10 शोध-पत्र, 1650+ साइटेशन्स फिर भी "आप फिट नहीं बैठते": अमेरिका की यूनिवर्सिटी में भारतीय प्रोफेसरों का चीनी सहयोगी के साथ नस्लीय भेदभाव, मामला कोर्ट में!

चीनी मूल के अमेरिकी प्रोफेसर डॉ. शॉन वांग ने साउदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी (SMU) पर आरोप लगाया है कि भारतीय मूल के प्रोफेसर्स के नेतृत्व में उनके साथ सिस्टेमैटिक डिस्क्रिमिनेशन किया गया, टेन्योर (परमानेंट पद) से वंचित रखा गया और उनके खिलाफ बदला लिया गया। डॉ. वांग ने 42 U.S.C. § 1981 (सिविल राइट्स एक्ट ऑफ 1866) के तहत मुकदमा दायर किया है।
मुकदमे के अनुसार SMU के अकाउंटिंग डिपार्टमेंट में 2006 से भारतीय मूल के  हेमांग देसाई के फुल प्रोफेसर बनने के बाद से एक साफ पैटर्न दिखाई देता है। जब भी कोई भारतीय मूल का उम्मीदवार चार टॉप-टियर जर्नल पब्लिकेशन्स के यूनिवर्सिटी के अपने तय मानक पूरा करता है, तो उसे टेन्योर मिल जाता है। लेकिन गैर-भारतीय उम्मीदवारों काकेशियन और चीनी के साथ उल्टा होता है।
मुकदमे के अनुसार SMU के अकाउंटिंग डिपार्टमेंट में 2006 से भारतीय मूल के हेमांग देसाई के फुल प्रोफेसर बनने के बाद से एक साफ पैटर्न दिखाई देता है। जब भी कोई भारतीय मूल का उम्मीदवार चार टॉप-टियर जर्नल पब्लिकेशन्स के यूनिवर्सिटी के अपने तय मानक पूरा करता है, तो उसे टेन्योर मिल जाता है। लेकिन गैर-भारतीय उम्मीदवारों काकेशियन और चीनी के साथ उल्टा होता है।ग्राफिक- आसिफ निसार/ द मूकनायक
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डलास/टेक्सास- भारत में कई बार जैसे सवर्ण मानसिकता के शिक्षक दलित-पिछड़े छात्रों और सहयोगियों को प्रमोशन, शोध-मार्गदर्शन और शिकायत-सुनवाई में जिस तरह हाशिये पर धकेलते हैं, उसी मानसिकता का एक नया अध्याय अब अमेरिका की एक नामी यूनिवर्सिटी में भी लिखा जा रहा है, जहाँ भारतीय मूल के प्रोफेसरों पर एक चीनी-अमेरिकी सहयोगी के साथ नस्लीय भेदभाव के गंभीर आरोप लगे हैं।

साउदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी (SMU) के एडविन एल. कॉक्स स्कूल ऑफ बिजनेस में अकाउंटिंग विभाग के एक चीनी-अमेरिकी प्रोफेसर डॉ. शॉन वांग (Sean Wang ) ने अमेरिका के ऐतिहासिक नागरिक अधिकार कानून- सिविल राइट्स एक्ट 1866 के तहत विश्वविद्यालय पर मुकदमा दायर किया है। उनका आरोप है कि SMU के अकाउंटिंग विभाग में भारतीय मूल के प्रोफेसरों ने व्यवस्थित ढंग से गैर-भारतीय फैकल्टी के साथ भेदभाव किया और उन्हें टेन्योर यानी परमानेंट पद से वंचित रखा।

डॉ. वांग कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से पीएचडी हैं और पहले UNC के Kenan-Flagler School of Business में कार्यरत रहे हैं। उन्होंने SMU में दस शोध-पत्र विश्व की शीर्ष अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किए जबकि टेन्योर के लिए केवल चार का मानक निर्धारित था। 1,650 से अधिक शोध-उद्धरण (citations) और हार्वर्ड, बर्कली, कैलॉग व लंदन बिजनेस स्कूल में व्याख्यान-निमंत्रण के बावजूद उन्हें न केवल टेन्योर नकारा गया, बल्कि अंततः "टर्मिनल ईयर" नोटिस देकर विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

कैसे हुआ भेदभाव?

