इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट

न्यायिक अधिकारी का अधिकार DM और SP से ऊपर: पुलिस अफसरों को हाईकोर्ट की सख्त फटकार

सीजेएम के आदेश की अनदेखी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त; दो पुलिस अफसरों को कोर्ट रूम में सजा, अवैध गिरफ्तारी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना।
Published on

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायपालिका के सम्मान और अधिकारों को लेकर एक बेहद अहम और सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कानूनी मामले में एक न्यायिक अधिकारी का अधिकार क्षेत्र जिले के मजिस्ट्रेट (डीएम), पुलिस कप्तान (एसपी) और यहां तक कि राज्य के राजनीतिक प्रमुख से भी ऊपर होता है। यह तल्ख टिप्पणी उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के दो पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करते हुए की गई, जिन्होंने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) के आदेशों की अनदेखी की थी।

'न्यायालय में कुर्सी का सम्मान सर्वोपरि'

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने 19 फरवरी को दिए अपने फैसले में कहा, "अदालत के भीतर आने वाले हर व्यक्ति को उस कुर्सी का सम्मान करना ही होगा... जिला स्तर के न्यायिक अधिकारी हमारी न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैं। उनके आदेशों का अनादर या अवहेलना करना पूरी तरह से अक्षम्य है।"

इसके साथ ही, अदालत ने सीजेएम के आदेशों का पालन न करने पर दोनों दोषी पुलिस अधिकारियों द्वारा पेश किए गए व्यक्तिगत हलफनामों को खारिज कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद पिछले साल सितंबर में वित्तीय धोखाधड़ी के आरोप में सानू उर्फ राशिद नाम के एक संदिग्ध की कथित अवैध गिरफ्तारी से जुड़ा है। अदालत के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए जस्टिस देशवाल ने पाया कि ललितपुर कोतवाली के एसएचओ (SHO) अनुराग अवस्थी और मामले के जांच अधिकारी (IO) नरेंद्र सिंह ने सीजेएम के निर्देशों को लगातार नजरअंदाज किया था।

सीजेएम ने उन परिस्थितियों की रिपोर्ट और पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज मांगे थे, जिनमें आरोपी सानू को गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा, एक सह-आरोपी महिला (रशीदा) को नियमों को ताक पर रखकर सुबह 4 बजे हिरासत में लिए जाने को लेकर भी पुलिस से जवाब मांगा गया था।

कोर्ट रूम में कस्टडी की सजा

हाईकोर्ट की बेंच ने एसएचओ अनुराग अवस्थी और आईओ नरेंद्र सिंह को "अदालत की कार्यवाही खत्म होने तक कोर्ट रूम में ही हिरासत" में रखने का आदेश दिया। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि भले ही दोनों ने माफी मांग ली है, लेकिन उनके हलफनामे में सीजेएम के निर्देशों की अनदेखी करने का कोई "ठोस और वैध कारण" नहीं बताया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का हवाला

जस्टिस देशवाल ने अपनी टिप्पणी में आगे कहा, "यह अदालत जमानत मामलों में अपने अधिकारों से अवगत है, लेकिन यहां मुख्य मुद्दा अवैध गिरफ्तारी और सीजेएम को सीसीटीवी फुटेज न सौंपने का है। अदालत इस मामले में आंखें नहीं मूंद सकती। यह केवल भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत दिए गए किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन का सवाल नहीं है, बल्कि न्यायिक अधिकारियों के आदेशों की अवमानना का भी है, जिससे सीधे तौर पर कानून की गरिमा गिरती है।"

थानों में खराब सीसीटीवी और एक लाख रुपये का जुर्माना

बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यूपी के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों का ठीक से काम न करना अब एक "आम बात" (रूटीन) हो गई है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जिन्हें अवैध रूप से हिरासत में लिया जाता है। कस्टोडियल टॉर्चर को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने सभी जिलों के सीजेएम को निर्देश दिया है कि वे अचानक पुलिस थानों का दौरा करें और जांचें कि कैमरे काम कर रहे हैं या नहीं।

इसके साथ ही, अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि वह जमानत आवेदक को 1 लाख रुपये का मुआवजा दे। सरकार को यह भी छूट दी गई है कि वह इस मुआवजे की रकम को अवैध गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूल सकती है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट
MP के ग्वालियर में बढ़ता ट्रेंड: हर महीने औसतन 34 नाबालिग घर छोड़ रहे, डिजिटल दुनिया बन रही बड़ी वजह
इलाहाबाद हाईकोर्ट
“तुम चमा%$ हो... LLB तुम्हारा काम नहीं” : चूरू लॉ कॉलेज में प्रोफेसर पर जातिगत टॉर्चर का आरोप, छात्रा ने SC/ST एक्ट में FIR दर्ज कराई
इलाहाबाद हाईकोर्ट
ओडिशा: जादू-टोने के शक में 62 वर्षीय बुजुर्ग महिला की गला रेतकर हत्या, आरोपी गिरफ्तार

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com