नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में क्रीमी लेयर का दर्जा केवल माता-पिता की आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि आरक्षण का लाभ देने के मामले में निजी कंपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) में काम करने वाले कर्मचारियों और सरकारी कर्मचारियों के बीच भेदभाव करना पूरी तरह से अनुचित और 'शत्रुतापूर्ण भेदभाव' के समान है।
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मद्रास, केरल और दिल्ली उच्च न्यायालयों के उन फैसलों को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की, जिनमें सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए ओबीसी (नॉन-क्रीमी लेयर) का लाभ मांगने वाले उम्मीदवारों की योग्यता पर विचार किया गया था। उच्च न्यायालयों ने उन उम्मीदवारों के दावों को सही ठहराया था, जिनका यह तर्क था कि पीएसयू, बैंक या निजी क्षेत्र में काम करने वाले उनके माता-पिता की आय के कारण उन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर में डाल दिया गया है।
केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए, पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले जस्टिस महादेवन ने कहा कि इन मामलों के विशिष्ट तथ्यों को देखते हुए उच्च न्यायालय का तर्क बिल्कुल सही है। अदालत ने माना कि आरक्षण की पात्रता तय करते समय निजी संस्थाओं और पीएसयू के कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारियों से अलग मानना एक ऐसा भेदभाव है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता और उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट का विश्वास जगाता है।
यह पूरा विवाद मुख्य रूप से भारत सरकार द्वारा 8 सितंबर 1993 को जारी किए गए कार्यालय ज्ञापन (OM) और 14 अक्टूबर 2004 को जारी एक स्पष्टीकरण पत्र के इर्द-गिर्द घूमता है। इन दस्तावेजों में यह तय किया गया था कि ओबीसी में क्रीमी लेयर के दायरे में कौन आएगा। अदालत ने गौर किया कि 1993 के ज्ञापन में क्रीमी लेयर की स्थिति तय करने के लिए आय या संपत्ति परीक्षण से वेतन और कृषि आय को बाहर रखा गया था।
लेकिन 14 अक्टूबर 2004 के पत्र में पीएसयू और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की वेतन आय को इसमें शामिल करने का निर्देश दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप सरकारी कर्मचारियों और पीएसयू या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच एक अनुचित भेदभाव पैदा हो गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि 1993 के ज्ञापन और 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र को समग्र रूप से पढ़ने पर यह साफ हो जाता है कि कोई उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है या नहीं, इसका फैसला केवल वेतन से होने वाली आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि उम्मीदवार के माता-पिता का पद क्या है और वे किस श्रेणी में आते हैं। सिर्फ आय के आधार पर किसी भी उम्मीदवार की ओबीसी की क्रीमी या नॉन-क्रीमी लेयर की स्थिति का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
अदालत ने आगे कहा कि 1993 के ज्ञापन में बताए गए पदों की श्रेणियों और स्थिति के मापदंडों का संदर्भ लिए बिना, केवल आय के ब्रैकेट के आधार पर क्रीमी लेयर की स्थिति तय करना कानून की नजर में बिल्कुल भी टिकाऊ नहीं है।
पीएसयू या निजी क्षेत्र में काम करने वालों के बच्चों को केवल उनके वेतन से प्राप्त आय के आधार पर आरक्षण के लाभ से वंचित करना और उनके पदों (चाहे वे ग्रुप ए, बी, सी या डी हों) पर ध्यान न देना समान स्थिति वाले लोगों के बीच भेदभाव पैदा करेगा। यह समान लोगों के साथ असमान व्यवहार करने जैसा होगा, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, जिसमें आरक्षण भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।
अंत में पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि क्रीमी लेयर को बाहर रखने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ओबीसी के भीतर जो सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग हैं, वे उन लाभों पर कब्जा न कर लें जो वास्तव में पिछड़े लोगों के लिए हैं। इसका मकसद एक ही सामाजिक वर्ग के समान स्थिति वाले सदस्यों के बीच कोई कृत्रिम या बनावटी भेदभाव पैदा करना हरगिज नहीं है।
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