इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: अगर पत्नी या उसके परिवार की वजह से पति कमाने लायक न रहे, तो गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती

पत्नी के मायके वालों ने मारी थी गोली, अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- पति को अपंग बनाकर गुजारा भत्ता मांगना घोर अन्याय
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प्रयागराज: पति-पत्नी के विवाद और गुजारा भत्ते (Maintenance) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि पत्नी के किसी कृत्य या उसके परिवार की वजह से पति शारीरिक रूप से अक्षम हो जाता है और कमाने की स्थिति में नहीं रहता, तो ऐसी स्थिति में पत्नी उससे भत्ते की मांग नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस महिला की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज करते हुए की, जिसने अपने होम्योपैथी डॉक्टर पति से भत्ते की मांग की थी। गौरतलब है कि पति को महिला के भाई और पिता ने ही गोली मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया था।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला कुशीनगर का है। पति वेद प्रकाश सिंह पेशे से एक होम्योपैथी डॉक्टर हैं। आरोप है कि उनके क्लिनिक पर हुए एक विवाद के दौरान उनकी पत्नी के भाई (साले) और पिता (ससुर) ने उन पर गोली चला दी थी। इस जानलेवा हमले ने वेद प्रकाश की जिंदगी बदल दी और उन्हें अपनी आजीविका कमाने के लिए अक्षम बना दिया।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ल ने कुशीनगर की फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। फैमिली कोर्ट ने पत्नी की भत्ते वाली अर्जी को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में पति को भत्ता देने के लिए मजबूर करना घोर अन्याय होगा, खासकर तब जब उसकी कमाने की क्षमता पत्नी के ही परिवार के आपराधिक कृत्य के कारण खत्म हुई हो।

रीढ़ की हड्डी में फंसा है छर्रा

अदालत ने पति की मेडिकल स्थिति पर गंभीरता से गौर किया। हमले के दौरान लगी गोली का एक छर्रा (Pellet) अभी भी वेद प्रकाश की रीढ़ की हड्डी (Spinal Cord) में फंसा हुआ है। डॉक्टरों के मुताबिक, अगर इसे निकालने के लिए सर्जरी की गई, तो लकवा (Paralysis) मारने का बहुत अधिक जोखिम है। इस चोट के कारण वेद प्रकाश न तो ठीक से बैठ पाते हैं और न ही कोई काम कर सकते हैं, जिससे उनकी कमाई पूरी तरह बंद हो चुकी है।

7 मई 2025 को फैमिली कोर्ट ने खारिज की थी अर्जी

कुशीनगर की फैमिली कोर्ट ने 7 मई 2025 को ही पत्नी के अंतरिम भत्ते (Interim Maintenance) के आवेदन को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस फैसले पर मुहर लगाते हुए माना कि पति की शारीरिक अक्षमता निर्विवाद है और यह सीधे तौर पर पत्नी के पक्ष के लोगों द्वारा दी गई चोट का नतीजा है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'अन्याय नहीं होने देंगे'

न्यायमूर्ति शुक्ल ने अपने आदेश में कहा, "हालांकि भारतीय समाज में आम तौर पर यह अपेक्षा की जाती है कि पति काम करे और अपने परिवार का भरण-पोषण करे, लेकिन इस केस के हालात बिल्कुल अलग और विशिष्ट हैं।"

अदालत ने आगे कहा, "यह तय कानून है कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का पवित्र दायित्व है, लेकिन किसी भी अदालत ने पत्नी पर ऐसी कोई स्पष्ट कानूनी जिम्मेदारी नहीं डाली है। लेकिन मौजूदा मामले के तथ्यों से प्रथम दृष्टया यह साफ है कि पत्नी और उसके परिवार के आचरण ने ही पति को आजीविका कमाने के लिए अयोग्य बना दिया है।"

फैसले के अंत में कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यदि पत्नी अपने कार्यों या चूक (Omissions) से पति की कमाने की क्षमता को नुकसान पहुंचाती है, तो उसे इस स्थिति का लाभ उठाने और भत्ते का दावा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। रिकॉर्ड पर मौजूद सच्चाई से अदालत अपनी आंखें नहीं मूंद सकती।

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