुर्माना अदा करने तथा शिकायतकर्ता को 5 हजार रुपये परिवाद व्यय के रूप में भुगतान करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
यह फैसला स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि यदि नगर निगम या अन्य शहरी निकाय नागरिकों को उपलब्ध कराई जाने वाली मूलभूत सेवाओं, जैसे जल निकासी, सफाई और सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखावnमें लापरवाही बरतते हैं, तो उन्हें उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
द मूकनायक से बातचीत में विधि विशेषज्ञ अधिवक्ता मयंक सिंह ने कहा कि जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग का यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय करने वाला महत्वपूर्ण आदेश है। उन्होंने बताया कि जब नगर निगम नागरिकों से संपत्ति कर, स्वच्छता और अन्य नागरिक सुविधाओं के लिए शुल्क वसूलता है, तो उन सेवाओं को समय पर और प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराना उसकी कानूनी जिम्मेदारी होती है। यदि लापरवाही के कारण किसी नागरिक को आर्थिक, शारीरिक या मानसिक नुकसान होता है, तो वह उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत राहत पाने का अधिकार रखता है। इस तरह के आदेश भविष्य में नगर निकायों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाने का काम करेंगे।
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