देह व्यापार में धकेली गई नाबालिगों के मामलों में लागू होगा POCSO एक्ट: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: व्यावसायिक यौन शोषण के लिए देह व्यापार में धकेली गई नाबालिगों पर लागू होंगे पॉक्सो (POCSO) एक्ट के कड़े नियम, बच्चों की 'सहमति' का कानून में कोई स्थान नहीं।
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और कड़े फैसले में स्पष्ट किया है कि व्यावसायिक यौन शोषण (CSE) के लिए बच्चों की तस्करी से जुड़े मामलों में सख्त पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत आरोप तय किए जा सकते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ऐसे गंभीर मामलों में पॉक्सो के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम (ITPA) के प्रासंगिक प्रावधान भी लागू होंगे।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने शुक्रवार (29 मई, 2026) को यह महत्वपूर्ण आदेश दिया। अदालत ने यौनकर्मियों की चिंताओं को कम करने के लिए कई अहम निर्देश जारी किए। इसके अलावा, अपराधियों पर मुकदमा चलाने और पीड़ितों के सुरक्षित पुनर्वास के लिए पूरे कानूनी ढांचे को भी स्पष्ट किया।

सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं

पीठ ने अपने फैसले में साफ कहा कि यदि शोषण के लिए किसी वयस्क पीड़ित की सहमति धोखे, धमकी, बल प्रयोग, अपहरण या सत्ता के दुरुपयोग से हासिल की गई है, तो उस सहमति का कानून की नजरों में कोई मोल नहीं है। इसके अलावा, पैसे या अन्य फायदों का लालच देकर ली गई सहमति भी पूरी तरह से अप्रासंगिक मानी जाएगी।

नाबालिगों के मामले में अदालत ने और भी सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने कहा कि तस्करी की शिकार किसी भी नाबालिग की सहमति पूरी तरह से अर्थहीन है। बच्चों के मामले में यह देखना भी जरूरी नहीं है कि उनसे सहमति लेने के लिए किसी तरह के अनुचित साधनों का इस्तेमाल किया गया था या नहीं। बिना सहमति के काम कराना ही तस्करी के अपराध का एकमात्र आधार नहीं है, बल्कि पूरा ध्यान अपराधियों के इरादों और उनके द्वारा किए गए कृत्यों पर होना चाहिए। एक बार जब तस्करी का अपराध और इसमें धोखे या दबाव का इस्तेमाल साबित हो जाता है, तो पीड़ित की 'सहमति' का कोई भी बचाव तुरंत खारिज कर दिया जाना चाहिए।

अदालत ने एक और मार्मिक तथ्य सामने रखा कि यदि किसी व्यक्ति को यह पता है कि उसे यौन उद्योग या वेश्यावृत्ति में काम पर रखा जा रहा है, तो भी उसे तस्करी का शिकार मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। अक्सर पीड़ितों को काम की शर्तों के बारे में धोखा दिया जाता है, जो आगे चलकर उनके लिए बेहद शोषणकारी और अमानवीय साबित होती हैं।

संविधान का अनुच्छेद 23 और न्यायपालिका का उदार दृष्टिकोण

शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 23 का हवाला देते हुए याद दिलाया कि यह इंसानों की तस्करी, बेगार और अन्य सभी प्रकार के जबरन श्रम पर सख्त रोक लगाता है। अदालत के अनुसार, इसका दायरा बेहद व्यापक और असीमित है। यह मानव तस्करी के हर रूप पर गहरा प्रहार करता है और यह केवल राज्य के खिलाफ ही नहीं, बल्कि ऐसी अमानवीय प्रथाओं में शामिल किसी भी निजी व्यक्ति पर भी समान रूप से लागू होता है।

पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अनुच्छेद 23 या इसे लागू करने वाले कानूनों से निपटते समय, अदालत ने हमेशा एक उदार दृष्टिकोण अपनाया है। न्यायपालिका का एकमात्र उद्देश्य शोषण के शिकार सभी लोगों को पूरी सुरक्षा और कानूनी लाभ पहुंचाना रहा है।

बच्चों के खिलाफ अपराधों में पॉक्सो के सख्त नियम

फैसले में स्पष्ट किया गया है कि जब व्यावसायिक यौन शोषण की शिकार कोई बच्ची या बच्चा होता है, तो ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 143 और 144 तथा ITPA के प्रावधानों के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट के कड़े प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। भारतीय कानून में इस तथ्य को लेकर कोई भ्रम नहीं है कि बच्चे से जुड़ा हर कृत्य और यौन शोषण कानूनी रूप से गैर-सहमति वाला ही माना जाएगा।

पॉक्सो एक्ट को बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, गंभीर यौन हमले और बाल यौन शोषण सामग्री बनाने या रखने जैसे हर अपराध से निपटने के लिए ही विशेष रूप से तैयार किया गया है। जब कोई मामला पॉक्सो एक्ट के तहत आता है, तो अभियोजन के कई पहलू पूरी तरह बदल जाते हैं। इसके तहत अपराध की रिपोर्ट दर्ज करने, पीड़ित का बयान लेने और मेडिकल जांच की प्रक्रिया बच्चों के हितों के प्रति अधिक संवेदनशील और सुरक्षित होती है।

पीड़ितों का सशक्तिकरण और जांच अधिकारियों के लिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक आदेश गैर-सरकारी संगठन (NGO) 'प्रज्ज्वला' द्वारा दायर एक मामले में दिया है। इस याचिका में मानव तस्करी पर लगाम लगाने और व्यावसायिक यौन शोषण के शिकार लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका से कड़े दिशा-निर्देश मांगे गए थे।

अदालत ने कहा कि उनका यह सचेत प्रयास है कि तस्करी के शिकार लोगों को केवल 'बचाए जाने वाले असहाय विषयों' के रूप में देखने की पुरानी मानसिकता को बदला जाए। इसके बजाय, उन्हें ऐसे सक्षम व्यक्तियों के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए जो खुद को सशक्त बनाने के लिए अपने फैसले लेने में पूरी तरह समर्थ हैं।

बेंच ने जांच अधिकारियों को भी अहम निर्देश देते हुए कहा कि व्यावसायिक यौन शोषण के लिए तस्करी से जुड़े मामलों में लागू होने वाले कानूनी प्रावधान स्थिर नहीं हैं। ये पीड़ित की उम्र, तस्कर द्वारा अपनाए गए क्रूर तरीकों और शोषण की प्रकृति जैसे कई कारकों पर निर्भर करते हैं। कोई भी एक कानून ऐसे मामलों में अकेले काम नहीं करता। इसलिए, एक जांच अधिकारी को प्रत्येक मामले को एक समग्र दृष्टिकोण से देखना चाहिए और सभी कानूनी प्रावधानों के प्रति सचेत रहना चाहिए।

अंत में, शीर्ष अदालत ने साफ किया कि बिना उचित पुनर्वास के, पीड़ित मजबूरन वापस उन्हीं परिस्थितियों में लौट जाता है जिसने उसे पहली बार निशाना बनाया था। इसलिए, यह संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 की सबसे बुनियादी और अहम आवश्यकता है कि शोषणकारी व्यवस्था के शिकार लोगों का समाज में सम्मानजनक रूप से पुनर्वास किया जाए।

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