
नई दिल्ली: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, बैंक पासबुक और पुश्तैनी जमीन के दस्तावेज किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता के निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी एक कथित बांग्लादेशी नागरिक की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए की।
न्यायमूर्ति देबांग्सु बसाक और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। यह याचिका हिरासत में लिए गए व्यक्ति के कथित चाचा ने दायर की थी। उनका आरोप था कि उनके भतीजे को 18 जून, 2026 से अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है।
अदालत ने अपने आदेश में सख्त लहजे में कहा कि याचिकाकर्ता और हिरासत में लिया गया व्यक्ति अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने में पूरी तरह विफल रहे हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 के तहत नागरिकता सिद्ध करने की जो जिम्मेदारी तय की गई है, उसे पूरा करने में वे असमर्थ रहे हैं।
याचिकाकर्ता के अनुसार, 2026 के स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू (SIR) के दौरान मतदाता सूची में हिरासत में लिए गए व्यक्ति का नाम शुरुआत में 'निर्णयाधीन' (under adjudication) रखा गया था और बाद में उसे सूची से हटा दिया गया। उनका तर्क था कि इस कार्रवाई के खिलाफ उनकी अपील अभी लंबित है और बिना किसी सुनवाई के उनके खिलाफ कदम उठाया गया। अपने दावे को मजबूत करने के लिए उन्होंने जमीन, वोटर आईडी और बैंक के कागजात अदालत के सामने पेश किए थे।
अदालत ने पाया कि जन्म स्थान और तारीख के संबंध में कोई पर्याप्त सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे जन्म के आधार पर नागरिकता साबित नहीं हो सकी। इसके अलावा, माता-पिता और वंशावली से जुड़े दस्तावेजों में भी भारी विसंगतियां पाई गईं। अलग-अलग दस्तावेजों में पिता का नाम अलग-अलग दर्ज था। मौसी और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के बीच संबंध भी दस्तावेजों से प्रमाणित नहीं हो सके। पूर्वजों की नागरिकता साबित न होने के कारण वंश के आधार पर भी नागरिकता का दावा खारिज हो गया।
इस मामले में सबसे अहम मोड़ तब आया जब अदालत ने वंशावली साबित करने के लिए माता-पिता के अवशेषों की डीएनए (DNA) जांच का सुझाव दिया। हालांकि, याचिकाकर्ता और हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने माता-पिता के दफन स्थान की जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए उनके खिलाफ एक प्रतिकूल निष्कर्ष (adverse inference) निकाला और माना कि उनके माता-पिता भारतीय नागरिक नहीं थे।
अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए सभी दस्तावेजों की बारीकी से जांच की। पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड या आयकर विभाग द्वारा जारी किया गया पैन कार्ड अपने आप में भारतीय नागरिकता का पक्का सबूत नहीं हो सकते। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि बैंक में खाता खोलना भी नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अंततः, अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि दोनों पक्ष इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 के तहत वैधानिक दायित्वों को पूरा करने में विफल रहे हैं। इन ठोस कारणों का हवाला देते हुए, हाई कोर्ट ने व्यक्ति की हिरासत के आदेश में किसी भी प्रकार का दखल देने से इनकार कर दिया।
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