TM Investigation: धीरेंद्र शास्त्री के ऑक्सफोर्ड-कैंब्रिज में ‘भूतों पर PHD’ वाले दावे की पड़ताल में क्या निकला?

नेशनल टीवी के पॉडकास्ट पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का दावा, कहा- ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज में पैरानॉर्मल पर शुरू हो चुके हैं कोर्स
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भोपाल। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक बार फिर अपने बयान को लेकर विवादों में हैं। इस बार मामला उनके उस दावे से जुड़ा है, जो उन्होंने एक नेशनल न्यूज चैनल के पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान किया था। बातचीत में उन्होंने कहा था कि दुनिया की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज अब “पैरानॉर्मल”, “भूत-प्रेत” और “अलौकिक शक्तियों” जैसे विषयों पर रिसर्च और PHD करा रही हैं।

धीरेंद्र शास्त्री ने यह भी कहा था कि इंटरनेट पर इसकी जानकारी उपलब्ध है और कोई भी जाकर चेक कर सकता है कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पैरानॉर्मल स्टडीज़ पर कोर्स शुरू हो चुके हैं। उन्होंने यह तक दावा किया था कि वह स्वयं भी भविष्य में पैरानॉर्मल विषय पर PHD करने वाले हैं।

उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में वीडियो और पोस्ट वायरल हुए। कई समर्थकों ने इसे “सनातन ज्ञान की वैश्विक स्वीकार्यता” बताते हुए प्रचारित किया। हालांकि, जब ‘द मूकनायक’ की इन्वेस्टिगेशन टीम ने इस पूरे दावे की तथ्यात्मक जांच शुरू की, तो तस्वीर बिल्कुल अलग सामने आई।

ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी दोनों संस्थानों ने दावे को खारिज किया

दावे की सच्चाई जानने के लिए ‘द मूकनायक’ की टीम ने सीधे इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज से संपर्क किया। दोनों विश्वविद्यालयों को आधिकारिक ईमेल भेजकर पूछा गया कि क्या उनके यहां “पैरानॉर्मल”, “भूत-प्रेत”, “आत्माओं” या “अलौकिक शक्तियों” पर कोई आधिकारिक PHD प्रोग्राम या अकादमिक कोर्स संचालित किया जा रहा है। साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वहां किसी प्रकार का आवेदन या एडमिशन प्रक्रिया शुरू की है।

पैरानॉर्मल, भूत-प्रेत, सुपरनेचुरल स्टडीज़ या पैरासाइकोलॉजी से जुड़े किसी कोर्स, PHD प्रोग्राम या रिसर्च की सुविधा उपलब्ध है या नहीं साथ ही धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वहां किसी प्रकार का आवेदन या एडमिशन लिया है इस सवाल पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से मार्कस (Marcus) ने जवाब देते हुए स्पष्ट कहा कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी इस तरह का कोई कोर्स संचालित नहीं कर रही है। उन्होंने अपने जवाब में “No” लिखते हुए पैरानॉर्मल स्टडीज़ से जुड़े दावे को खारिज कर दिया। वहीं धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आवेदन संबंधी सवाल को यूनिवर्सिटी ने अपने FOI (Freedom of Information) विभाग को भेजने की बात कही।
इसी तरह कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने भी स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय इस तरह का कोई कोर्स संचालित नहीं कर रहा।

द मूकनायक ने ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से किया संपर्क
द मूकनायक ने ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से किया संपर्क

इंटरनेट और यूनिवर्सिटी वेबसाइट की जांच में भी नहीं मिला कोई प्रमाण

‘द मूकनायक’ की जांच टीम ने दोनों विश्वविद्यालयों की आधिकारिक वेबसाइटों, कोर्स कैटलॉग, रिसर्च विभागों और उपलब्ध PHD प्रोग्राम्स की विस्तृत जांच की। पड़ताल में पाया गया कि दोनों विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान, धर्म अध्ययन, दर्शनशास्त्र, न्यूरोसाइंस और सांस्कृतिक अध्ययन जैसे विषयों पर रिसर्च जरूर होती है, लेकिन “भूत-प्रेत”, “आत्माओं से संवाद” या “पैरानॉर्मल शक्तियों” को लेकर कोई आधिकारिक अकादमिक कोर्स उपलब्ध नहीं है।

