
लेखक: राजीव भार्गव (पुस्तक 'राष्ट्र और नैतिकता' से साभार)
हमने 2019 के अन्त में देश भर में कई विरोध-प्रदर्शन देखे थे। हज़ारों-हज़ार लोग सड़क पर उतर आए थे नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के ख़िलाफ़। वे सरकार से इन्हें रद्द करने की माँग कर रहे थे।
ऐसे सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन एक मुक्त, लोकतांत्रिक समाज की कसौटी हैं जहाँ लोगों की आवाज़ सरकारों को सुननी पड़ती है और बाक़ायदा परामर्श और रायशुमारी के बाद ही उसे किसी फ़ैसले पर पहुँचने का हक़ होता है। इसके लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार, संबद्धता का अधिकार और शान्तिपूर्ण जुटान का अधिकार ज़रूरी है।
ऐसे अधिकारों पर कोई भी बन्दिश लगाया जाना, मसलन किसी हिंसा की प्रत्याशा में धारा 144 को लागू किया जाना, दिखाता है कि सरकार असहमति को झेल पाने में अक्षम है। यह दंगा करने की लोगों की मनोवृत्ति को नहीं, बल्कि बातचीत करने, लोगों को सुनने और विचार-विमर्श करने में सरकारों की अक्षमता को दर्शाता है। विरोध-प्रदर्शनों पर अतार्किक बन्दिश उन लोगों पर सीधा वार है जिनके नाम पर सरकार को राजकाज की छूट दी गई है।
इस मामले में हमें अदालतों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए जिन्होंने बार-बार कहा है कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार मूलभूत है। सम्भव है कि क़ानून का कोई छात्र उसे पढ़ कर कहे कि ‘विरोध’ शब्द वहाँ नहीं लिखा हुआ है। हो सकता है कि वह संविधान के प्रासंगिक अनुच्छेदों को (ख़ासकर अनुच्छेद 19) को अराजनीतिक ढंग से पढ़े।
जैसे, कोई यह समझ सकता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का मतलब है किसी फ़िल्म पर या अपने शहर की हालत पर अपनी राय रखना। उसी तरह संबद्धता के अधिकार का अर्थ वह क्लबों, पेशेवर संस्थाओं और सोसायटियों में संबद्ध होने से लगा सकता है। शान्तिपूर्ण जुटान से किसी पार्क में पिकनिक मनाने या कुम्भ मेला जैसे किसी पर्व में शामिल होने से लगाया जा सकता है।
ऐसे अधिकार बेशक महत्त्वपूर्ण हैं—निरंकुश देशों में तो इन अधिकारों की भी गारंटी नहीं होती—लेकिन अधिकारों को यहीं तक सीमित कर देना संकीर्ण नज़रिया होगा क्योंकि एक सक्रिय लोकतंत्र में ये अधिकार सक्रिय नागरिकता से ताल्लुक़ रखते हैं, निष्क्रिय नागरिकता से नहीं। सक्रिय नागरिकता राजनीतिक स्वतंत्रताओं से बनती है।
इसलिए अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का मतलब हो जाता है अपनी सरकार के कामकाज के बारे में अपनी राय रखना और संबद्धता के अधिकार का अर्थ हो जाता है राजनीतिक उद्देश्यों से संबद्धताएँ स्थापित करना। उदाहरण के लिए, सरकार के फ़ैसलों को सामूहिक रूप से चुनौती देना या सरकार को शान्तिपूर्ण ढंग से और क़ानूनी रास्ते से उखाड़ फेंकना। हमारे बहुदलीय तंत्र का यह आधार है, जहाँ विपक्षी दल शत्रु नहीं होते बल्कि बहुत काम के विरोधी होते हैं जो स्वस्थ तरीक़े से सत्ता के लिए प्रतिद्वंद्विता करते हैं।
शान्तिपूर्ण तरीक़े से जुटान का अधिकार राजनीतिक दलों को, नागरिकों को, विश्वविद्यालयों के छात्रों को विरोध प्रदर्शन, आन्दोलन, सार्वजनिक धरने आदि के माध्यम से सरकार की कार्रवाइयों पर सवाल खड़ा करने और एतराज करने की छूट देता है। ऐसे सभी अधिकारों की दो व्याख्याएँ हो सकती हैं।
पहली, ये अधिकार सरकारी दख़ल से मुक्त होते हैं और मोटे तौर पर एक उदार अराजनीतिक वातावरण में लोगों द्वारा निजी उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। दूसरे, ये अधिकार सत्ता या ताक़त हासिल करने के लिए सामूहिक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं इसलिए बुनियादी रूप से राजनीतिक होते हैं। ये राजनीतिक अधिकार हमारे लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद होते हैं।
किसी भी देश का संविधान केवल शाब्दिक नहीं होता है। उसमें लोगों के जिये हुए अतीत के सामूहिक अनुभव भी शामिल होते हैं, जिसे हम उसकी आत्मा कहते हैं। दूसरी वाली व्याख्या दरअसल अनुभवों के इसी इतिहास से होकर आती है। हमारे संविधान की पृष्ठभूमि बिला शक हमारे उपनिवेशविरोधी आन्दोलन से निर्मित है, जब हमारे राजनीतिक लोकवृत्त और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीज पहली बार बोये गए।