शिकायत के अनुसार जब 2006 में भारतीय मूल के हेमंग देसाई विभाग के पूर्ण प्रोफेसर बने, तब से आज तक अकाउंटिंग विभाग में जितने भी भारतीय मूल के उम्मीदवारों ने न्यूनतम चार शीर्ष-पत्रिका प्रकाशन का मानक पूरा किया, उन्हें 100 प्रतिशत टेन्योर मिला, नील भट्टाचार्य (2008) और गौरी भट्ट (2020)। इसके विपरीत, पाँच गैर-भारतीय उम्मीदवारों मीना पिज़्ज़िनी, क्रिस होगन, जिंग पैन, जेफ यू और स्वयं डॉ. वांग में से किसी को भी टेन्योर- सपोर्ट नहीं दिया गया, जबकि सबने मानक पूरा किया था। यह सफलता दर शून्य प्रतिशत रही।

इस पैटर्न को शिकायत में "वंश-आधारित व्यवस्थित भेदभाव" करार दिया गया है। डॉ. वांग का कहना है कि विभागाध्यक्ष डॉ. हेमंग देसाई ने इस पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित किया और उनके खिलाफ मानक लगातार बदलते रहे।

बदलते पोस्ट- कैसे खिसकती रही लक्ष्मण रेखा?

2017 में SMU में नियुक्ति के समय ही डॉ. वांग के पास चार टॉप-टियर प्रकाशन थे यानी वे नियुक्ति के दिन से ही टेन्योर के योग्य थे। बावजूद इसके चेयर देसाई और Associate Dean बिल डिलन ने उन्हें "एक-दो और जोड़ लेने" की सलाह दी।

मई 2020 में जब डॉ. वांग ने अर्ली टेन्योर के लिए आवेदन किया, तो उन्हें नकार दिया गया और नई शर्तें सामने रखी गईं - "अधिक citations", "अधिक visibility" और जब 2022 तक उन्होंने इन मानकों को भी पार कर लिया और citations में तीनों भारतीय टेन्योर-प्राप्त प्रोफेसरों से आगे निकल गए, तब एक नई शर्त सामने आई — "bad fit" यानी विभाग में "फिट नहीं बैठते।" यह तर्क 2022 से 2025 के बीच कम से कम तेरह बार दोहराया गया।

शिकायत में तुलनात्मक उदाहरण देते हुए बताया गया है कि उसी फरवरी 2022 में विभागाध्यक्ष देसाई ने भारतीय सहयोगी डॉ. सोरभ तोमर की प्रशंसा की जिनके उस समय एक भी प्रकाशन नहीं था। उल्लेखनीय है कि डॉ. तोमर के पास भी डॉ. वांग जैसे "behavioral research" पेपर थे, फिर भी उनके लिए "bad fit" जैसा कोई तर्क नहीं दिया गया।

मुकदमे में सबसे गंभीर आरोप फरवरी 2024 का है। डॉ. वांग का कहना है कि उनके टेन्योर दस्तावेज जमा करने के छह महीने पहले ही डॉ. देसाई और डॉ. शॉ ने उन्हें स्पष्ट रूप से बता दिया था कि चाहे उनकी रिसर्च कितनी भी अच्छी हो, बाहरी विशेषज्ञों के पत्र कितने भी सकारात्मक हों , विभाग और प्रमोशन और टेन्योर कमेटी दोनों से उन्हें नकारात्मक वोट ही मिलेगा।

गौरतलब है कि एसएमयू ने अपने फैकल्टी परमिशन टू हायर फॉर्म में डॉ. वांग को अपने एचआर और ईईओ रिकॉर्ड में "श्वेत" के रूप में दर्ज किया, जिससे उनकी स्वयं द्वारा पहचानी गई अल्पसंख्यक स्थिति को मिटा दिया गया और उनके साथ एक श्वेत व्यक्ति के रूप में व्यवहार किया गया ताकि वे उनके साथ आसानी से भेदभाव कर सकें।

मुकदमे के अनुसार SMU के अकाउंटिंग डिपार्टमेंट में 2006 से भारतीय मूल के  हेमांग देसाई के फुल प्रोफेसर बनने के बाद से एक साफ पैटर्न दिखाई देता है। जब भी कोई भारतीय मूल का उम्मीदवार चार टॉप-टियर जर्नल पब्लिकेशन्स के यूनिवर्सिटी के अपने तय मानक पूरा करता है, तो उसे टेन्योर मिल जाता है। लेकिन गैर-भारतीय उम्मीदवारों काकेशियन और चीनी के साथ उल्टा होता है।
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वरिष्ठ शिक्षाविदों ने क्या कहा?