जांच में कहीं भी ऐसा कोई दस्तावेज, प्रेस रिलीज, विभागीय नोटिफिकेशन या रिसर्च प्रोग्राम नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि ऑक्सफोर्ड या कैंब्रिज यूनिवर्सिटी “भूतों पर PHD” शुरू कर रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के कुछ संस्थानों में “belief systems”, “supernatural beliefs” या “parapsychology” जैसे विषयों पर सीमित अकादमिक अध्ययन जरूर होता है, लेकिन इन्हें वैज्ञानिक रूप से “भूतों के अस्तित्व” को प्रमाणित करने वाले कोर्स के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता।

सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ दावा, समर्थकों ने बताया ‘सनातन की जीत’

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो और पोस्ट वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि अब पश्चिमी दुनिया भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं को स्वीकार करने लगी है। कई पोस्ट्स में कहा गया कि विदेशी विश्वविद्यालय अब “आत्माओं” और “अलौकिक शक्तियों” पर रिसर्च करेंगे।

हालांकि, इन दावों के समर्थन में कोई आधिकारिक दस्तावेज या विश्वविद्यालयीय घोषणा सामने नहीं आई। विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया के दौर में सार्वजनिक मंचों से दिए गए बयान बिना तथ्य जांचे तेजी से वायरल हो जाते हैं और बाद में लोगों के बीच “सत्य” की तरह स्थापित हो जाते हैं।

वैज्ञानिक सोच और सार्वजनिक जिम्मेदारी पर उठे सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में रिसर्च वैज्ञानिक पद्धति, अकादमिक समीक्षा और प्रमाण आधारित अध्ययन पर आधारित होती है। ऐसे में “भूतों पर PHD” जैसे दावे बिना आधिकारिक दस्तावेजों के भ्रामक हैं।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के करोड़ों अनुयायी हैं और उनके बयान बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचते हैं। ऐसे में सार्वजनिक मंचों पर अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक संस्थानों से जुड़े दावे करते समय तथ्यात्मक जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार बिना प्रमाण के किए गए दावे न केवल भ्रम पैदा करते हैं, बल्कि विज्ञान और अकादमिक संस्थानों की विश्वसनीयता को लेकर भी गलत संदेश देते हैं।

BA के बाद सीधे PHD?

एक नेशनल न्यूज़ चैनल को दिए एक इंटरव्यू में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने स्वयं कहा था कि उन्होंने बीए (ग्रेजुएशन) तक पढ़ाई की है। इसी बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि वह भविष्य में पीएचडी करने पर विचार कर रहे हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में भी उनकी शिक्षा को लेकर ग्रेजुएशन तक पढ़ाई करने के दावे सामने आते रहे हैं।

हालांकि, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के इस बयान के बाद शिक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल भी खड़े होते हैं, क्योंकि भारत में सामान्य विश्वविद्यालयी नियमों के अनुसार पीएचडी में प्रवेश के लिए स्नातकोत्तर (मास्टर डिग्री) होना आवश्यक माना जाता है। अधिकांश विश्वविद्यालयों में बीए के बाद सीधे पीएचडी में प्रवेश का प्रावधान नहीं होता और पहले संबंधित विषय में मास्टर डिग्री पूरी करनी पड़ती है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को उच्च शिक्षा की प्रक्रिया और पीएचडी में प्रवेश से जुड़े नियमों की पूरी जानकारी है, क्योंकि बीए के बाद सीधे पीएचडी करने की बात अकादमिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं मानी जाती।

पहले भी विवादों में रहे हैं धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री

