नई दिल्ली: मणिपुर के तीन प्रमुख नागा नागरिक समाज संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में तत्काल और व्यक्तिगत हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। इन संगठनों ने पहाड़ी जिलों के नागा गांवों में कुकी गुटों द्वारा की जा रही लगातार हिंसा और क्षेत्रीय अतिक्रमण को रोकने की कड़ी मांग की है।
इन संगठनों का कहना है कि नागा गांवों पर हमलों में ड्रोन, रॉकेट लॉन्चर और सैन्य स्तर के भारी हथियारों का खुलेआम इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पार करके हथियारबंद लड़ाकों के घुसने की खबरें भी सामने आई हैं। इसे देखते हुए नागरिक समाज ने इन हमलों को एक सुनियोजित और विदेशी समर्थन प्राप्त हमला करार दिया है।
प्रधानमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि वह 'सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस' (एसओओ) समझौते के तहत काम कर रहे कुकी सशस्त्र समूहों पर लगाम लगाए। इसके अलावा, साल 2015 के 'फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' के आधार पर इंडो-नागा शांति प्रक्रिया का जल्द और सम्मानजनक समाधान निकालने की भी अपील की गई है। गौरतलब है कि यह समझौता केंद्र सरकार और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालिम (एनएससीएन-आईएम) के बीच हुआ था।
इस ज्ञापन की प्रतियां शनिवार, 9 मई की शाम को मीडिया के सामने जारी की गईं। इस पत्र पर यूनाइटेड नागा काउंसिल के अध्यक्ष एनजी लोर्हो, नागा विमेंस यूनियन की अध्यक्ष सीएच प्रिसिला थुमई और ऑल नागा स्टूडेंट्स एसोसिएशन, मणिपुर के अध्यक्ष टीएच अंगथेशांग मारिंग ने आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर किए हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि म्यांमार स्थित कुकी नेशनल आर्मी-बर्मा (केएनए-बी) के चरमपंथी एसओओ समूहों की मदद से लगातार हिंसक वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। इन गुटों ने उखरुल, कामजोंग और मणिपुर के अन्य पहाड़ी जिलों में स्थित नागा बस्तियों को विशेष रूप से अपना निशाना बनाया है।
ज्ञापन में 7 मई को जेड. चोरो, नामली-वांगली और काका गांवों में हुए भयानक हमलों का प्रमुखता से जिक्र किया गया है। इन हमलों में कई घर जला दिए गए और बड़ी संख्या में स्थानीय निवासियों को अपना घर छोड़कर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। नागा संगठनों ने इसे महज एक साधारण जातीय संघर्ष मानने से इनकार करते हुए इसे सीधे तौर पर सीमा पार से हुआ सैन्य आक्रमण बताया है।
नागा निकायों ने सरकार पर 2015 के 'फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' की मूल भावना का सम्मान न करने का भी आरोप लगाया है, जो नागा लोगों के अद्वितीय इतिहास और राजनीतिक अधिकारों को मान्यता देता है। उनका तर्क है कि नागा बस्तियों पर हमलों के बावजूद कुकी चरमपंथी समूहों को दी जा रही ढील शांति प्रक्रिया की विश्वसनीयता को खत्म करती है। साथ ही, यह बाहरी आक्रमण के खिलाफ राज्यों की रक्षा करने वाली अनुच्छेद 355 के तहत केंद्र की संवैधानिक जिम्मेदारी पर भी बड़े सवाल उठाती है।
संगठनों ने केंद्र सरकार से इन घटनाओं पर तत्काल सख्त कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने नागा क्षेत्रों से केएनए-बी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक फोर्स (म्यांमार का एक सैन्य-विरोधी गुट) और एसओओ कैडरों को खदेड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाने को कहा है। इसके अलावा उन्होंने इस बात की गारंटी भी मांगी है कि भविष्य की कोई भी नई प्रशासनिक व्यवस्था नागा पैतृक क्षेत्रों को प्रभावित नहीं करेगी।
अपनी अन्य प्रमुख मांगों में संगठनों ने मणिपुर के राजमार्गों पर लोगों की निर्बाध आवाजाही को फिर से बहाल करने पर जोर दिया है। इसके साथ ही हालिया हमलों और सुरक्षा में हुई भारी चूक की एक समयबद्ध न्यायिक जांच कराने की भी स्पष्ट मांग की गई है।
नागा संगठनों ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि कुकी सशस्त्र समूहों का निरंतर तुष्टिकरण उन लोगों के खिलाफ एक 'प्रॉक्सी वॉर' यानी छद्म युद्ध है, जिनके साथ भारत सरकार ने ऐतिहासिक समझौता किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से नागाओं के साथ शांति प्रक्रिया को एक तार्किक और सभी के लिए स्वीकार्य निष्कर्ष तक पहुंचाने में मदद करने का अनुरोध किया है।
इन निकायों ने स्पष्ट किया है कि नागा लोगों ने हमेशा शांति का मार्ग चुना है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारत की पूर्वी सीमा और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को पूरी तरह से सुनिश्चित करने के लिए एक न्यायपूर्ण राजनीतिक समाधान बेहद जरूरी है।
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