डॉ. वांग के मामले में कॉक्स विश्वविद्यालय में 35 वर्षों से कार्यरत और कई पी एंड टी समितियों में सेवा दे चुकीं प्रोफेसर रॉबिन पिंकली ने डीन मायर्स को लिखा कि विभाग का "उपयुक्तता" पर निर्भर रहना "स्वार्थपूर्ण" है और "शीर्ष स्तरीय प्रकाशनों, उद्धरणों की संख्या और हार्वर्ड, लंदन बिजनेस स्कूल, केलॉग, बर्कले और कार्नेगी मेलन में बोलने के निमंत्रणों द्वारा प्रदान किए गए अनुभवजन्य साक्ष्यों की तुलना में यह टिकता नहीं है।"

प्रोफेसर पिंकली ने निष्कर्ष निकाला कि " वांग के मामले को पी एंड टी दस्तावेज़ और समानता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के अनुरूप निष्पक्ष तरीके से नहीं निपटाया गया," और चेतावनी दी कि वर्तमान नेतृत्व के पूर्वाग्रह के इस तरीके को "बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।"

वित्त विभाग के पूर्ण प्रोफेसर, एसएमयू; प्रोवोस्ट की कार्यकाल एवं पदोन्नति सलाहकार समिति के सदस्य प्रोफेसर पाब जोटिकाष्टिरा ने डॉ. वांग के कार्य अनुभव की तुलना लेखांकन विभाग में हाल ही में स्थायी पद प्राप्त करने वाले दो भारतीय प्रोफेसरों से की। प्रोफेसर जोटिकाष्टिरा ने पाया कि डॉ. वांग "गौरी भट की तुलना में कहीं अधिक उत्पादक हैं" और "उनका कार्य अनुभव नील भट्टाचार्य के समकक्ष है, जो उनसे दस वर्ष वरिष्ठ हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि "कोई भी समझदार व्यक्ति वांग के उद्धरणों की संख्या को स्थायी पद के लिए पर्याप्त से अधिक मानेगा।" प्रोफेसर जोटिकाष्टिरा ने विभाग की गुणवत्ता और "उपयुक्तता" संबंधी आपत्तियों को "व्यक्तिगत पसंद" और "बेतुका" बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि दस शीर्ष स्तरीय प्रकाशनों की सफलता "महज भाग्य पर निर्भर नहीं हो सकती" क्योंकि इन पत्रिकाओं में स्वीकृति दर दस प्रतिशत से भी कम है।

टेक्सास विश्वविद्यालय, ऑस्टिन के प्रोफेसर जेफ हेल्स ने डॉ. वांग को "एक उत्कृष्ट शोधकर्ता बताया, जिनके समकक्ष बहुत कम हैं।" शीर्ष बीस बिजनेस स्कूलों में हाल ही में हुई पदोन्नतियों के संदर्भ में, प्रोफेसर हेल्स ने लिखा कि डॉ. वांग के 11 सहकर्मी-समीक्षित लेख (फाइनेंशियल टाइम्स के शीर्ष 50 जर्नलों में से 10) और लगभग 2,000 उद्धरण एक औसत पूर्ण प्रोफेसर के रिकॉर्ड के बराबर हैं, और डॉ. वांग के पास "मेरे करियर के इसी मुकाम पर मेरे उद्धरणों से कहीं अधिक उद्धरण हैं।" उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि एसएमयू ने डॉ. वांग को "ठीक इसी तरह के शोध के लिए नियुक्त किया था - और उन्होंने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया।"

प्रोफेसर डेविड वुड (ग्लेन डी. आर्डिस प्रोफेसर ऑफ अकाउंटिंग, ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी) ने एसएमयू के इस दावे को "हास्यास्पद" बताया कि डॉ. वांग ने अनुसंधान मानकों को पूरा नहीं किया और डॉ. वांग ने शीर्ष 20 स्कूलों के लिए भी निर्धारित अनुसंधान मानकों को पूरी तरह से पूरा किया।

कमरों के बंटवारे में भी पूर्वी-एशियाई प्रोफेसरों से भेदभाव

मुकदमे में दो और गंभीर आरोप हैं। पहला कि कार्यालय आवंटन में भेदभाव हुआ। 2024 में नई इमारत में कमरे बाँटते समय, भारतीय मूल के प्रोफेसरों (देसाई, तोमर, भट्टाचार्य) को Bishop Boulevard की ओर खुलने वाले बेहतर कमरे दिए गए, जबकि पूर्वी-एशियाई प्रोफेसरों (लियू, यून और वांग) को गलियारे के दूसरे छोर पर भेज दिया गया।

