
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुरुवार 8 अक्टूबर को एक मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार से एक बेहद अहम सवाल पूछा। अदालत ने जानना चाहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत जारी हिरासत के आदेश में 'आंदोलनजीवी' शब्द कहां से और कैसे आ गया।
यह आदेश गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी (डीएम) मेधा रूपम ने पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ जारी किया था। सत्यम वर्मा अप्रैल 2026 में हुए नोएडा मजदूर प्रदर्शन मामले में मुख्य रूप से आरोपी हैं।
जस्टिस अतुल श्रीधरन ने यूपी सरकार का पक्ष रख रहे अतिरिक्त महाधिवक्ता से सीधा सवाल किया कि यह 'आंदोलनजीवी' शब्द आखिर कहां से आया है। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि किसी आधिकारिक सरकारी दस्तावेज में ऐसे शब्द का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
पीठ ने अधिकारियों के रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए एक और गंभीर सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि क्या केवल किसी व्यक्ति की विचारधारा, उसके द्वारा पढ़ी जाने वाली सामग्री या किसी संगठन से उसके जुड़ाव को निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) का वैध आधार माना जा सकता है।
यह सख्त टिप्पणियां पत्रकार सत्यम वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आईं, जिसमें उन्होंने डीएम द्वारा 12 मई को दिए गए हिरासत आदेश को चुनौती दी है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य सरकार की मंजूरी और पुष्टि वाले आदेशों को भी पूरी तरह से रद्द करने की मांग की है।
वर्मा ने अपनी याचिका में अवैध हिरासत के लिए मुआवजे और तत्काल रिहाई की गुहार लगाई है। मामले की गंभीरता और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने 8 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
हिरासत के आदेश में दिए गए आधार के अनुसार, सत्यम वर्मा रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया (RWPI) के संस्थापक सदस्य हैं। साथ ही प्रशासन ने उन्हें 'मजदूर बिगुल' का प्रकाशक और लेखक भी बताया है।
दस्तावेज में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने एक वैचारिक भड़काने वाले के रूप में काम किया और नोएडा के औद्योगिक श्रमिकों को हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उकसाया। यह भी दावा किया गया है कि 22 मार्च 2026 को दिल्ली के करावल नगर में हुई एक बैठक में इस पूरी अशांति की साजिश रची गई थी।
आदेश में इस बात का भी जिक्र है कि संगठन से जुड़े सदस्यों ने 883 श्रमिकों को मैसेजिंग ग्रुप्स में जोड़ा, जिनका इस्तेमाल भारी संख्या में लोगों को उकसाने के लिए किया गया। प्रशासन का दावा है कि वर्मा 10 और 11 अप्रैल को हिंसा वाले प्रमुख स्थानों (हॉटस्पॉट) पर मौजूद थे।
पुलिस को उनके कार्यालय से 'मजदूर बिगुल' की प्रतियां, माओ त्से तुंग से प्रेरित लेखन वाली किताबें और कुछ अन्य आपत्तिजनक व अलोकतांत्रिक व्यवस्था वाले दस्तावेज मिलने का दावा किया गया है। प्रशासन के मुताबिक, इन सामग्रियों से हिंसा भड़काने में उनका योगदान सीधे तौर पर स्पष्ट हो जाता है।
हिरासत आदेश में बताया गया है कि 13 अप्रैल की हिंसा के कारण 100 से अधिक कंपनियों को भारी नुकसान पहुंचा और 50 से ज्यादा वाहन जला दिए गए। इस दौरान पुलिसकर्मियों और नागरिकों को चोटें आईं, घंटों तक हाईवे जाम रहे और क्षेत्र को करीब 3,000 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
प्रशासन का आरोप है कि वर्मा ने 18 से 25 साल के युवा श्रमिकों को अपना निशाना बनाया, जिससे क्षेत्र में विदेशी और घरेलू निवेश हतोत्साहित होता है। आदेश में आशंका जताई गई है कि अगर उन्हें जमानत दी जाती है, तो वह बाहर आकर दोबारा ऐसी हिंसक घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं।
डीएम के आदेश में पत्रकार को "तर्कहीन, जिद्दी और हिंसक आंदोलनजीवी" करार देते हुए सारी अशांति का दोष उन पर मढ़ा गया है। मूल हिंदी दस्तावेज में लिखा है, "आप जैसे अतार्किक व हठी हिंसक आंदोलनजीवी व्यक्तियों की कुत्सित विचारधारा के चलते..."
गौरतलब है कि 'आंदोलनजीवी' शब्द पहली बार तब बड़े पैमाने पर चर्चा में आया था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका इस्तेमाल किया था। 8 फरवरी 2021 को राज्यसभा में 2020-21 के किसान आंदोलन पर बोलते हुए पीएम मोदी ने इस शब्द का जिक्र किया था। आमतौर पर इसका इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है जो पेशेवर प्रदर्शनकारी होते हैं या जिनका अस्तित्व ही विरोध प्रदर्शनों पर टिका होता है।
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