
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल 'द वायर' के प्रबंध निदेशक (एमडी) सिद्धार्थ वरदराजन, उनके एक कैमरामैन और एक एंकर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी है। यह पूरा मामला साल 2021 का है, जिसमें इन सभी पर एक समाचार और वीडियो डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से समाज में वैमनस्य फैलाने का आरोप लगाया गया था। यह विवादित डॉक्यूमेंट्री बाराबंकी जिला प्रशासन द्वारा एक 'मस्जिद' को गिराए जाने की घटना पर आधारित थी।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया एफआईआर देखने से ऐसा बिल्कुल प्रतीत नहीं होता कि इस मामले में आईपीसी की धारा 153ए (शत्रुता को बढ़ावा देना) के तहत अभियोजन चलाया जा सकता है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि एफआईआर में आरोपियों की व्यक्तिगत संलिप्तता का कोई ठोस आधार मौजूद नहीं है और ना ही इसके लिए कोई पूर्व कानूनी मंजूरी ली गई थी।
अदालत ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए अधिकतम तीन सप्ताह का समय दिया है। पीठ ने सख्त हिदायत देते हुए कहा कि यदि आगामी 31 मार्च तक सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आता है, तो अदालत बिना हलफनामे के ही इस मामले में अपना अंतिम फैसला सुना देगी।
इस कानूनी लड़ाई में वरदराजन और अन्य आरोपियों ने बाराबंकी के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत द्वारा 24 फरवरी 2023 को जारी किए गए संज्ञान और समन आदेश को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इसके साथ ही उन्होंने 24 जून 2021 को राम सनेही घाट पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एफआईआर और 24 मई 2022 को दायर की गई चार्जशीट को भी खारिज करने की मांग की थी।
यह एफआईआर आईपीसी की कई गंभीर धाराओं के तहत दर्ज की गई थी, जिनमें दंगा भड़काने के इरादे से उकसाने वाली धारा 153, धर्म या जन्म स्थान आदि के आधार पर दुश्मनी को बढ़ावा देने वाली 153-ए, सार्वजनिक शांति भंग करने के इरादे से अफवाह फैलाने वाली 505(1)(बी), आपराधिक साजिश रचने की 120बी और समान इरादे से जुड़ी धारा 34 शामिल हैं।
इससे पहले 11 जुलाई 2023 को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया था कि उनके मुवक्किल पूरी तरह से निर्दोष हैं और उन्हें केवल 'नाराजगी' के चलते इस मामले में झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष की मुख्य दलील यह थी कि जो खबर 'द वायर' पोर्टल पर प्रकाशित की गई थी, ठीक वैसी ही खबरें अन्य समाचार पत्रों ने भी छापी थीं। इसलिए, एफआईआर में लगाए गए आरोपों के अनुसार कोई भी अपराध करने का आपराधिक इरादा नहीं था।
वकील ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को इस मामले से सीधे तौर पर जोड़ने के लिए जांच एजेंसियों के पास कोई भी पुख्ता सबूत मौजूद नहीं है, इसलिए आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया जाना चाहिए।
अपनी बात को तकनीकी रूप से मजबूत करते हुए बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 196 के साथ पढ़ी जाने वाली आईपीसी की धारा 153-(ए) के तहत किसी भी अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य होता है। यह पूरी तरह स्पष्ट है कि इस मामले में तय कानूनी प्रावधानों के अनुसार कोई भी अभियोजन स्वीकृति नहीं ली गई थी।
मंगलवार को हुई हालिया सुनवाई में भी वकील ने अदालत के सामने यही बात रखी कि यदि एफआईआर में लगे सभी आरोपों को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तब भी आईपीसी की धारा 153-ए के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।
इन सभी दलीलों पर गौर करने के बाद न्यायमूर्ति भाटिया की पीठ ने कहा कि वकीलों की प्रस्तुतियों और एफआईआर के अवलोकन से यह साफ हो जाता है कि धारा 153ए के तहत मामला नहीं बनता है। अदालत ने यह भी पाया कि समन आदेश में उस चार्जशीट के विश्लेषण के आधार पर न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया है, जिसका स्पष्ट निर्देश इसी अदालत ने 09.07.2021 (9 जुलाई 2021) के अपने एक आदेश में दिया था।
मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च तय करते हुए पीठ ने आदेश दिया है कि तब तक एफआईआर से जुड़ी सभी आगे की कार्यवाहियों पर पूरी तरह से रोक रहेगी।
जुलाई 2023 में हुई पिछली सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और प्रमुख सचिव (गृह) को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि ढाई साल का समय बीत जाने के बाद भी यह हलफनामा पेश नहीं किया गया है।
मंगलवार को जब यह मामला दोबारा उठाया गया, तो राज्य के वकील ने पीठ को बताया कि संबंधित अधिकारियों से उचित निर्देश न मिल पाने के कारण हलफनामा दाखिल नहीं हो सका है, जिसके बाद उन्होंने जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से और समय देने की गुजारिश की।
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