इससे पहले भी अपने चमत्कारों, कथित दिव्य शक्तियों और सार्वजनिक बयानों को लेकर विवादों में रहे हैं। कई तर्कवादी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर उनके दावों को चुनौती दी है।

इससे पहले NASA और वैज्ञानिकों से कथित बातचीत को लेकर किए गए उनके दावों पर भी सवाल उठे थे। अब ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में “पैरानॉर्मल PHD” वाले बयान की जांच के बाद यह विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

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जांच में नहीं मिला कोई प्रमाण, विश्वविद्यालयों ने भी दावे को नकारा

‘द मूकनायक’ की जांच में ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि या “भूत-प्रेत”, “पैरानॉर्मल शक्तियों” या “अलौकिक घटनाओं” पर कोई आधिकारिक PHD प्रोग्राम चला रही हैं।

दोनों विश्वविद्यालयों ने ईमेल के जरिए स्पष्ट किया कि वे इस प्रकार का कोई कोर्स संचालित नहीं कर रहे हैं। ऐसे में नेशनल न्यूज टीबी चैनलों पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा किया गया दावा तथ्यात्मक जांच में गलत, भ्रामक और अप्रमाणित साबित हुआ।

इस मामले में द मूकनायक प्रतिनिधि (अंकित पचौरी) ने बागेश्वर धाम की आधिकारिक ईमेल आईडी पर भी विस्तृत प्रश्न भेजकर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया। ईमेल में पूछा गया कि क्या धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैंब्रिज विश्वविद्यालय या किसी अन्य विदेशी विश्वविद्यालय में पैरानॉर्मल स्टडीज़ अथवा इससे संबंधित किसी विषय में पीएचडी, शोध या प्रवेश के लिए आवेदन किया है। साथ ही यह भी जानना चाहा गया कि क्या उन्हें किसी विश्वविद्यालय से प्रवेश, नामांकन या स्वीकृति संबंधी कोई आधिकारिक सूचना प्राप्त हुई है।

हालांकि, समाचार लिखे जाने तक बागेश्वर धाम या धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की ओर से इस संबंध में कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ था। यदि भविष्य में उनका पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे भी इस रिपोर्ट में शामिल (अपडेट) किया जाएगा।

जानिए कौन हैं धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री?

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले स्थित बागेश्वर धाम सरकार के पीठाधीश्वर और कथावाचक हैं। उनका जन्म 4 जुलाई 1996 को गड़ा गांव (छतरपुर) में हुआ माना जाता है। वे हिंदू धार्मिक कथाओं, विशेषकर रामकथा और हनुमान भक्ति के लिए प्रसिद्ध हुए। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया, टीवी और बड़े धार्मिक आयोजनों के जरिए उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। उनके अनुयायी उन्हें “बाबा बागेश्वर” के नाम से भी जानते हैं। बागेश्वर धाम में आयोजित “दिव्य दरबार” कार्यक्रमों में वे लोगों की समस्याएं और मन की बातें बिना बताए जान लेने का दावा करते रहे हैं, जिसे उनके समर्थक चमत्कार मानते हैं।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की लोकप्रियता जितनी तेजी से बढ़ी, उतने ही विवाद भी उनके साथ जुड़े। सबसे बड़ा विवाद उनके “दिव्य शक्तियों” और चमत्कार संबंधी दावों को लेकर रहा। कई तर्कवादी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनके दावों को अंधविश्वास बताया और चुनौती दी। महाराष्ट्र की अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने उनके खिलाफ शिकायत भी की थी। इसके अलावा उनके बयानों को लेकर भी समय-समय पर विवाद हुए, जिनमें हिंदू राष्ट्र की मांग, धर्मांतरण, राजनीतिक टिप्पणियां और सामाजिक मुद्दों पर दिए गए बयान शामिल हैं। कई बार उनके कार्यक्रमों में भारी भीड़ और प्रशासनिक अव्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे।

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