भारत के लोगों ने औपनिवेशिक सत्ता के ख़िलाफ़ लम्बी लड़ाई लड़ी ताकि वे उसके ख़िलाफ़ अपनी राय रख सकें, उनका विरोध कर सकें और उसे चुनौती दे सके। लोगों ने केवल क़ानूनी याचिकाओं से ही लड़ाई नहीं लड़ी, उन्होंने धरने-प्रदर्शन भी किए, विशाल सभाएँ कीं, शान्तिपूर्ण प्रदर्शन किए और गांधीजी के सत्याग्रह के साथ नागरिक अवज्ञा आन्दोलन भी चलाए। ये सब कुछ उसी तरह हमारे संविधान में कहीं नहीं पाया जाता, बल्कि संविधान इन्हें मानकर चलता है। इसीलिए संविधान की प्रस्तावना कहती है कि हम एक लोकतांत्रिक गणराज्य हैं।
आपस में जुड़े हुए ये तमाम राजनीतिक अधिकार इसलिए हैं कि सरकार यदि हमारे हित में काम कर भी रही हो तो भी हम चुप मार कर पीठ टिका कर न बैठे रहें और सरकार को उसका काम करने दें। हमें निगरानी रखनी होगी और लगातार उनकी हरकतों को देखते रहना होगा क्योंकि ऐसी सरकारें भी फिसल जा सकती हैं। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उनकी ग़लतियों को पकड़ कर परामर्श, बैठकों और संवाद के माध्यम से उन्हें दुरुस्त करें।
एक और गम्भीर स्थिति हालाँकि आसानी से खड़ी हो सकती है। वो यह कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार संवैधानिक रास्ते से हट सकती है और जनता के ख़िलाफ़ जा सकती है, उनका जवाब देना बन्द कर सकती है और उन्हें सुनना भी बन्द कर सकती है। यहाँ पर सरकार के ख़िलाफ़ ज़्यादा कड़े सार्वजनिक तरीक़ों से दबाव बनाना होता है। हो सकता है कि विरोध में सड़कों पर सभा लगानी पड़े, लोग अस्थायी रूप से मिलें और बैठें और एक प्रक्रिया में धीरे-धीरे यह आन्दोलन की शक्ल ले ले, जो परम्परागत राजनीति को पुष्ट करने के लिए ज़रूरी भी है।
याद कीजिए पोट्टि श्रीरामालु को, जो तेलुगुभाषी राज्य आंध्र के गठन की माँग को लेकर मद्रास राज्य की सरकार के ख़िलाफ़ अनशन कर के मर गए या फिर चिपको आन्दोलन को, जिसमें गौरा देवी, चंडी प्रसाद भट्ट और तमाम अन्य लोगों ने तत्कालीन यूपी सरकार द्वारा पेड़ों की व्यावसायिक कटाई को रोकने के लिए पेड़ों को गले लगा लिया।
ऐसे विरोध-प्रदर्शन ख़ासकर उन लोगों के लिहाज़ से ज़रूरी होते हैं जिनकी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई होती है और जो मुख्यधारा से बाहर होते हैं। आदमी चाहे कितना ही निरक्षर या कमज़ोर हो, नारा तो लगा ही सकता है, तख़्ती तो उठा ही सकता है, शान्तिपूर्वक पदयात्रा निकाल कर सरकार का विरोध तो कर ही सकता है। जितने ज़्यादा लोग सड़कों पर प्रदर्शन में जुट जाते हैं उतने टेबल पर होनेवाली वार्ताओं में नहीं आते। अब्राहम लिंकन ने ऐसे ही नहीं ‘लोगों के शान्तिपूर्ण ढंग से जुटने के अधिकार’ का आह्वान किया था और उसे ‘इंकलाब का संवैधानिक विकल्प’ बताया था।
यह साफ़ है कि हर कहीं लोकतंत्र दो मूल राजनीतिक अधिकारों पर बनता है। पहला, अपनी सरकार को स्वतंत्र रूप से चुनने का नागरिकों का अधिकार और उससे असन्तुष्ट होने पर वैधानिक रूप से कराए गए चुनाव में उसके ख़िलाफ़ वोट देकर उसे सत्ता से बाहर करने का अधिकार (भारतीय संविधान का अनुच्छेद 320)। सरकार से मुक्ति पाने का यही एक उपयुक्त तरीक़ा होता है। यह सही भी है।
वास्तव में, लोकतंत्र के भीतर सत्ता का शान्तिपूर्ण हस्तांतरण सबसे बड़ी ताक़त है। जब तक यह शान्तिपूर्ण हस्तांतरण जारी है सरकार के प्रस्तावों या फ़ैसलों के ख़िलाफ़ जनता की कार्रवाई भी संवैधानिक रूप से वैध है। यहीं से दूसरा अधिकार पैदा होता है—राजनीतिक भागीदारी, केवल चुनाव में नहीं बल्कि उनके बीच की अवधि में भी।
विरोध करना, सार्वजनिक रूप से सवाल पूछना और सरकार को उसका जवाब देने को बाध्य करना जनता का बुनियादी राजनीतिक हक़ है और वह उसे अनुच्छेद 19 की जनवादी व्याख्या से मिला है। ऐसे में सरकारों द्वारा मुद्दों को दरकिनार करना, सवालों से बचना और उन पर बातचीत की किसी भी कोशिश को जान-बूझकर रोकना हैरत में डालनेवाली चीज़ है।
सरकार आदतन गोपनीय ढंग से फ़ैसले लेकर हम पर थोप देती है जिसके लिए लोग तैयार नहीं होते। जब लोग उसे चुनौती देते हैं तो वह रात के अँधेरे में लिए अपने फ़ैसलों को जायज़ ठहराने के लिए प्रचार अभियान चलाती है।
भाजपा की सरकार ने ‘सबका साथ सबका िवश्वास सबका विकास’ का वादा किया था। सवाल उठता है कि क्या वह उस वादे की शुचिता को बरक़रार रखने के लिए वास्तव में सबकी सुनेगी, ख़ासकर अपने आलोचकों की? या फिर सभी विरोधियों को देशद्रोही और राष्ट्रविरोधी ही ठहराती रहेगी?
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