
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत किसी भी समुदाय को कब्रिस्तान बनाने के लिए किसी विशेष सरकारी ज़मीन पर दावा करने का मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि अंतिम संस्कार अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार करने का अधिकार तो है, लेकिन इसके लिए किसी खास प्लॉट की मांग नहीं की जा सकती।
यह फैसला जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने 'क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी' द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें गाज़ियाबाद में बंजर ज़मीन के एक टुकड़े को ईसाई कब्रिस्तान में बदलने की मांग की गई थी।
12 अक्टूबर को दिए गए अपने फैसले में अदालत ने साफ किया कि ग्राम सभा की किसी भी ज़मीन को कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल के लिए 'सार्वजनिक उपयोगिता वाली ज़मीन' में बदलना पूरी तरह से एक प्रशासनिक या कार्यकारी निर्णय है।
अदालत ने कहा, "किसी भी व्यक्ति को यह कानूनी अधिकार नहीं है कि वह किसी विशेष गैर-सार्वजनिक उपयोगिता वाली ज़मीन को सार्वजनिक उपयोगिता वाली ज़मीन में बदलने की मांग करे।"
हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि अगर वास्तव में जगह की कमी है, तो अधिकारी जनहित को ध्यान में रखते हुए ऐसे अनुरोधों पर विचार कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता सोसाइटी ने अपने अध्यक्ष विनय कुमार पॉल के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। इस सोसाइटी का एक मुख्य उद्देश्य ईसाइयों के अंतिम संस्कार में सहायता करना है।
पूरा विवाद गाज़ियाबाद की मोदी नगर तहसील के परगना जलालाबाद के विसोखर गांव में स्थित 0.3420 हेक्टेयर ज़मीन को लेकर था। सरकारी रिकॉर्ड में यह ज़मीन 'बंजर' दर्ज थी। सोसाइटी का तर्क था कि बेगमाबाद बुढ़ाना स्थित मौजूदा कब्रिस्तान में जगह कम पड़ने के कारण इलाके के ईसाई निवासियों को अंतिम संस्कार में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
सोसाइटी ने बताया कि मोदी नगर नगर पालिका परिषद के बोर्ड ने 22 जनवरी 2018 को एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें इस ज़मीन को ईसाई कब्रिस्तान के लिए आवंटित करने का प्रस्ताव रखा गया था। यह प्रस्ताव ज़िला अधिकारियों को भेजा गया था, लेकिन ज़मीन को इस उद्देश्य के लिए न तो बदला गया और न ही आरक्षित किया गया।
इससे पहले भी सोसाइटी ने जनहित याचिका (PIL) के ज़रिए हाईकोर्ट से मांग की थी कि ईसाई समुदाय को इस ज़मीन का इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर करने की अनुमति दी जाए।
उन कार्यवाहियों में हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद, गाज़ियाबाद के अपर ज़िलाधिकारी (प्रशासन) ने इस साल जनवरी में उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 77(2) के तहत इस अनुरोध को खारिज कर दिया था।
इस अस्वीकृति आदेश को चुनौती देते हुए सोसाइटी ने दलील दी कि उपयुक्त ज़मीन का आवंटन न होने से उसके सदस्यों के धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है, जिसमें अंतिम संस्कार करना भी शामिल है।
दूसरी ओर, ज़िला अधिकारियों का कहना था कि यह ज़मीन बंजर के रूप में दर्ज है और खाली पड़ी है। पारंपरिक रूप से किसी भी समुदाय ने इसका इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर नहीं किया है।
उप-ज़िलाधिकारी (SDM) की एक रिपोर्ट में अन्य स्थानीय लोगों और समुदायों के आवेदनों का हवाला दिया गया था। इसमें यह आशंका जताई गई थी कि अगर ज़मीन ईसाई समुदाय को आवंटित की जाती है, तो भविष्य में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि पास ही में एक ईसाई कब्रिस्तान पहले से मौजूद है और उसका इस्तेमाल भी हो रहा है।
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