
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए यह साफ कर दिया है कि लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (DLSA) के पास तलाक की डिक्री देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
अदालत ने बीते 30 अप्रैल को पारित अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि किसी भी वैवाहिक संबंध को खत्म करने की शक्ति विशेष रूप से केवल पारिवारिक अदालतों (फैमिली कोर्ट) के पास है। लोक अदालतों का काम सिर्फ दो पक्षों के बीच समझौते को सुविधाजनक बनाना है, वे कोई न्यायिक फैसला नहीं सुना सकतीं।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। इस याचिका में महिला ने साल 2018 में उन्नाव के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती दी थी।
महिला का आरोप था कि उसके पति ने DLSA द्वारा दर्ज किए गए समझौते को ही तलाक की डिक्री मान लिया। इसी समझौते को आधार बनाकर उस व्यक्ति ने दूसरी शादी भी कर ली थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009 के तहत तलाक से जुड़े वैवाहिक विवादों को फैसले के लिए लोक अदालतों में नहीं भेजा जा सकता है।
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि लोक अदालत की भूमिका केवल विवादित पक्षों के बीच आपसी समझौते को बढ़ावा देने तक ही सीमित है। इसका काम कानूनी रूप से किसी भी तरह के विवाद का न्यायिक निपटारा करना नहीं है।
उन्नाव के DLSA द्वारा चलाई गई कार्यवाही पर चिंता जताते हुए अदालत ने एक बड़ी बात कही। जजों ने कहा कि जब कानून ही लोक अदालतों को तलाक देने से रोकता है, तो ऐसे आदेश पारित करना सीधे तौर पर उनके अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है।
समझौते में लिखी गई उस शर्त को भी हाईकोर्ट ने कानूनी रूप से अमान्य और शून्य करार दिया, जिसमें कहा गया था कि पति और पत्नी दोनों भविष्य में पुनर्विवाह करने के लिए स्वतंत्र हैं।
खंडपीठ ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में किसी भी सक्षम अदालत द्वारा तलाक की कोई वैध डिक्री कभी पारित ही नहीं की गई थी। इसलिए, पति द्वारा उस समझौते को तलाक के सबूत के रूप में पेश करने को कानून की नजर में कोई मान्यता नहीं दी जा सकती।
याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने उस महिला को यह छूट दी है कि वह कानून के अनुसार आगे के उचित उपाय अपना सकती है।
भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने के लिए अदालत ने एक अहम निर्देश भी दिया। जजों ने कहा कि इस फैसले की एक प्रति राज्य भर की सभी लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजी जाए, ताकि वे भविष्य में इसका पालन कर सकें।
कोर्ट ने अपनी बात खत्म करते हुए यह जरूर माना कि त्वरित और सुलभ न्याय सुनिश्चित करने के लिए लोक अदालतें एक बेहतरीन व्यवस्था हैं। हालांकि, उन्हें हमेशा अपने वैधानिक अधिकारों की सीमा के भीतर ही काम करना चाहिए और नियमित अदालतों के लिए आरक्षित क्षेत्रों में दखल देने से बचना चाहिए।
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