दूसरा आरोप है कि SMU के HR/EEO रिकॉर्ड में डॉ. वांग की नस्ल "White" दर्ज की गई, जबकि उन्होंने स्वयं को Chinese/East-Asian बताया था। यह कोई टाइपिंग की गलती नहीं थी फॉर्म में "White" टाइप किया गया था, और डॉ. वांग का उपनाम व आमने-सामने मुलाकातें उनकी पहचान स्पष्ट करती थीं। इस गलत वर्गीकरण के कारण उनकी अल्पसंख्यक स्थिति आधिकारिक रिकॉर्ड से ही गायब हो गई।

मुकदमे की सुनवाई 1 फरवरी, 2027 को निर्धारित है।

घटनाक्रम एक नज़र में


2006: हेमंग देसाई (भारतीय मूल) SMU Cox अकाउंटिंग विभाग में पूर्ण प्रोफेसर बने, इसके बाद से भेदभाव का पैटर्न शुरू होना बताया गया है।

नवम्बर 2017: डॉ. सीन वांग SMU में Assistant Professor के रूप में नियुक्त, पहले दिन से ही टेन्योर-योग्य।

मई 2020: अर्ली टेन्योर आवेदन नकारा गया; नई शर्तें: "अधिक citations", "अधिक visibility"

फरवरी 2022: तीसरे वर्ष की समीक्षा में "bad fit" का तर्क जबकि कमजोर रिकॉर्ड वाले भारतीय सहयोगी की प्रशंसा।

फरवरी 2024: दस्तावेज जमा होने से 6 महीने पहले ही नकारात्मक परिणाम की घोषणा।

नवम्बर 2024: विभाग में 3-1 से नकारात्मक वोट, तीनों भारतीय प्रोफेसरों ने विरोध में मत दिया।

जनवरी 2025: Dean का एक-पंक्ति का निर्णय: "outstanding नहीं।"

अप्रैल 2025: Provost का आदेश: "टर्मिनल ईयर" Spring 2026 में रोजगार समाप्त।

नवम्बर 2025: Federal Court में मुकदमा दायर। SMU ने सभी आरोप नकारे।

डॉ. वांग की माँगें हैं कि

1. उन्हें तुरंत Associate Professor पद पर टेन्योर दिया जाए।

2. Full Professor पद के लिए त्वरित और निष्पक्ष समीक्षा, पिछले वेतन-हानि की भरपाई के साथ।

3. SMU में टेन्योर निर्णयों में "fit" जैसे व्यक्तिपरक मानकों पर प्रतिबंध।

4. नस्ल-आधारित भेदभाव की पुनरावृत्ति रोकने के लिए लिखित नीतियाँ और दंड।

5. क्षतिपूर्ति, दंडात्मक हर्जाना, वकील-शुल्क और ब्याज।

विश्वविद्यालय की ओर से दायर प्रतिक्रिया संक्षिप्त है। SMU ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि डॉ. वांग किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं। विश्वविद्यालय ने अपनी प्रतिक्रिया में कोई बिंदुवार खंडन नहीं किया है। मुकदमे की सुनवाई 1 फरवरी 2027 से निर्धारित है।

मुकदमे के अनुसार SMU के अकाउंटिंग डिपार्टमेंट में 2006 से भारतीय मूल के  हेमांग देसाई के फुल प्रोफेसर बनने के बाद से एक साफ पैटर्न दिखाई देता है। जब भी कोई भारतीय मूल का उम्मीदवार चार टॉप-टियर जर्नल पब्लिकेशन्स के यूनिवर्सिटी के अपने तय मानक पूरा करता है, तो उसे टेन्योर मिल जाता है। लेकिन गैर-भारतीय उम्मीदवारों काकेशियन और चीनी के साथ उल्टा होता है।
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मुकदमे के अनुसार SMU के अकाउंटिंग डिपार्टमेंट में 2006 से भारतीय मूल के  हेमांग देसाई के फुल प्रोफेसर बनने के बाद से एक साफ पैटर्न दिखाई देता है। जब भी कोई भारतीय मूल का उम्मीदवार चार टॉप-टियर जर्नल पब्लिकेशन्स के यूनिवर्सिटी के अपने तय मानक पूरा करता है, तो उसे टेन्योर मिल जाता है। लेकिन गैर-भारतीय उम्मीदवारों काकेशियन और चीनी के साथ उल्टा होता है।
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