
नई दिल्ली- अम्बेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह जातिगत जनगणना में देरी कर रही है और डिलिमिटेशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है।
AICC सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म चेयरपर्सन सुप्रिया श्रीनेत ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राहुल गांधी ने एक साल पहले जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने पहले सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर जातिगत जनगणना नहीं कराने की बात कही थी।
यहां तक कि नरेंद्र मोदी कहते थे कि 'अर्बन नक्सल की सोच वाले लोग जातिगत जनगणना कराना चाहते हैं'। आखिर में मोदी सरकार ने जातिगत जनगणना कराने की बात मान ली। श्रीमती सोनिया गांधी जी ने अपने लेख में भी यही बात कही है कि मोदी सरकार लगातार जातिगत जनगणना से भागेगी। 2011 में आखिरी जनगणना हुई थी और फिर 2021 में जनगणना होनी थी। यानी- देश की जनगणना 5 साल पीछे चले रही है और डिजिटल जनगणना हो रही है तो उसके आंकड़ें 2027 तक आएंगे। सवाल है- बिना जनगणना के आंकड़ों के डिलिमिटेशन कैसे किया जा रहा है? जिन-जिन राज्यों में SIR हो रहा है, वहां लाखों-करोड़ों लोगों के नाम कटे हैं, यानी सरकार मान रही है कि अलग-अलग जगहों पर जनगणना बदल रही है।
• ऐसे में किस आधार पर डिलिमिटेशन किया जाएगा?
• सरकार कैसे फैसला लेगी कि SC/ST सीट कौन सी होंगी?
श्रीनेत ने बिहार और तेलंगाना में हुए जातिगत सर्वे का जिक्र करते हुए कहा कि इन सर्वे से पिछड़े वर्गों की जनसंख्या का पता चलता है। कांग्रेस OBC महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग करती रही है।
प्रेस कांफ्रेंस में श्रीनेत ने कहा," 30 महीने के अंदर मोदी सरकार ने संविधान संशोधन किया और अब खुद ही उसे बदलने की तैयारी कर रही है। सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव हैं। वहां के सारे सांसद चुनाव प्रचार में व्यस्त होंगे। ऐसे में विपक्ष ने मोदी सरकार को तीन-तीन चिट्ठियां लिखी और कहा कि 29 अप्रैल के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दों पर चर्चा कर लीजिए। लेकिन सरकार की मंशा में खोट है- जो महिला सशक्तिकरण की नहीं सोचती। ऐसे में सवाल हैं- जिस मुद्दे के लिए 16 अप्रैल से विशेष सत्र बुलाया जा रहा है, क्या उन पर चर्चा हाल ही के सत्र में नहीं हो सकती थी? आखिर क्या कारण हैं कि मोदी सरकार बीच चुनाव में सांसदों को बुलाकर चर्चा करना चाहती है? साफ है कि मोदी सरकार महिला आरक्षण के पीछे छिपकर गलत तरीके से परिसीमन करना चाहती है और जातिगत जनगणना से बचना चाहती है।"
श्रीनेत ने कहा, " आज से 30 महीने पहले सितंबर, 2023 में मोदी सरकार 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' लेकर आई, जिसमें महिला आरक्षण की बात थी। मगर तब स्थिति ऐसी थी कि सरकार की मंशा साफ़ नहीं हो रही थी। सरकार ने संविधान संशोधन किया और इसमें शर्त डाली गई कि पहले सेंसस होगा, फिर डिलिमिटेशन होगा और इसके बाद महिला आरक्षण लागू होगा। तब कांग्रेस अध्यक्ष खरगे और CPP चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कहा था कि महिला आरक्षण को बिना शर्त 2024 में ही लागू होना चाहिए, ताकि महिलाएं चुनकर सदन में आएं। लेकिन 30 महीने बाद नरेंद्र मोदी को जाने क्या हुआ- अब वो अपनी ही मर्जी से बनाया हुआ कानून बदलने जा रहे हैं।"
श्रीनेत ने आगे कहा, " जिस नींव पर महिला आरक्षण लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में आएगा, उस नींव को डालने का काम कांग्रेस पार्टी ने किया था। 73वें, 74वें संविधान संशोधन के चलते पंचायती राज में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने काम कांग्रेस पार्टी ने किया था और इसके सबसे बड़े समर्थक और जनक श्री राजीव गांधी जी थे। इस फैसले का नतीजा है कि आज 15 लाख से ज्यादा निर्वाचित महिलाएं पंचायती राज में सक्रिय हैं। इनकी कुल संख्या 40% से ज्यादा है। कांग्रेस पार्टी ने महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने का काम सर्वसम्मति से किया था। इसके लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई गई थी और लंबे समय तक विचार-विमर्श किया गया था। "
मोदी सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को कैबिनेट कमिटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स (CCPA) की बैठक में फैसला लिया कि आगामी राष्ट्रीय जनगणना 2027 में जाति गणना (caste enumeration) को शामिल किया जाएगा। यह 1931 के बाद पहली बार होगा जब सभी जातियों की गणना मुख्य जनगणना का हिस्सा बनेगी।
यह अलग से जातिगत जनगणना नहीं है, बल्कि मुख्य जनगणना का हिस्सा है।
जनगणना दो चरणों में होगी:
पहला चरण (हाउस लिस्टिंग): 1 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुका है।
दूसरा चरण (पॉपुलेशन एनुमरेशन + जाति गणना): फरवरी 2027 में
रेफरेंस डेट: 1 मार्च 2027
यह पूरी तरह डिजिटल जनगणना होगी (2011 के बाद 16 साल बाद)
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