
नई दिल्ली: 'वंदे मातरम' गाने में जानबूझकर बाधा डालने या इसका अपमान करने वालों को अब सख्त कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। बुधवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच राज्यसभा ने प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (अमेंडमेंट) बिल, 2026 को ध्वनि मत से पारित कर दिया। इस नए कानून के जरिए अब राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को भी राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान ही कानूनी संरक्षण और सम्मान दे दिया गया है।
यह नया विधेयक मूल रूप से 1971 के उस कानून में संशोधन करता है, जिसके तहत राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान का अपमान करना एक आपराधिक कृत्य माना गया है। नए संशोधन के अनुसार, राष्ट्रीय गीत गाने से रोकने या ऐसा करने वाली किसी भी सभा में व्यवधान पैदा करने वाले व्यक्ति को तीन साल तक की जेल, जुर्माना या फिर दोनों सजा हो सकती है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 24 जुलाई को उच्च सदन में इस बिल को पेश किया था।
उच्च सदन की कार्यवाही बुधवार दोपहर दो बजे जैसे ही शुरू हुई, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने सदस्यों को इस विधेयक पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया। हालांकि, लगभग सभी विपक्षी सांसदों ने कार्यवाही का बहिष्कार करते हुए वॉकआउट किया। विपक्ष लगातार जंतर-मंतर पर पेपर लीक का विरोध कर रहे छात्रों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहा था और इसी बात पर नारेबाजी हो रही थी।
विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कुछ सदस्यों और विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी को इस बिल से क्या परेशानी है। राय ने स्पष्ट किया कि यह महज एक संशोधन नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय जागरूकता, सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता है।
ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए केंद्रीय मंत्री ने बताया कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में इस गीत की रचना करते हुए कहा था कि एक दिन यह हर भारतीय के होठों पर मंत्र की तरह होगा। राय ने दावा किया कि 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय गीत को केवल दो पैराग्राफ तक ही सीमित कर दिया था। इसके विपरीत, 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष रहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तिमिर बरन भट्टाचार्य से इस गीत का पूर्ण संस्करण तैयार करने का आग्रह किया था।
मंत्री ने यह भी याद दिलाया कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के बराबर ही सम्मान मिलना चाहिए। राय ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने और राष्ट्रीय गौरव का अपमान करने का आरोप लगाते हुए कहा कि देश का युवा, मजदूर और महिलाएं इसका समर्थन नहीं करेंगे।
इससे पहले, जब बिल पर चर्चा शुरू हुई तो सदन में काफी शोरगुल था। कांग्रेस की रंजीत रंजन को चर्चा की शुरुआत करनी थी, लेकिन वह भी अपने साथियों के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गईं। इस पर उपसभापति ने कहा कि सदस्य बोलने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं। इसके बाद बीजेपी के राधा मोहन दास अग्रवाल को बोलने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि पिछले 123 सालों से राष्ट्रीय गीत का अपमान हो रहा है और स्वतंत्रता संग्राम के समय वाली कांग्रेस ने भी बार-बार इस गीत का अपमान किया था।
इस बीच प्रमोद तिवारी, सागरिका घोष और तिरुची शिवा जैसे विपक्षी नेता अमित शाह की मौजूदगी की मांग पर अड़े रहे, लेकिन उपसभापति ने उन्हें बिल के अलावा किसी और मुद्दे पर बोलने की अनुमति नहीं दी। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता मनोज कुमार झा ने कहा कि वह पहली बार राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा होते देख रहे हैं। उनका तर्क था कि श्रद्धा और सम्मान को कानून बनाकर लागू नहीं किया जा सकता।
बीजू जनता दल (बीजेडी) की सुलता देव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सदन का कोई भी सदस्य इस गीत को पूरी तरह से सही ढंग से नहीं गा सकता है। उन्होंने इसे सभी राज्य विधानसभाओं और संसद में बजाने का भी आग्रह किया। वहीं, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी इस बिल का पूरी तरह से समर्थन करती है, लेकिन राष्ट्रगान और तिरंगे का अपमान करने वालों के खिलाफ भी इसी तरह का सख्त कानून होना चाहिए।
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